भारत-बांग्लादेश रिश्तों में नरमी के संकेत, तारिक से त्रिवेदी मिले
ढाका में बढ़ी हलचल, भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर नई पहल
तारिक-त्रिवेदी मुलाकात से क्या बदलेगा भारत-बांग्लादेश समीकरण?
ढाका में तारिक रहमान और भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी की पहली मुलाकात हुई। बातचीत ने रिश्ते सुधारने की इच्छा दिखाई, लेकिन शेख हसीना का प्रत्यर्पण, गंगा जल समझौता और चीन-पाकिस्तान से बांग्लादेश की बढ़ती निकटता अहम पेचीदगियां बनी हुई हैं। रॉ संपर्क और ब्रिक्स निमंत्रण के बीच आगे की कूटनीति रिश्तों की दिशा तय करेगी।
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ढाका/नई दिल्ली | 10 अगस्त 2026 |Asif khan
भारत-बांग्लादेश संबंधों में नए संपर्क का संकेत
भारत-बांग्लादेश संबंधों में कई महीनों की सियासी तल्ख़ी के बाद अब संवाद का रास्ता फिर सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। सोमवार को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी से पहली मुलाकात की और दोनों देशों के बीच रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत पर जोर दिया। यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब ढाका शेख हसीना के प्रत्यर्पण पर नई दिल्ली से कार्रवाई की मांग कर रहा है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इसी दौर में भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रॉ के प्रमुख पराग जैन की ढाका यात्रा और बांग्लादेशी खुफिया अधिकारियों के साथ बातचीत की खबरें भी सामने आईं। इससे संकेत मिलता है कि दोनों देशों के बीच संपर्क केवल राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षा और इंटेलिजेंस चैनल भी दोबारा सक्रिय किए जा रहे हैं। उपलब्ध स्रोतों में इस यात्रा की सार्वजनिक आधिकारिक पुष्टि सीमित है, इसलिए इसके एजेंडे को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
तारिक रहमान के सत्ता संभालने के बाद यह उनकी भारतीय उच्चायुक्त के साथ पहली मुलाकात थी। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, रहमान ने दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए एक अनुकूल माहौल की जरूरत बताई। भारत की ओर से भी सकारात्मक और आगे की ओर देखने वाले रुख का संकेत दिया गया है।
यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते अगस्त 2024 में शेख हसीना की सत्ता से बेदखली के बाद कठिन दौर में चले गए थे। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम व्यवस्था के दौरान दोनों देशों के बीच राजनीतिक भरोसा कमजोर हुआ और सुरक्षा, सीमा, व्यापार तथा हसीना की भारत में मौजूदगी जैसे मुद्दों ने तनाव बढ़ाया।
तारिक रहमान की सरकार के गठन के बाद तस्वीर में कुछ बदलाव आया है। नई दिल्ली ने उन्हें सितंबर में प्रस्तावित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में विशेष अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया है। बांग्लादेश ब्रिक्स का सदस्य नहीं है, लेकिन बिम्सटेक के अध्यक्ष के रूप में उसे आमंत्रित किया गया है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों में सबसे संवेदनशील मुद्दा अभी भी शेख हसीना का मामला है। हसीना अगस्त 2024 में बांग्लादेश छोड़कर भारत आई थीं। ढाका ने उनके प्रत्यर्पण की मांग की है और भारत ने कहा है कि वह इस अनुरोध की कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत समीक्षा कर रहा है।
हाल में हसीना ने भारत से ऑनलाइन मीडिया संवाद में दिसंबर में बांग्लादेश लौटने की इच्छा जताई। इस बयान के बाद ढाका ने तीखी प्रतिक्रिया दी और भारत के सामने अपनी आपत्ति दर्ज कराई। नई दिल्ली ने इससे दूरी बनाते हुए कहा कि कार्यक्रम एक निजी संस्था द्वारा आयोजित था और भारत सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं थी।
यही वजह है कि तारिक रहमान और दिनेश त्रिवेदी की मुलाकात को केवल सामान्य कूटनीतिक संपर्क के रूप में देखना अधूरा होगा। दोनों देशों के बीच संवाद बहाल रखने की कोशिश और हसीना के मुद्दे पर मतभेद, दोनों समानांतर चल रहे हैं।
भारत-बांग्लादेश संबंधों के सामने दूसरा बड़ा मुद्दा गंगा जल बंटवारे का समझौता है। 1996 में हुआ गंगा वाटर्स ट्रीटी दिसंबर 2026 में अपनी 30 साल की अवधि पूरी करने जा रहा है। इसलिए आने वाले महीनों में इसका नवीनीकरण या नया समझौता द्विपक्षीय कूटनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा।
बांग्लादेश की नई सरकार इस मुद्दे पर अपनी प्राथमिकताएं पहले ही स्पष्ट कर चुकी है। ढाका लंबे समय के लिए जल बंटवारे की व्यवस्था चाहता है, जबकि भारत के लिए भी नदी जल प्रबंधन, पर्यावरणीय बदलाव और पश्चिम बंगाल से जुड़े घरेलू हित महत्वपूर्ण हैं।
यह मामला केवल पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं है। गंगा और तीस्ता जैसे साझा नदी तंत्र दोनों देशों के कृषि, पर्यावरण और स्थानीय अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़े हैं। इसलिए इस मोर्चे पर बातचीत की दिशा भारत-बांग्लादेश संबंधों की वास्तविक मजबूती का अहम पैमाना बनेगी।
भारत के लिए बांग्लादेश की चीन के साथ बढ़ती रणनीतिक और आर्थिक नज़दीकी भी महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने जून में चीन का दौरा किया था। चीनी विदेश मंत्रालय के मुताबिक यह यात्रा 24 से 26 जून के बीच हुई थी।
इस दौरान बांग्लादेश ने इंफ्रास्ट्रक्चर, नदी प्रबंधन और आर्थिक सहयोग से जुड़े कई प्रस्तावों पर चीन के साथ बातचीत आगे बढ़ाई। तीस्ता नदी के व्यापक प्रबंधन और आर्थिक कॉरिडोर से जुड़े चीनी प्रस्तावों ने नई दिल्ली का ध्यान खींचा है।
भारत ने तीस्ता से जुड़े चीन समर्थित विकास प्रस्ताव पर कहा है कि वह पड़ोसी देशों में होने वाले ऐसे घटनाक्रमों पर नजर रखता है और जरूरत के मुताबिक उचित कदम उठाएगा। इससे साफ है कि ढाका की आर्थिक जरूरतें और नई दिल्ली की जियोपॉलिटिकल चिंताएं एक ही समय पर सामने आ रही हैं।
बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच रक्षा संपर्क बढ़ने की खबरों ने भी क्षेत्रीय समीकरण को जटिल बनाया है। जेएफ-17 ब्लॉक-3 लड़ाकू विमानों को लेकर संभावित खरीद पर रिपोर्टें सामने आई हैं, लेकिन ऐसी रिपोर्टों को अंतिम रक्षा सौदे के रूप में पेश करना अभी उचित नहीं होगा।
ढाका के लिए यह सैन्य आधुनिकीकरण और विकल्पों को व्यापक बनाने का हिस्सा हो सकता है। भारत के लिए बांग्लादेश की रक्षा साझेदारियों में चीन और पाकिस्तान की भूमिका सुरक्षा दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण है।
यहीं पर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा होती है। बांग्लादेश अपनी विदेश नीति में अधिक रणनीतिक विकल्प चाहता है, जबकि भारत चाहता है कि उसके पड़ोस में ऐसे सुरक्षा नेटवर्क न बनें जो भविष्य में उसकी सीमा और पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए चुनौती पैदा करें।
खुफिया एजेंसियों के बीच संपर्क सामान्य कूटनीतिक संवाद से अलग प्रकृति रखता है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेश के सैन्य खुफिया प्रमुख ने फरवरी के बाद नई दिल्ली में भारतीय सुरक्षा अधिकारियों और रॉ प्रमुख पराग जैन से मुलाकात की थी। इसे दोनों देशों के बीच सुरक्षा संपर्क बहाल होने के संकेत के तौर पर देखा गया था।
अब ढाका में रॉ प्रमुख की कथित बातचीत उसी व्यापक प्रक्रिया की अगली कड़ी हो सकती है। बांग्लादेश की सुरक्षा स्थिति, सीमा पार नेटवर्क और क्षेत्रीय चरमपंथ से जुड़े मुद्दे दोनों देशों के लिए साझा चिंता का विषय हैं।
लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। खुफिया बातचीत का वास्तविक एजेंडा आम तौर पर सार्वजनिक नहीं किया जाता। इसलिए उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर केवल इतना कहना उचित है कि सुरक्षा संपर्क बढ़ने के संकेत हैं, जबकि बातचीत के विशिष्ट विषयों की स्वतंत्र सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई है।
बांग्लादेश के साथ अमेरिकी संपर्क भी हाल के महीनों में सक्रिय रहा है। अमेरिका के दक्षिण और मध्य एशिया मामलों के विशेष दूत सर्जियो गोर ने जुलाई के अंत में ढाका का दौरा किया और प्रधानमंत्री तारिक रहमान तथा बांग्लादेशी अधिकारियों से मुलाकात की। यह यात्रा तारिक रहमान की चीन यात्रा के बाद हुई थी।
गोर ने भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी के कार्यभार संभालने पर भी उन्हें शुभकामनाएं दी थीं। इससे क्षेत्रीय कूटनीति में भारत, अमेरिका और बांग्लादेश के बीच बढ़ते संवाद का संकेत मिलता है।
हालांकि यह दावा करना जल्दबाजी होगा कि अमेरिका ने बांग्लादेश को भारत के करीब आने के लिए मजबूर किया है। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड इतना जरूर दिखाता है कि वॉशिंगटन ढाका की विदेश नीति, चीन के साथ उसके संबंध और क्षेत्रीय सुरक्षा को गंभीरता से देख रहा है।
नरमी के संकेत जरूर हैं, लेकिन इसे पूर्ण सुधार कहना अभी जल्दबाजी होगी। एक तरफ प्रधानमंत्री स्तर पर संवाद शुरू हुआ है, भारत ने ब्रिक्स के लिए निमंत्रण दिया है और सुरक्षा संपर्क बढ़ने की खबरें हैं। दूसरी तरफ हसीना प्रत्यर्पण, गंगा जल समझौता, तीस्ता, व्यापार और चीन-पाकिस्तान से बांग्लादेश के संबंध जैसे मुद्दे अभी खुले हुए हैं।
यही इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए रिश्ते खराब करने की आर्थिक और सुरक्षा लागत काफी अधिक है। सीमा, व्यापार, ऊर्जा, कनेक्टिविटी, नदी जल और पूर्वोत्तर भारत से जुड़े हित दोनों देशों को संवाद की मेज पर बनाए रखते हैं।
बांग्लादेश के लिए भारत के साथ स्थिर संबंध उसकी आर्थिक और क्षेत्रीय कूटनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। भारत के लिए भी एक स्थिर और सहयोगी बांग्लादेश पूर्वोत्तर क्षेत्र, बंगाल की खाड़ी और हिंद-प्रशांत रणनीति के लिहाज से अहम है।
आने वाले महीनों में तीन घटनाक्रम खास तौर पर निगरानी में रहेंगे। पहला, तारिक रहमान सितंबर में नई दिल्ली में ब्रिक्स कार्यक्रम में शामिल होते हैं या नहीं। दूसरा, गंगा जल समझौते के नवीनीकरण पर दोनों देशों की बातचीत कितनी आगे बढ़ती है। तीसरा, शेख हसीना के प्रत्यर्पण के सवाल पर भारत और बांग्लादेश किस तरह का रास्ता निकालते हैं।
यदि राजनीतिक नेतृत्व संवाद बनाए रखता है और संवेदनशील मुद्दों को अलग-अलग चैनलों में संभालता है, तो संबंधों में क्रमिक सुधार की गुंजाइश है। लेकिन यदि हसीना का मामला, जल विवाद या चीन-पाकिस्तान से जुड़ा सुरक्षा विमर्श घरेलू सियासत में ज्यादा हावी हुआ, तो मौजूदा कूटनीतिक नरमी फिर दबाव में आ सकती है।
सबसे बड़ा बदलाव उच्चस्तरीय राजनीतिक संपर्क का फिर सक्रिय होना है। तारिक रहमान और भारतीय उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी की पहली मुलाकात ने संवाद की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का संकेत दिया है।
शेख हसीना का भारत में रहना और उनके प्रत्यर्पण की बांग्लादेश की मांग सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है। भारत इस अनुरोध की कानूनी प्रक्रिया के तहत समीक्षा कर रहा है।
1996 का समझौता दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाला है। इसके नवीनीकरण की बातचीत दोनों देशों के रिश्तों की अगली बड़ी परीक्षा होगी।
तीस्ता नदी विकास और आर्थिक कॉरिडोर जैसे प्रस्ताव भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी से जुड़े हितों को प्रभावित कर सकते हैं। नई दिल्ली इन घटनाक्रमों पर नजर रख रही है।
नहीं। संवाद में सुधार के संकेत हैं, लेकिन हसीना प्रत्यर्पण, नदी जल, व्यापार और क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरण जैसे मुद्दे अभी भी समाधान की प्रतीक्षा में हैं।
भारत-बांग्लादेश संबंधों में फिलहाल सबसे स्पष्ट संकेत संवाद की वापसी का है। तारिक रहमान और दिनेश त्रिवेदी की मुलाकात, ब्रिक्स निमंत्रण और सुरक्षा स्तर पर संपर्क बढ़ने की खबरें बताती हैं कि दोनों पक्ष रिश्तों को पूरी तरह टकराव की दिशा में नहीं जाने देना चाहते।
फिर भी वास्तविक नरमी की कसौटी बयान नहीं, बल्कि अगले कुछ महीनों में होने वाली ठोस पेशरफ़्त होगी। गंगा जल समझौता, हसीना प्रत्यर्पण, चीन के साथ बांग्लादेश के संबंध और सुरक्षा सहयोग यह तय करेंगे कि मौजूदा कूटनीतिक संपर्क स्थायी सुधार में बदलता है या केवल तनाव के बीच एक अस्थायी विराम साबित होता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।