उत्तर प्रदेश सरकार ने हथकरघा उद्योग से जुड़े करीब 30 लाख लोगों के लिए योजनाओं, आर्थिक सहायता और टेक्सटाइल पार्क के जरिए रोजगार और बाजार विस्तार पर जोर दिया। यह पहल पारंपरिक उद्योग को आधुनिक इकोनॉमी से जोड़ने की कोशिश मानी जा रही है।
📍 लखनऊ
📰 07 अगस्त 2026
✍️ By Asif Khan
लखनऊ में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 के मौके पर उत्तर प्रदेश सरकार ने हथकरघा उद्योग को लेकर अपनी स्ट्रैटेजी साफ की। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य में इस सेक्टर से जुड़े करीब 30 लाख लोगों की आजीविका को मजबूत करना सरकार की प्राथमिकता है।
सरकार का दावा है कि पारंपरिक बुनकर समुदाय को टेक्नोलॉजी, फाइनेंस और मार्केट एक्सेस से जोड़कर उन्हें इकोनॉमिक सिस्टम में बेहतर जगह दिलाई जा रही है। यह बयान ऐसे वक्त आया है जब ग्रामीण रोजगार और कुटीर उद्योगों को लेकर बहस तेज है।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह के दौरान कई योजनाओं के लाभार्थियों को प्रतीकात्मक चेक दिए गए। ‘संत कबीर राज्य हथकरघा पुरस्कार योजना’ के तहत बुनकरों को सम्मानित किया गया।
सरकार के मुताबिक, मुख्यमंत्री हथकरघा उद्योग विकास योजना और झलकारी बाई कोरी योजना के जरिए करीब 40 हजार बुनकरों को 109 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद दी गई है। साथ ही बिजली दर में रियायत जैसी नीतियां भी लागू हैं।
यह पहल सीधे तौर पर उत्पादन लागत कम करने और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने से जुड़ी है।
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में स्वदेशी आंदोलन का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि हथकरघा उद्योग सिर्फ आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि आजादी के आंदोलन का अहम हिस्सा रहा है।
महात्मा गांधी ने खादी और हथकरघा को स्वतंत्रता संघर्ष का प्रतीक बनाया था। वहीं 2015 से हर साल 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जा रहा है।
यह संदर्भ सरकार के नैरेटिव को सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी फ्रेम में स्थापित करता है।
राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में करीब 14 से 15 लाख लोग सीधे हथकरघा उद्योग से जुड़े हैं। पावरलूम सेक्टर को जोड़ने पर यह संख्या करीब 30 लाख तक पहुंचती है।
यह सेक्टर मुख्य रूप से छोटे और मझोले स्तर पर काम करता है। इसमें परिवार आधारित उत्पादन मॉडल प्रमुख है।
मेरठ, मुरादाबाद, वाराणसी, भदोही, मऊ, आजमगढ़ जैसे जिले हस्तशिल्प और टेक्सटाइल उत्पादन के बड़े केंद्र हैं।
सरकार का फोकस अब लोकल से ग्लोबल रणनीति पर है। ‘एक जनपद, एक उत्पाद’ योजना के तहत स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग और एक्सपोर्ट को बढ़ावा दिया जा रहा है।
भदोही की कालीन इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान मिली है। नई संसद भवन में भी इसी क्षेत्र की कालीन का इस्तेमाल किया गया।
यह संकेत देता है कि सरकार घरेलू उत्पादन को प्रीमियम ब्रांड में बदलने की कोशिश कर रही है।
लखनऊ और हरदोई के बीच करीब 1000 एकड़ में पीएम मित्र मेगा टेक्सटाइल पार्क विकसित किया जा रहा है। इसके अलावा पांच अन्य टेक्सटाइल पार्क भी प्रस्तावित हैं।
इन पार्कों का उद्देश्य है
उत्पादन को क्लस्टर आधारित बनाना
लॉजिस्टिक्स लागत कम करना
निर्यात को आसान बनाना
यह मॉडल चीन और वियतनाम जैसे देशों के इंडस्ट्रियल क्लस्टर से प्रेरित माना जाता है।
हालांकि सरकारी दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर कई चुनौतियां मौजूद हैं।
बुनकर समुदाय लंबे समय से कच्चे माल की कीमत, बाजार तक पहुंच और मिडिलमैन सिस्टम से परेशान है। कई क्षेत्रों में मशीन आधारित उत्पादन से पारंपरिक हथकरघा को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक सीमित पहुंच भी एक बड़ी बाधा है।
सरकार का कहना है कि योजनाओं से रोजगार और आय में सुधार होगा। लेकिन कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ सब्सिडी और योजनाएं काफी नहीं हैं।
इकोनॉमिक एनालिसिस बताता है कि
मार्केट लिंकिंग
डिजिटल स्किल
ब्रांडिंग
इन तीन क्षेत्रों में तेजी से काम जरूरी है।
कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि योजनाओं का लाभ सभी बुनकरों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाता।
हथकरघा उद्योग उत्तर प्रदेश की ग्रामीण इकोनॉमी का अहम हिस्सा है। इस सेक्टर में सुधार सीधे तौर पर रोजगार, आय और ग्रामीण मांग को प्रभावित करता है।
राजनीतिक स्तर पर यह पहल बुनकर और हस्तशिल्पी समुदाय को साधने की रणनीति के तौर पर भी देखी जा रही है।
आर्थिक तौर पर, अगर एक्सपोर्ट बढ़ता है तो यह राज्य के राजस्व और विदेशी मुद्रा आय को भी मजबूत कर सकता है।
सरकार ने साफ संकेत दिया है कि आने वाले समय में टेक्नोलॉजी, ट्रेनिंग और मार्केटिंग पर जोर रहेगा।
यदि योजनाएं सही तरीके से लागू होती हैं तो
रोजगार में स्थिरता आ सकती है
ग्रामीण इकोनॉमी मजबूत हो सकती है
और भारत का पारंपरिक टेक्सटाइल सेक्टर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकता है
हथकरघा उद्योग सशक्तिकरण की दिशा में उत्तर प्रदेश सरकार ने कई कदम उठाए हैं। योजनाएं, फंडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर का खाका मौजूद है।
अब असली चुनौती क्रियान्वयन की है।
यदि नीति और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर कम हुआ, तो यह सेक्टर लाखों परिवारों की आर्थिक स्थिति बदल सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।