चीन में नौकरी नहीं, फिर भी युवा जा रहे ऑफिस
नकली बॉस और ऑफिस, नौकरी के लिए पैसे दे रहे युवा
चीन का युवा रोजगार संकट, क्यों बन रहे नकली ऑफिस?
चीन में नौकरी तलाश रहे कुछ युवा रोज़ 30 से 50 युआन देकर नकली ऑफिस में बैठ रहे हैं। इन जगहों पर वे नौकरी आवेदन, स्टार्टअप और नेटवर्किंग करते हैं। यह ट्रेंड चीन के युवा रोजगार संकट, सामाजिक दबाव और कामकाजी पहचान से जुड़े बदलते नज़रिये को सामने लाता है।
बीजिंग/शेनझेन, चीन | 25 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
चीन में युवा रोजगार संकट की एक असामान्य तस्वीर सामने आई है। कुछ बेरोजगार युवा घर पर खाली बैठने के बजाय ऐसे नकली ऑफिसों में जाने के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च कर रहे हैं, जहां वास्तविक नौकरी नहीं होती, लेकिन ऑफिस जैसा माहौल मिलता है। आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक इन जगहों पर युवा काम करने का दिखावा करने के साथ नौकरी तलाशने और अपने प्रोजेक्ट पर काम करने में समय बिताते हैं। इन जगहों को “प्रिटेंड टू वर्क कंपनी” जैसे नामों से चलाया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक युवा यहां रोज़ 30 से 50 युआन खर्च करते हैं। भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब 400 से 670 रुपये के बीच बैठती है। पहली नज़र में यह व्यवस्था अजीब लग सकती है। लेकिन इसके पीछे केवल नौकरी की कमी नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव, अकेलापन, दिनचर्या बनाए रखने की जरूरत और रोजगार बाजार में शिक्षा तथा अवसरों के बीच बढ़ता गैप भी दिखाई देता है।
इन ऑफिसों में कोई वास्तविक बॉस या कंपनी का नियमित काम नहीं होता। युवा अपनी जरूरत के हिसाब से समय बिताते हैं। कुछ लोग नौकरी के लिए आवेदन करते हैं, कुछ अपने स्टार्टअप पर काम करते हैं और कुछ दूसरे नौकरी तलाशने वालों के साथ नेटवर्किंग करते हैं। इन जगहों पर ऑफिस जैसा माहौल तैयार किया जाता है। रिपोर्टों के अनुसार कंप्यूटर, इंटरनेट, स्नैक्स, लंच और ड्रिंक्स जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध रहती हैं। इससे बेरोजगार युवाओं को घर से बाहर निकलकर एक तय रूटीन में काम करने का अवसर मिलता है। यानी यह व्यवस्था केवल “नौकरी का नाटक” नहीं है। कुछ युवाओं के लिए यह नौकरी मिलने तक एक अस्थायी वर्कस्पेस और सामाजिक माहौल की तरह काम कर रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक प्रिटेंड ऑफिस में बैठने का खर्च रोज़ 30 से 50 युआन है। Fortune ने भी इसी रेंज की पुष्टि करते हुए बताया कि यह करीब 4.20 से 7 डॉलर प्रतिदिन बैठता है। अगर कोई व्यक्ति सोमवार से शुक्रवार तक रोज़ाना इस सेवा का इस्तेमाल करता है, तो सालाना खर्च लगभग 1,820 डॉलर तक पहुंच सकता है। चीन में गैर-निजी क्षेत्र की औसत सालाना सैलरी करीब 16,000 डॉलर बताई गई है, इसलिए बेरोजगार व्यक्ति के लिए यह खर्च मामूली नहीं है। फिर भी कुछ युवा यह खर्च इसलिए कर रहे हैं क्योंकि घर में लगातार बेरोजगार रहना उनके लिए अधिक मुश्किल हो रहा है। ऑफिस का माहौल उन्हें काम की तलाश को एक नियमित दिनचर्या में बदलने में मदद करता है।
आजतक की रिपोर्ट में चीन के 16 से 24 वर्ष के युवाओं के लिए 14.5 प्रतिशत बेरोजगारी दर का उल्लेख है। यह आंकड़ा रोजगार बाजार में युवाओं के सामने मौजूद दबाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। Fortune ने भी 16 से 24 वर्ष की आयु के लिए 14.5 प्रतिशत का आंकड़ा रिपोर्ट किया है। हालांकि चीन में युवा बेरोजगारी के आंकड़ों को लेकर लंबे समय से डेटा की परिभाषा और माप पद्धति पर बहस होती रही है। यही वजह है कि किसी एक आंकड़े से पूरे युवा रोजगार संकट की तस्वीर तय करना उचित नहीं होगा। आधिकारिक आंकड़े और स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों के अनुमान अलग-अलग तस्वीर पेश करते रहे हैं।
2023 में चीन के युवा रोजगार संकट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खास ध्यान खींचा था। पेकिंग यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर झांग डांडान ने उस समय एक वैकल्पिक अनुमान के आधार पर युवा बेरोजगारी दर को 46.5 प्रतिशत तक बताया था। यह आधिकारिक आंकड़ा नहीं था। इसके बाद चीन ने युवा बेरोजगारी के आंकड़े जारी करने की पद्धति में बदलाव किया। इस वजह से पुराने और नए आंकड़ों की सीधी तुलना करना कठिन हो गया। इस अंतर को समझना जरूरी है। 46.5 प्रतिशत को चीन की आधिकारिक युवा बेरोजगारी दर के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। यह एक स्वतंत्र अर्थशास्त्रीय अनुमान था, जबकि 14.5 प्रतिशत आधिकारिक आंकड़े पर आधारित रिपोर्टिंग में इस्तेमाल हुआ है।
नौकरी संकट के बीच चीन के कुछ युवाओं में “रैट पीपल” शब्द भी सोशल मीडिया पर चर्चा में आया है। इसका इस्तेमाल ऐसे युवाओं के लिए किया जाता है जो नौकरी और पारंपरिक करियर की दौड़ से दूरी बनाकर कम खर्च में जीवन बिताने पर जोर देते हैं। इसके साथ “लाइंग फ्लैट” यानी न्यूनतम प्रयास वाली जीवनशैली का विचार भी चीन में चर्चा में रहा है। इसमें युवा ऊंचे करियर लक्ष्य और लगातार प्रतिस्पर्धा के बजाय सीमित जरूरतों के साथ जीवन गुजारने की बात करते हैं। इन ट्रेंड्स को केवल आलस्य के रूप में देखना अधूरा नज़रिया होगा। इनके पीछे रोजगार बाजार, आवास लागत, शिक्षा से जुड़े दबाव और करियर की बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसे सामाजिक-आर्थिक कारक भी मौजूद हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार नकली ऑफिस का सबसे अहम पहलू सामाजिक और मनोवैज्ञानिक ढांचा है। घर में लंबे समय तक अकेले रहने की तुलना में ऑफिस जैसा वातावरण युवाओं को नियमित दिनचर्या और दूसरे नौकरी तलाशने वालों से संपर्क देता है। विक्टोरिया यूनिवर्सिटी ऑफ वेलिंगटन के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के वरिष्ठ लेक्चरर क्रिश्चियन याओ ने बीबीसी से कहा कि “प्रिटेंड टू वर्क” का चलन बढ़ रहा है। उनके अनुसार आर्थिक बदलाव और शिक्षा तथा रोजगार के बीच असंतुलन ने युवाओं को संक्रमण के दौरान ऐसी जगहों की जरूरत पैदा की है। इस दृष्टिकोण से देखें तो नकली ऑफिस असली रोजगार का विकल्प नहीं है। यह नौकरी मिलने तक एक अस्थायी सामाजिक और कार्यस्थल व्यवस्था है।
सीधे तौर पर नहीं। नकली ऑफिस किसी व्यक्ति को वेतन, सामाजिक सुरक्षा या स्थायी रोजगार नहीं देता। इसकी उपयोगिता दूसरी जगह है। यह नौकरी तलाशने वाले को समय प्रबंधन, नेटवर्किंग, आवेदन प्रक्रिया और निजी प्रोजेक्ट के लिए जगह देता है। अगर इससे किसी व्यक्ति को रोजगार हासिल करने में मदद मिलती है तो इसका अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ हो सकता है, लेकिन इसे रोजगार नीति का समाधान मानना सही नहीं होगा। असल सवाल यह है कि युवा ऐसे स्थानों के लिए भुगतान करने को क्यों तैयार हैं। इसका जवाब रोजगार बाजार में अवसरों की कमी और बेरोजगारी के सामाजिक दबाव में मिलता है।
चीन ने पिछले दो दशकों में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार किया है। हर साल बड़ी संख्या में युवा डिग्री लेकर रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। लेकिन डिग्री की संख्या बढ़ने की रफ्तार और उच्च गुणवत्ता वाली नौकरियों की उपलब्धता हमेशा समान नहीं रही। यही शिक्षा और रोजगार के बीच “स्किल मिसमैच” का मुद्दा पैदा करता है। किसी युवा के पास डिग्री होने के बावजूद उसके कौशल और बाजार में उपलब्ध नौकरी की जरूरत के बीच अंतर रह सकता है। इस स्थिति में युवा केवल नौकरी तलाशने वाला नहीं रहता। उसे अपने कौशल को बदलने, नए क्षेत्र में प्रवेश करने और लगातार आवेदन करने की जरूरत पड़ती है।
आजतक की रिपोर्ट में कुछ चीनी विश्वविद्यालयों पर स्नातकों की रोजगार स्थिति को गलत तरीके से दिखाने के आरोपों का उल्लेख किया गया है। 2011 में चीन के शिक्षा मंत्रालय ने कम रोजगार वाले पाठ्यक्रमों को बंद करने की चेतावनी दी थी। इसके बाद कुछ संस्थानों पर रोजगार आंकड़ों को बेहतर दिखाने के लिए दबाव बनाने की रिपोर्टें आईं। सिंगापुर मैनेजमेंट यूनिवर्सिटी के कानून प्रोफेसर हेनरी गाओ ने 2023 में कहा था कि वास्तविक युवा बेरोजगारी उपलब्ध आंकड़ों से अधिक हो सकती है क्योंकि कॉलेजों के पास रोजगार दर बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मौजूद है। यह विशेषज्ञ का आकलन है, आधिकारिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं। इसलिए चीन के युवा रोजगार संकट को समझते समय आंकड़ों की गुणवत्ता और परिभाषा पर भी नज़र रखना जरूरी है।
युवा रोजगार किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए अहम मुद्दा है। लंबे समय तक रोजगार नहीं मिलने पर घरेलू खपत, आवास खरीद, परिवार गठन और भविष्य को लेकर भरोसे पर असर पड़ सकता है। अगर युवा अपनी आय शुरू नहीं कर पाते, तो वे बड़े खर्च टाल सकते हैं। इसका असर खुदरा बाजार, आवास, वित्तीय सेवाओं और दूसरे उपभोक्ता क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि युवा रोजगार केवल सामाजिक मुद्दा नहीं है। यह चीन की घरेलू अर्थव्यवस्था और दीर्घकालिक विकास रणनीति से जुड़ा आर्थिक प्रश्न भी है।
इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नकली ऑफिस नहीं, बल्कि उसके पीछे मौजूद रोजगार संकट है। कोई युवा रोज़ पैसे देकर ऑफिस में इसलिए बैठ रहा है क्योंकि उसे वास्तविक ऑफिस और वास्तविक नौकरी नहीं मिल रही। यह स्थिति एक विरोधाभास दिखाती है। रोजगार नहीं है, लेकिन काम करने की आदत और पेशेवर पहचान बनाए रखने की जरूरत बनी हुई है। नकली ऑफिस इस खाली जगह को अस्थायी तौर पर भर रहे हैं। लेकिन जब तक रोजगार बाजार में पर्याप्त अवसर नहीं बनते, ऐसे मॉडल मूल समस्या को हल नहीं कर सकते।
चीन में युवा रोजगार के आंकड़ों, कॉलेज स्नातकों की नियुक्ति दर और निजी क्षेत्र में नई नौकरियों की उपलब्धता पर नजर रखना जरूरी होगा।
अगर युवा बेरोजगारी घटती है और नई नौकरियां बढ़ती हैं, तो नकली ऑफिस का चलन सीमित हो सकता है। इसके विपरीत अगर नौकरी बाजार कमजोर रहता है, तो ऐसे भुगतान वाले वर्कस्पेस और दूसरे वैकल्पिक मॉडल अधिक शहरों में फैल सकते हैं। साथ ही “रैट पीपल” और “लाइंग फ्लैट” जैसे सोशल मीडिया ट्रेंड भी यह संकेत देते रहेंगे कि युवा पीढ़ी रोजगार और पारंपरिक करियर को किस नज़रिये से देख रही है।
चीन के नकली ऑफिस की कहानी पहली नजर में अजीब लगती है, लेकिन इसके पीछे एक गंभीर रोजगार और सामाजिक मुआमला है। कुछ युवा रोज़ 30 से 50 युआन खर्च करके ऑफिस जैसा माहौल खरीद रहे हैं, ताकि नौकरी तलाशते समय उनकी दिनचर्या, उत्पादकता और सामाजिक संपर्क बना रहे। यह प्रवृत्ति बताती है कि बेरोजगारी केवल आय का सवाल नहीं है। यह व्यक्ति की सामाजिक पहचान, मानसिक दबाव और रोज़मर्रा की संरचना को भी प्रभावित करती है। चीन के लिए असली चुनौती नकली ऑफिस बंद करना नहीं, बल्कि युवाओं के लिए पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करना है। जब वास्तविक नौकरी के अवसर बढ़ेंगे, तभी इस अजीब रोजगार ट्रेंड की जरूरत अपने आप कम होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।