प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की विदेश नीति का बुनियादी रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत किसी के विरुद्ध नहीं है। उन्होंने शांति, संवाद, संप्रभुता और सहयोग को प्राथमिकता दी।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 12 सितंबर 2026
✍️ वसी सिद्दीकी
भारत का रुख, टकराव नहीं सहयोग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक तनाव और बदलते भू-राजनीतिक माहौल के बीच भारत की विदेश नीति के मूल रुख को रेखांकित किया है। उनका संदेश है कि भारत किसी देश के विरुद्ध खड़ा होने के बजाय शांति, संवाद और सहयोग को प्राथमिकता देता है।
प्रधानमंत्री के सार्वजनिक बयानों में यह दृष्टिकोण लगातार सामने आया है। भारत नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान तथा विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करता है।
क्वाड के मंच से भी दिया था स्पष्ट संदेश
प्रधानमंत्री मोदी ने सितंबर 2024 में क्वाड शिखर सम्मेलन में इसी नीति को स्पष्ट शब्दों में रखा था। उन्होंने कहा था कि क्वाड किसी के खिलाफ नहीं है और समूह नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान का समर्थन करता है।
उस वक्त दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष और तनाव की स्थिति थी। ऐसे माहौल में मोदी ने लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर सहयोग को मानवता के हित से जोड़ा था।
क्वाड में भारत के अलावा अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। चीन लंबे समय से क्वाड की रणनीतिक भूमिका पर सवाल उठाता रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री का बयान समूह की आधिकारिक प्राथमिकताओं को लेकर भारत की स्थिति स्पष्ट करने वाला माना गया था।
भारत की विदेश नीति में संवाद पर जोर
भारत ने पश्चिम एशिया और दूसरे अंतरराष्ट्रीय संकटों पर भी बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान का समर्थन किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2026 में पश्चिम एशिया के संघर्ष पर लोकसभा में कहा था कि भारत तनाव कम करने और संघर्ष समाप्त करने के प्रयासों के पक्ष में है। उन्होंने बातचीत और कूटनीति को समाधान का रास्ता बताया था।
यह रुख भारत की उस व्यापक कूटनीतिक नीति से जुड़ा है जिसमें राष्ट्रीय हितों की रक्षा के साथ विभिन्न देशों के साथ संवाद और संपर्क बनाए रखने पर जोर दिया जाता है।
पश्चिम एशिया संकट में भारत की चुनौती
पश्चिम एशिया में संघर्ष का भारत पर सीधा आर्थिक और रणनीतिक असर पड़ता है। ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और सप्लाई चेन इससे प्रभावित होते हैं।
प्रधानमंत्री ने 2026 में संसद में होर्मुज़ जलडमरूमध्य के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा था कि भारत के लिए कच्चे तेल, गैस और उर्वरक जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति इस समुद्री मार्ग से जुड़ी है। युद्ध के बाद वहां जहाजों की आवाजाही चुनौतीपूर्ण हुई थी।
ऐसी परिस्थिति में भारत के सामने एक साथ कई प्राथमिकताएं रहती हैं। देश की ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखना, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम करने की कोशिश करना इनमें प्रमुख हैं।
एससीओ में भी भारत ने रखा सहयोग का एजेंडा
सितंबर 2026 में एससीओ शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने सुरक्षा, कनेक्टिविटी और अवसर को भारत की प्राथमिकताओं के तीन प्रमुख स्तंभों के रूप में रखा। उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई के साथ संवाद और कूटनीति के जरिए क्षेत्रीय शांति की जरूरत पर जोर दिया।
प्रधानमंत्री ने पश्चिम एशिया के संकट को व्यापक वैश्विक असर से जोड़ते हुए कहा कि किसी एक क्षेत्र का संघर्ष ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और वैश्विक सप्लाई चेन पर असर डाल सकता है। उन्होंने संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति का समर्थन दोहराया।
“सबके साथ” की नीति का मतलब
भारत का “सबके साथ” वाला दृष्टिकोण केवल कूटनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। भारत एक साथ अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ अपने रिश्ते आगे बढ़ाता रहा है।
भारत अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक और आर्थिक सहयोग बढ़ा रहा है। दूसरी ओर रूस के साथ भी उसके ऐतिहासिक रक्षा और ऊर्जा संबंध हैं। पश्चिम एशिया में भारत के खाड़ी देशों के साथ आर्थिक और प्रवासी भारतीयों से जुड़े महत्वपूर्ण हित हैं।
ईरान के साथ भारत के संबंधों में चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया तक संपर्क जैसे मुद्दे अहम हैं। इसी तरह एससीओ और दूसरे बहुपक्षीय मंचों पर भारत रूस, चीन और मध्य एशिया के देशों के साथ भी संवाद करता है।
इस नीति का मूल उद्देश्य किसी एक शक्ति खेमे का हिस्सा बनने के बजाय भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप स्वतंत्र रणनीतिक विकल्प बनाए रखना है।
शांति का संदेश और राष्ट्रीय हित
प्रधानमंत्री मोदी के बयानों में शांति और कूटनीति के साथ राष्ट्रीय हित की प्राथमिकता भी स्पष्ट दिखाई देती है। भारत आतंकवाद के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाता है और आतंकवाद को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं करने की बात करता है।
एससीओ में प्रधानमंत्री ने आतंकवाद की फंडिंग, भर्ती, कट्टरपंथ और सुरक्षित ठिकानों के पूरे तंत्र के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की जरूरत बताई। साथ ही उन्होंने दोहरे मानदंड से बचने की बात कही।
इससे भारत की नीति का दूसरा पहलू सामने आता है। भारत शांति और संवाद का समर्थन करता है, लेकिन सुरक्षा से जुड़े मामलों में अपनी चिंताओं को भी स्पष्ट रूप से सामने रखता है।
बदलती दुनिया में भारत की भूमिका
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में इस समय कई स्तरों पर बदलाव हो रहे हैं। पश्चिम एशिया के संघर्ष, यूरोप की सुरक्षा स्थिति, व्यापारिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों ने देशों के सामने नई रणनीतिक चुनौतियां खड़ी की हैं।
भारत ऐसे माहौल में अपने लिए संतुलित कूटनीतिक भूमिका तलाश रहा है। नई दिल्ली का जोर संवाद बनाए रखने, आर्थिक हितों की रक्षा करने और रणनीतिक स्वायत्तता कायम रखने पर है।
एससीओ में प्रधानमंत्री ने साझा भूगोल को साझा अवसरों में बदलने और सरकार आधारित सहयोग से आगे बढ़कर लोगों के बीच संबंध मजबूत करने की जरूरत बताई।
आगे की राह
भारत के सामने आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह बढ़ते वैश्विक ध्रुवीकरण के बीच अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता कितनी प्रभावी ढंग से बनाए रखता है।
एक तरफ भारत को अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को आगे बढ़ाना है। दूसरी तरफ रूस, ईरान, चीन और मध्य एशिया के साथ भी संवाद के रास्ते खुले रखने हैं।
ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, आतंकवाद, सप्लाई चेन और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा जैसे मुद्दे इस नीति की व्यावहारिक परीक्षा लेते रहेंगे।
प्रधानमंत्री का “हम किसी के विरुद्ध नहीं, सबके साथ हैं” वाला संदेश इसी व्यापक कूटनीतिक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है। भारत का आधिकारिक रुख टकराव के बजाय संवाद, संप्रभुता के सम्मान और शांतिपूर्ण समाधान पर केंद्रित है। साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों पर भारत अपनी स्थिति स्पष्ट रखने की नीति पर कायम है।