ब्रिक्स से भारत को ठोस लाभ मिलने के सवाल पर पी. चिदंबरम ने संदेह जताया। शशि थरूर ने न्यू डेवलपमेंट बैंक, वित्तीय सुरक्षा और विभिन्न सहयोग कार्यक्रमों को उपलब्धि बताया।
नई दिल्ली | 11 सितंबर 2026
By Mohd Haris
नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने बहुपक्षीय समूह से भारत को मिलने वाले ठोस फायदे पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि पिछली 2 या 3 बैठकों से उन्हें भारत के लिए कोई महत्वपूर्ण ठोस नतीजा दिखाई नहीं दिया।
चिदंबरम ने ब्रिक्स के साथ शंघाई सहयोग संगठन, जी-20 और क्वाड जैसे मंचों में भारत की भागीदारी का जिक्र करते हुए पूछा कि इन समूहों से देश को व्यावहारिक स्तर पर क्या हासिल हो रहा है। उनका तर्क मुख्य रूप से ठोस और मापने योग्य नतीजों को लेकर था।
चिदंबरम की टिप्पणी के बाद ब्रिक्स के महत्व को लेकर बहस तेज हुई। कांग्रेस नेता शशि थरूर ने समूह से जुड़े कुछ ऐसे संस्थागत परिणामों की ओर ध्यान दिलाया, जिन्हें केवल किसी एक शिखर सम्मेलन के तत्काल आर्थिक लाभ के पैमाने पर नहीं देखा जा सकता।
ब्रिक्स की उपलब्धियों में न्यू डेवलपमेंट बैंक प्रमुख उदाहरण है। इस बैंक का उद्देश्य बुनियादी ढांचे और सतत विकास से जुड़े प्रोजेक्ट के लिए वित्त उपलब्ध कराना है। ब्रिक्स देशों ने वित्तीय संकट की स्थिति में सदस्य देशों को अल्पकालिक तरलता सहायता देने के लिए आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था भी स्थापित की है।
ब्रिक्स के शुरुआती ठोस परिणामों में स्थानीय मुद्रा में ऋण सुविधा से जुड़ा समझौता भी शामिल रहा है। इसका मकसद सदस्य देशों के बीच व्यापार और वित्तीय सहयोग में स्थानीय मुद्राओं की भूमिका बढ़ाना था।
भारत के लिए इसका महत्व इसलिए है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भुगतान व्यवस्था और मुद्रा जोखिम दोनों महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। हालांकि इसे डॉलर व्यवस्था के तत्काल विकल्प के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
भारत ने 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान सीमा-पार डिजिटल भुगतान और सदस्य देशों की डिजिटल मुद्राओं के बीच संभावित संपर्क को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय लेनदेन को आसान और तेज बनाना है, न कि किसी साझा ब्रिक्स मुद्रा की स्थापना करना।
ब्रिक्स के तहत स्वास्थ्य क्षेत्र में भी संस्थागत सहयोग विकसित हुआ है। भारत की पहल पर ब्रिक्स वैक्सीन अनुसंधान और विकास केंद्र स्थापित किया गया। इसका मकसद भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए अनुसंधान और सहयोग को मजबूत करना है।
भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स डिजिटल हेल्थ समिट भी आयोजित किया। ऐसे मंचों का असर आम नागरिक तक तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन स्वास्थ्य नीति, अनुसंधान और महामारी प्रबंधन में दीर्घकालिक सहयोग के लिए इनका महत्व है।
ब्रिक्स के एजेंडे में सुरक्षा सहयोग भी शामिल है। भारत ने समूह के भीतर एक साझा ब्रिक्स आतंकवाद-रोधी कार्ययोजना को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। इससे सदस्य देशों के बीच आतंकवाद और उससे जुड़े सुरक्षा खतरों पर सहयोग के लिए एक संस्थागत ढांचा तैयार हुआ।
यहां भी यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी साझा कार्ययोजना का अस्तित्व अपने आप में आतंकवाद के खिलाफ जमीन पर सफलता का प्रमाण नहीं है। इसकी वास्तविक प्रभावशीलता सदस्य देशों के बीच सूचना साझा करने और व्यावहारिक सहयोग पर निर्भर करती है।
भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता में सहयोग का दायरा और विस्तृत हुआ है। कृषि क्षेत्र में प्राकृतिक और टिकाऊ खेती से जुड़े शोध, डिजिटल कृषि, बीज और कृषि संसाधनों पर सहयोग के लिए नए ढांचे सामने आए हैं।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला भी इस एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी है। ब्रिक्स लॉजिस्टिक्स सप्लाई-चेन सहयोग ढांचे का उद्देश्य परिवहन, माल ढुलाई, कनेक्टिविटी और आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक लचीला बनाना है।
भारत ब्रिक्स के भीतर व्यापार को अधिक संतुलित और विस्तृत बनाने पर जोर दे रहा है। अगस्त 2026 में जयपुर में हुई ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों की बैठक में ब्रिक्स आर्थिक साझेदारी रणनीति 2030 को अंतिम रूप देने की दिशा में प्रगति का उल्लेख किया गया। छोटे कारोबारों के लिए व्यापार वित्त की पहुंच बढ़ाने और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं को अधिक लचीला बनाने पर भी सहमति बनी।
इसका अर्थ यह नहीं है कि ब्रिक्स के भीतर व्यापार की सभी बाधाएं खत्म हो गई हैं। सदस्य देशों के बीच आर्थिक संरचना, व्यापार नीतियों और राजनीतिक प्राथमिकताओं में बड़े अंतर हैं। इसलिए घोषणाओं को वास्तविक व्यापारिक परिणामों में बदलना अभी बड़ी चुनौती है।
ब्रिक्स के संस्थागत परिणाम मौजूद हैं, लेकिन चिदंबरम का सवाल पूरी तरह निराधार नहीं माना जा सकता। किसी भी बहुपक्षीय संगठन की उपयोगिता का आकलन केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक आर्थिक और रणनीतिक असर से किया जाना चाहिए।
ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि बड़े सदस्य आधार के बावजूद देशों के बीच व्यापार और नीति समन्वय अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा है, जिससे इसे यूरोपीय संघ जैसी एकीकृत आर्थिक व्यवस्था कहा जा सके। समूह के भीतर चीन की भूमिका, भारत-चीन तनाव और अलग-अलग देशों के भू-राजनीतिक हित भी सामूहिक फैसलों को जटिल बनाते हैं।
भारत के लिए ब्रिक्स का महत्व केवल प्रत्यक्ष व्यापारिक लाभ तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में सुधार की मांग रखने का एक मंच भी है।
ब्रिक्स अब दुनिया की करीब 49 प्रतिशत आबादी और लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिनिधित्व करता है। समूह के विस्तार ने उसकी आर्थिक और भू-राजनीतिक अहमियत बढ़ाई है।
भारत के लिए इसका एक अहम पहलू रणनीतिक स्वायत्तता है। नई दिल्ली एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्ते बनाए रखती है, वहीं रूस, चीन, ईरान और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ भी संवाद का मंच बनाए रखना चाहती है।
भारत 1 जनवरी 2026 से ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला शिखर सम्मेलन भारत की चौथी ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान आयोजित हो रहा है। इस साल भारत ने लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता को अपनी प्राथमिकताओं में रखा है।
इस सम्मेलन में व्यापार, डिजिटल भुगतान, आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा, तकनीक, स्वास्थ्य और वैश्विक शासन जैसे मुद्दों पर चर्चा महत्वपूर्ण रहेगी। प्रस्तावित ब्रिक्स स्टार्टअप इनोवेशन फंड और इनक्यूबेटर नेटवर्क जैसे कार्यक्रम भी आर्थिक सहयोग को व्यावहारिक दिशा देने की कोशिश हैं।
चिदंबरम और थरूर के अलग-अलग दृष्टिकोण एक बड़े सवाल को सामने लाते हैं। क्या भारत को ब्रिक्स से तत्काल आर्थिक लाभ चाहिए या इसे दीर्घकालिक कूटनीतिक और संस्थागत प्रभाव के मंच के रूप में देखना चाहिए?
दोनों दृष्टिकोणों में अंतर मुख्य रूप से मूल्यांकन के पैमाने का है। चिदंबरम ठोस नतीजों और प्रत्यक्ष लाभ की तलाश करते हैं, जबकि ब्रिक्स के समर्थक वित्तीय संस्थानों, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक दक्षिण में भारत की भूमिका को भी उपलब्धि मानते हैं।
अब असली परीक्षा घोषणाओं को लागू करने की है। डिजिटल भुगतान की कनेक्टिविटी, व्यापार वित्त, आपूर्ति श्रृंखला, कृषि सहयोग और स्वास्थ्य अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में वास्तविक प्रगति तभी मानी जाएगी जब इन पहलों से कारोबार, निवेश, तकनीकी सहयोग और आम लोगों के लिए अवसर बढ़ें।
भारत के लिए ब्रिक्स की उपयोगिता इसी बात से तय होगी कि नई दिल्ली अपनी अध्यक्षता के दौरान बनाए गए ढांचों को कितनी प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाती है और सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद व्यावहारिक सहयोग कितना बढ़ता है।
ब्रिक्स को लेकर पी. चिदंबरम का सवाल प्रत्यक्ष लाभ और जवाबदेही के नजरिए से महत्वपूर्ण है। वहीं शशि थरूर द्वारा सामने रखे गए उदाहरण यह बताते हैं कि समूह ने वित्त, स्वास्थ्य, सुरक्षा, कृषि और व्यापार सहयोग में कई संस्थागत ढांचे विकसित किए हैं।
इसलिए ब्रिक्स को न तो केवल घोषणाओं का मंच मानना सही होगा और न ही हर पहल को भारत की बड़ी आर्थिक उपलब्धि के रूप में पेश करना। वास्तविक पैमाना अब यह होगा कि इन संस्थागत पहलों का जमीन पर कितना असर दिखाई देता है। यही आने वाले वर्षों में ब्रिक्स की उपयोगिता और भारत की कूटनीतिक रणनीति की असली कसौटी होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।