दिल्ली रेस क्लब को कोर्ट से बड़ा झटका
15 दिन में खाली होगा दिल्ली रेस क्लब?
100 साल पुराने क्लब पर बेदखली की तलवार
दिल्ली रेस क्लब को बेदखली मामले में पटियाला हाउस कोर्ट से अंतरिम राहत नहीं मिली। अदालत ने 11 अगस्त के आदेश पर रोक लगाने से इनकार किया। क्लब को 15 दिनों में परिसर खाली करना है। लीज की अवधि, सरकारी जमीन और नवीनीकरण को लेकर विवाद जारी है। मुख्य अपील पर सुनवाई 26 सितंबर को होगी।
स्थान: नई दिल्ली
तारीख: 26 अगस्त 2026
बाय:Mohd Naved
हैडलाइन के मुताबिक मामला दिल्ली रेस क्लब की बेदखली से जुड़ा है। 25 अगस्त 2026 को पटियाला हाउस कोर्ट ने क्लब की उस अंतरिम अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें 11 अगस्त के बेदखली आदेश पर रोक लगाने की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि क्लब प्रथम दृष्टया ऐसा मामला पेश नहीं कर सका, जिससे आदेश पर रोक जरूरी हो।
एस्टेट ऑफिसर ने 11 अगस्त को दिल्ली रेस क्लब की जमीन खाली करने का आदेश दिया था। आदेश के तहत परिसर 15 दिनों के भीतर खाली करने को कहा गया था। क्लब ने इस आदेश को चुनौती देते हुए अंतरिम राहत मांगी, लेकिन प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश पिताम्बर दत्त ने स्टे देने से इनकार कर दिया।
अदालत के मुताबिक क्लब को सरकारी पक्ष की ओर से दाखिल plaint की प्रति दी गई थी और जवाब तथा साक्ष्य पेश करने के लिए पर्याप्त मौके भी दिए गए थे। इसके बावजूद क्लब ने अपना जवाब दाखिल नहीं किया। अदालत ने इसी आधार पर प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की दलील को स्वीकार नहीं किया।
दिल्ली रेस क्लब की मूल लीज 8 मार्च 1926 को 25 साल के लिए दी गई थी। दिल्ली हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक लीज में आगे अवधि बढ़ाने का प्रावधान था और इसे समय-समय पर बढ़ाया गया। सरकारी पक्ष के अनुसार आखिरी विस्तार 31 दिसंबर 1994 को समाप्त हो गया और उसके बाद लीज का नवीनीकरण नहीं हुआ।
क्लब का रुख अलग रहा है। क्लब ने दलील दी कि 2013 में करीब 3.48 करोड़ रुपये के बकाया भुगतान के बाद लीज को नियमित करने और आगे नवीनीकरण की प्रक्रिया हुई थी। इस दलील को लेकर दोनों पक्षों के बीच लंबे वक्त से कानूनी विवाद चल रहा है।
अदालत ने 25 अगस्त के आदेश में यह भी कहा कि लीज की अवधि समाप्त होने के बाद किराया चुकाना अपने आप लीज के नवीनीकरण के बराबर नहीं माना जा सकता।
दिल्ली रेस क्लब का परिसर लुटियंस दिल्ली में लोक कल्याण मार्ग के आसपास स्थित है। भारतीय एक्सप्रेस के अनुसार क्लब के कब्जे वाला मौजूदा क्षेत्र करीब 53.242 एकड़ है। मूल लीज में इससे बड़ा क्षेत्र दर्ज था, लेकिन 1985 में जमीन के एक बड़े हिस्से को केंद्र ने वापस लेकर सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए आवंटित किया था।
यह जमीन राजधानी के बेहद अहम इलाके में स्थित है। इसी वजह से मामला केवल एक खेल संस्था की बेदखली तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में सरकारी जमीन का इस्तेमाल, पुरानी लीज की वैधता और सार्वजनिक भूमि पर कब्जे की कानूनी स्थिति जैसे सवाल भी हैं।
मई 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल जज की ओर से बेदखली प्रक्रिया पर लगाई गई रोक हटा दी थी। अदालत ने कहा था कि अंतरिम राहत देते समय प्रथम दृष्टया मजबूत मामला, अपूरणीय नुकसान और सुविधा के संतुलन जैसे पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया था।
इसके बाद केंद्र सरकार की बेदखली प्रक्रिया आगे बढ़ी। 11 अगस्त के आदेश में क्लब को 15 दिनों में परिसर खाली करने को कहा गया।
21 अगस्त को दिल्ली हाई कोर्ट ने जॉकी एसोसिएशन ऑफ इंडिया की याचिका भी खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि एसोसिएशन लीजधारक नहीं है और क्लब पहले ही सक्षम अपीलीय मंच के सामने बेदखली आदेश को चुनौती दे चुका है।
एसोसिएशन ने दलील दी थी कि बेदखली से जॉकी, ट्रेनर, स्टेबल स्टाफ और घोड़ों से जुड़े दूसरे लोगों की रोज़गार व्यवस्था प्रभावित होगी। संगठन ने यह भी कहा कि उत्तर भारत में घुड़दौड़ के लिए ऐसी विशिष्ट सुविधाएं सीमित हैं।
कानूनी विवाद का असर रेसिंग गतिविधियों पर भी पड़ा है। जुलाई में इंडिया टुडे ने रिपोर्ट किया था कि क्लब में मौजूद घोड़ों की संख्या घट रही थी और रेसिंग गतिविधियां निलंबित थीं। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ महीने पहले करीब 272 थॉरोब्रेड घोड़ों में से लगभग 98 ही वहां बचे थे।
इससे प्रशिक्षकों, स्टाफ और घोड़ों के मालिकों के सामने भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा हुई है। हालांकि मौजूदा अदालती आदेश का सीधा केंद्र बेदखली प्रक्रिया और उसके खिलाफ मांगी गई अंतरिम राहत है।
पटियाला हाउस कोर्ट ने फिलहाल 11 अगस्त के बेदखली आदेश पर रोक लगाने से इनकार किया है। मुख्य अपील की सुनवाई 26 सितंबर के लिए सूचीबद्ध है।
इसका मतलब यह है कि 25 अगस्त के आदेश ने क्लब को तत्काल अंतरिम राहत नहीं दी है, लेकिन मुख्य अपील पर अंतिम फैसला अभी बाकी है। इसलिए कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह खत्म नहीं हुई है
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।