दिल्ली SIR में करीब 33 लाख मतदाताओं के नाम विसंगति या पुराने रिकॉर्ड से मैपिंग नहीं होने के कारण नोटिस प्रक्रिया में हैं। सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को मामले पर सुनवाई करेगा।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 17 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved
सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े एक अहम मामले पर सुनवाई प्रस्तावित है। करीब 33 लाख मतदाताओं को जारी किए जा रहे नोटिस और उनके पीछे दर्ज विसंगतियों तथा पुराने मतदाता रिकॉर्ड से मैपिंग नहीं होने की प्रक्रिया को लेकर अदालत में सवाल उठाए गए हैं।
यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि दिल्ली की मसौदा मतदाता सूची में करीब 97 लाख नाम शामिल हैं, जबकि पुनरीक्षण के दौरान 47 लाख से अधिक नाम मसौदा सूची से बाहर हुए। इन दोनों आंकड़ों को अलग-अलग प्रक्रिया के रूप में समझना जरूरी है। करीब 33 लाख नोटिस पाने वाले मतदाता उन 47 लाख से अधिक हटाए गए नामों का सीधा हिस्सा नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट में मामला क्यों पहुंचा
उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक याचिका में आरोप लगाया गया है कि करीब 33 लाख मतदाताओं से संबंधित नोटिस प्रक्रिया में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। याचिकाकर्ता पक्ष ने सवाल उठाया है कि संबंधित मतदाताओं के नामों के सामने दर्ज विसंगति या मैपिंग से जुड़ी समस्या का स्पष्ट आधार सार्वजनिक रूप से समझ में नहीं आ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले को SIR से जुड़े दूसरे मामलों के साथ सुनने पर सहमति बनी है और मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष मंगलवार को सुनवाई प्रस्तावित है। अदालत ने अभी इस प्रक्रिया को लेकर अंतिम फैसला नहीं दिया है। इसलिए नोटिस प्रक्रिया पर उठे आरोपों को न्यायिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
33 लाख नोटिस का आधार क्या है
दिल्ली SIR की प्रक्रिया में करीब 33 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड में अलग-अलग तरह की विसंगतियां सामने आने की बात सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार इनमें करीब 14 लाख ऐसे मतदाता हैं जिनके विवरण को वर्ष 2002 के पुराने SIR रिकॉर्ड से जोड़ा नहीं जा सका। बाकी मामलों में नाम, उम्र और पारिवारिक विवरण से संबंधित अलग-अलग असंगतियां दर्ज की गई हैं।
दिल्ली के चुनावी अधिकारियों से जुड़ी रिपोर्टिंग के अनुसार करीब 19 लाख मामलों में प्रपत्रों में विसंगतियां चिन्हित की गई थीं। इनमें मौजूदा मतदाता सूची और पुराने रिकॉर्ड में नाम का अंतर, मतदाता और अभिभावक की उम्र के बीच असामान्य अंतर तथा भाई-बहन की जन्मतिथियों के बीच असंगति जैसे कारण शामिल बताए गए हैं।
मतदाताओं को दस्तावेज देने होंगे
नोटिस पाने वाले मतदाताओं से पात्रता साबित करने के लिए चुनाव आयोग की ओर से निर्धारित दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक दस्तावेजों की सूची में जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, जाति प्रमाणपत्र और स्थायी निवास प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज शामिल हैं।
आधार को अकेले पात्रता साबित करने वाला पर्याप्त दस्तावेज नहीं माना गया है। चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी रिपोर्टिंग के अनुसार जन्म और नागरिकता से संबंधित पात्रता के लिए व्यक्ति की जन्मतिथि और जन्मस्थान के आधार पर अलग-अलग दस्तावेजी जरूरतें लागू होती हैं।
47 लाख से ज्यादा नाम मसौदा सूची से बाहर
दिल्ली में SIR के दौरान मतदाता सूची में बड़े स्तर पर बदलाव हुआ है। 31 अगस्त को जारी मसौदा मतदाता सूची में 47.56 लाख से अधिक नाम शामिल नहीं थे। इनमें बड़ी संख्या ऐसे मतदाताओं की बताई गई जिन्हें स्थानांतरित, अनुपस्थित या अन्य कारणों से रिकॉर्ड में सक्रिय नहीं पाया गया।
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार मसौदा सूची में शामिल करीब 1.45 करोड़ मतदाताओं में से 47 लाख से अधिक नाम बाहर हुए। इनमें 43.32 लाख से अधिक मतदाताओं को स्थानांतरित या अनुपस्थित श्रेणी में रखा गया। करीब 2.82 लाख मतदाताओं को मृत और करीब 1.41 लाख को एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत बताया गया।
दावा और आपत्ति की प्रक्रिया जारी
मसौदा मतदाता सूची जारी होने के बाद प्रभावित नागरिकों को दावा और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया गया है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार 31 अगस्त तक दिल्ली में 5 लाख से अधिक दावे और आपत्तियां दर्ज की जा चुकी थीं।
SIR की प्रक्रिया में यही चरण नागरिकों के लिए अपने रिकॉर्ड में सुधार कराने, पात्रता संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत करने और मतदाता सूची में नाम बनाए रखने या शामिल कराने का अवसर देता है।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का महत्व
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल सवाल नोटिस प्रक्रिया की पारदर्शिता, सूचना की पर्याप्तता और चुनावी पुनरीक्षण के दौरान अपनाई जा रही प्रक्रिया से जुड़ा है। अदालत के सामने यह भी स्पष्ट हो सकता है कि संबंधित मतदाताओं को उनकी स्थिति और नोटिस के आधार के बारे में किस स्तर तक जानकारी दी जानी चाहिए।
हालांकि अदालत की सुनवाई को लेकर अभी किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष का दावा करना जल्दबाजी होगा। मंगलवार की सुनवाई में पक्षों की दलीलें, चुनाव आयोग का पक्ष और अदालत की टिप्पणियां आगे की दिशा तय करने में अहम होंगी।
मतदाता सूची और नागरिक अधिकार
मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनावी व्यवस्था का नियमित हिस्सा है। इसका उद्देश्य रिकॉर्ड में मृत, स्थानांतरित, दोहरे या अन्य अयोग्य प्रविष्टियों की पहचान करना और पात्र मतदाताओं का रिकॉर्ड दुरुस्त रखना है। लेकिन बड़े पैमाने पर होने वाली किसी भी पुनरीक्षण प्रक्रिया में पारदर्शिता और नागरिकों को प्रभावी आपत्ति का अवसर महत्वपूर्ण हो जाता है।
दिल्ली के मौजूदा SIR विवाद में इसी वजह से नोटिस प्रक्रिया पर विशेष ध्यान है। जिन नागरिकों को नोटिस मिला है, उनके लिए निर्धारित समयसीमा में संबंधित दस्तावेज जमा करना और आधिकारिक प्रक्रिया के माध्यम से अपनी आपत्ति दर्ज करना महत्वपूर्ण है।
अब आगे क्या
दिल्ली SIR से जुड़े करीब 33 लाख नोटिस का मामला अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सुनवाई के चरण में है। अदालत की सुनवाई में नोटिस जारी करने की प्रक्रिया, विसंगतियों की पहचान और संबंधित मतदाताओं को उपलब्ध कराए जा रहे विवरण पर चर्चा होने की उम्मीद है।
दिल्ली की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले दावे और आपत्तियों के निस्तारण की प्रक्रिया पूरी होनी है। उपलब्ध चुनावी कार्यक्रम के अनुसार अंतिम मतदाता सूची 4 नवंबर को प्रकाशित की जानी है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 33 लाख नोटिस और 47 लाख से अधिक मसौदा सूची से बाहर हुए नाम दो अलग-अलग आंकड़े और प्रक्रियाएं हैं। सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई यह तय करने में अहम होगी कि नोटिस प्रक्रिया से जुड़े कानूनी सवालों पर अदालत क्या रुख अपनाती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।