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ब्रिक्स में भारत की बड़ी कूटनीतिक कामयाबी, ईरान-UAE मतभेद के बीच साझा घोषणापत्र पर बनी सहमति

Wasi Siddiqui • 2026-09-12 15:19:33
ब्रिक्स में भारत की बड़ी कूटनीतिक कामयाबी, ईरान-UAE मतभेद के बीच साझा घोषणापत्र पर बनी सहमति

नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में ईरान और यूएई के मतभेदों के बीच भारत ने साझा घोषणापत्र पर सहमति बनाने में अहम भूमिका निभाई। बातचीत रात 4 बजे तक चली।

📍 नई दिल्ली
🗓️ 12 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui

ब्रिक्स में भारत की कूटनीतिक परीक्षा

नई दिल्ली में हो रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले भारत के सामने सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती सदस्य देशों को पश्चिम एशिया के संकट पर साझा रुख के लिए तैयार करना थी। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच संघर्ष को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण ने साझा घोषणापत्र की भाषा को लेकर पेचीदा स्थिति पैदा कर दी थी।

रॉयटर्स के मुताबिक, सदस्य देशों के बीच साझा घोषणापत्र पर सहमति बन गई है। प्रस्तावित दस्तावेज में किसी विशेष देश का नाम लिए बिना एकतरफा युद्ध या सैन्य कार्रवाई की निंदा की जाएगी। हालांकि, नेताओं की औपचारिक मंजूरी अभी प्रक्रिया का हिस्सा है।

ईरान और यूएई के रुख में बड़ा अंतर

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने ब्रिक्स के भीतर गंभीर कूटनीतिक पेच पैदा किया। ईरान चाहता था कि उस पर हुए एकतरफा हमले और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के कथित उल्लंघन का स्पष्ट उल्लेख हो।

दूसरी ओर, यूएई ईरान की ओर से अपने क्षेत्र और संप्रभुता पर हुए हमलों के मुद्दे को प्रमुखता देना चाहता था। इस वजह से घोषणापत्र में इस्तेमाल होने वाली भाषा पर सदस्य देशों के बीच सहमति आसान नहीं थी।

सऊदी अरब की मौजूदगी ने भी पश्चिम एशिया से जुड़े समीकरण को और संवेदनशील बनाया। ऐसे माहौल में भारत को ऐसी भाषा तैयार करनी थी, जिसे अलग-अलग पक्ष अपने मूल रुख से पूरी तरह समझौता किए बिना स्वीकार कर सकें।

भारत ने अपनाया संतुलित कूटनीतिक रास्ता

भारत की रणनीति किसी एक पक्ष के आरोप को घोषणापत्र की केंद्रीय भाषा बनाने के बजाय व्यापक सिद्धांतों पर सहमति तैयार करने की रही। इसमें संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, अंतरराष्ट्रीय कानून और एकतरफा सैन्य कार्रवाई जैसे मुद्दों को व्यापक संदर्भ में रखने की कोशिश हुई।

भारत पहले से पश्चिम एशिया के संकट पर संवाद और कूटनीति को प्राथमिक समाधान के रूप में पेश करता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से मुलाकात के दौरान भी संवाद, कूटनीति, क्षेत्रीय शांति, समुद्री आवाजाही और व्यापार की सुरक्षा पर जोर दिया।

यही रुख ब्रिक्स के भीतर सहमति बनाने की कोशिशों के साथ भी जुड़ा दिखाई दिया।

रात 4 बजे तक चली बातचीत

इस सहमति तक पहुंचना आसान नहीं था। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की अगुवाई में अलग-अलग देशों के साथ बातचीत देर रात तक चलती रही। टाइम्स ऑफ इंडिया ने सूत्रों के हवाले से बताया कि वार्ता शनिवार सुबह करीब 4 बजे तक चली और इसके दौरान ईरान, सऊदी अरब तथा यूएई के बीच साझा भाषा तैयार करने पर जोर दिया गया।

यह घटनाक्रम बताता है कि विस्तारित ब्रिक्स में कूटनीतिक सहमति तैयार करना पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया है। संगठन अब केवल आर्थिक सहयोग का मंच नहीं रह गया है। इसके सदस्य देशों के रणनीतिक हित और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं कई मुद्दों पर अलग-अलग हैं।

घोषणापत्र में किसी देश का नाम नहीं

मौजूदा सहमति का सबसे अहम पहलू यह है कि प्रस्तावित घोषणापत्र में किसी विशेष देश को सीधे निशाना बनाने के बजाय एकतरफा युद्ध या सैन्य कार्रवाई की व्यापक निंदा की जाएगी।

इस भाषा से ब्रिक्स के अलग-अलग सदस्य अपने मूल राष्ट्रीय रुख को बनाए रखते हुए सामूहिक दस्तावेज का हिस्सा बन सकते हैं। रॉयटर्स के अनुसार, चार सूत्रों ने पुष्टि की कि साझा घोषणापत्र में किसी देश का नाम लिए जाने की संभावना नहीं है।

यह तरीका कूटनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी एक पक्ष को सीधे जिम्मेदार ठहराने वाली भाषा पर सहमति बनाना अधिक कठिन होता।

ब्रिक्स के लिए भी बड़ा परीक्षण

भारत की अध्यक्षता में हो रहा यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब ब्रिक्स का विस्तार हो चुका है। अब संगठन में 11 सदस्य हैं। इनमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और यूएई शामिल हैं।

भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता का घोषित फोकस लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास पर है। नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने वाला शिखर सम्मेलन इसी व्यापक एजेंडे के तहत आयोजित किया जा रहा है।

लेकिन पश्चिम एशिया का संकट इस सम्मेलन के लिए अलग स्तर की चुनौती लेकर आया है। संगठन के भीतर ही ऐसे देश मौजूद हैं जिनके क्षेत्रीय हित एक-दूसरे से टकराते हैं।

भारत के लिए क्यों अहम है यह सहमति

भारत के लिए यह केवल एक घोषणापत्र तैयार कराने का मामला नहीं है। यह उसकी अध्यक्षता में ब्रिक्स की सामूहिक कार्यक्षमता का परीक्षण भी है।

अगर अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं वाले 11 देश किसी संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दे पर साझा भाषा स्वीकार करते हैं, तो इससे भारत की वार्ता क्षमता और मध्यस्थता संबंधी कूटनीतिक भूमिका को मजबूती मिलती है।

हालांकि इसे किसी औपचारिक मध्यस्थता या विवाद के पूर्ण समाधान के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। ईरान और यूएई के बीच क्षेत्रीय मतभेद अपनी जगह कायम हैं। सहमति मुख्य रूप से ब्रिक्स के साझा दस्तावेज की भाषा को लेकर बनी है।

ब्रिक्स का विस्तार और बढ़ती चुनौती

ब्रिक्स के विस्तार ने संगठन की राजनीतिक हैसियत बढ़ाई है, लेकिन इसके साथ आंतरिक मतभेदों की संभावना भी बढ़ी है।

पहले पांच देशों वाले समूह में भी अलग-अलग मुद्दों पर मतभेद होते थे। अब 11 सदस्यों के साथ आर्थिक हित, क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार और भू-राजनीति से जुड़े समीकरण कहीं अधिक जटिल हैं।

भारत की चुनौती इसलिए केवल घोषणापत्र तैयार करना नहीं थी। उसे ऐसी सहमति बनानी थी जिसमें अलग-अलग क्षेत्रीय धड़ों के लिए स्वीकार्य भाषा मौजूद हो।

पश्चिम एशिया संकट का असर

ब्रिक्स सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया में संघर्ष ने ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ाया है।

भारत के लिए समुद्री आवाजाही और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा विशेष महत्व रखती है। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति के साथ बातचीत में भी क्षेत्र में स्वतंत्र आवाजाही, वाणिज्य और समुद्री सुरक्षा पर जोर दिया था।

इसका सीधा संबंध वैश्विक अर्थव्यवस्था से है। पश्चिम एशिया में लंबे समय तक अस्थिरता रहने से ऊर्जा बाजार, माल ढुलाई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर असर पड़ सकता है।

क्या यह भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत है

भारत के दृष्टिकोण से इसे कूटनीतिक उपलब्धि कहना उचित है, खासकर इसलिए क्योंकि सहमति ऐसे समय बनी जब ब्रिक्स के भीतर पश्चिम एशिया को लेकर स्पष्ट मतभेद मौजूद थे।

लेकिन संपादकीय तौर पर इसे पूर्ण कूटनीतिक विजय या ईरान-यूएई विवाद के समाधान के रूप में पेश करना जल्दबाजी होगी। साझा घोषणापत्र पर सहमति और क्षेत्रीय विवाद का समाधान दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

भारत की वास्तविक सफलता इस बात में है कि उसने अलग-अलग राष्ट्रीय हितों के बीच ऐसी भाषा के लिए जगह बनाई, जिसे सभी पक्ष स्वीकार करने की स्थिति में आए।

आगे क्या होगा

अब निगाह ब्रिक्स नेताओं की औपचारिक मंजूरी और नई दिल्ली घोषणापत्र के अंतिम पाठ पर है। यदि प्रस्तावित भाषा बिना बड़े बदलाव के स्वीकार होती है, तो यह भारत की अध्यक्षता में consensus-building की महत्वपूर्ण मिसाल होगी।

इससे यह भी पता चलेगा कि विस्तारित ब्रिक्स गंभीर भू-राजनीतिक संकटों पर कितनी प्रभावी सामूहिक आवाज तैयार कर सकता है।

भारत के लिए चुनौती आगे भी बनी रहेगी। ब्रिक्स में आर्थिक सहयोग, वैश्विक शासन सुधार, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार जैसे मुद्दों पर सहमति बनाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। लेकिन पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील सुरक्षा मुद्दों पर साझा रुख तैयार करना कहीं अधिक कठिन है।


नई दिल्ली में ब्रिक्स की यह कूटनीतिक कवायद भारत की अध्यक्षता के लिए अहम परीक्षा थी। ईरान और यूएई के बीच गहरे मतभेदों के बावजूद सदस्य देशों को साझा घोषणापत्र की भाषा पर सहमत करने की प्रक्रिया में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रात 4 बजे तक चली बातचीत इस प्रक्रिया की जटिलता को दिखाती है। अब अंतिम कसौटी नेताओं की मंजूरी और घोषणापत्र के अंतिम पाठ की होगी। अगर सहमति कायम रहती है, तो भारत के लिए यह बहुपक्षीय कूटनीति में एक उल्लेखनीय उपलब्धि होगी, जबकि ब्रिक्स के लिए यह उसकी आंतरिक एकजुटता का महत्वपूर्ण परीक्षण साबित होगा।

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Wasi Siddiqui

Wasi Siddiqui

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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