पॉक्सो जागरूकता अभियान में छात्राओं को मिले बाल अधिकारों के सबक
दिल्ली के स्कूल में पॉक्सो जागरूकता, साइबर सुरक्षा पर जोर
छात्राओं को पॉक्सो कानून की जानकारी, सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान
दिल्ली के एक कन्या विद्यालय में पॉक्सो जागरूकता अभियान आयोजित हुआ। छात्राओं को बाल अधिकार, गुड टच-बैड टच, साइबर सुरक्षा और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की जानकारी दी गई। कार्यक्रम में दिल्ली बाल अधिकार आयोग की सदस्य स्वाति गुप्ता शामिल हुईं। पहल का मकसद बच्चों को कानूनी सुरक्षा और सुरक्षित व्यवहार के प्रति सजग बनाना रहा।
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दिलशाद गार्डन, दिल्ली | 11 अगस्त 2026 |Mohd Naved
छात्राओं के लिए पॉक्सो जागरूकता अभियान आयोजित
दिल्ली के दिलशाद गार्डन स्थित मोतीराम स्मारक कन्या उच्चतम माध्यमिक विद्यालय में छात्राओं को बाल सुरक्षा और उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए पॉक्सो जागरूकता अभियान आयोजित किया गया। आयोजन मुखर्जी मेमोरियल स्कूल शाहदरा सोसाइटी के अंतर्गत संचालित विद्यालय में हुआ। उपलब्ध आयोजन सामग्री के मुताबिक कार्यक्रम का केंद्र छात्राओं को शोषण की पहचान, सुरक्षित व्यवहार और शिकायत से जुड़े अधिकारों की जानकारी देना रहा।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर स्वाति गुप्ता शामिल हुईं। दिल्ली सरकार की जुलाई 2026 की राजपत्र अधिसूचना में स्वाति गुप्ता को दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स, डीसीपीसीआर, की सदस्य नियुक्त किए जाने की पुष्टि होती है। राजपत्र के मुताबिक आयोग में अध्यक्ष के साथ चार सदस्यों की नियुक्ति की गई है।
आयोजकों की ओर से जारी जानकारी के अनुसार स्वाति गुप्ता ने छात्राओं को पॉक्सो अधिनियम, गुड टच-बैड टच, साइबर सुरक्षा और किसी भी प्रकार के शोषण के खिलाफ निर्भीक होकर आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। आयोजन सामग्री में उनके सामाजिक सेवा क्षेत्र में तीन दशक से अधिक अनुभव का भी उल्लेख किया गया है, हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हुई है।
पॉक्सो यानी प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट, 2012 बच्चों को यौन हमला, यौन उत्पीड़न और पोर्नोग्राफिक शोषण से सुरक्षा देने वाला केंद्रीय कानून है। कानून के तहत 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को बच्चा माना गया है और बच्चों के मामलों की सुनवाई के लिए स्पेशल कोर्ट की व्यवस्था भी की गई है।
इस कानून की अहमियत केवल अपराध के बाद कार्रवाई तक सीमित नहीं है। पॉक्सो अधिनियम की धारा 43 केंद्र और राज्य सरकारों को बच्चों, अभिभावकों और आम जनता के बीच कानून के प्रावधानों को लेकर नियमित जागरूकता फैलाने तथा संबंधित अधिकारियों को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी देती है।
पॉक्सो कानून में रिपोर्टिंग को खास महत्व दिया गया है। धारा 19 के तहत किसी व्यक्ति को यदि यह आशंका है कि कानून के तहत अपराध होने वाला है या उसे अपराध के बारे में जानकारी है, तो वह विशेष किशोर पुलिस इकाई या स्थानीय पुलिस को सूचना दे सकता है। बच्चे की ओर से दी गई सूचना को ऐसी सरल भाषा में दर्ज किया जाना चाहिए जिसे वह समझ सके।
कानून में यह भी प्रावधान है कि बच्चे को देखभाल और संरक्षण की जरूरत होने पर पुलिस को आवश्यक व्यवस्था करनी है। गंभीर मामलों में बच्चे की सुरक्षा, मेडिकल सहायता और संबंधित बाल कल्याण व्यवस्था तक पहुंच सुनिश्चित करना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।
रिपोर्ट नहीं करने को भी कानून गंभीरता से देखता है। पॉक्सो अधिनियम की धारा 21 में अपराध की रिपोर्ट करने में विफल रहने के लिए सजा का प्रावधान है। किसी संस्था के प्रभारी की ओर से अपने नियंत्रण में काम करने वाले व्यक्ति से संबंधित अपराध की रिपोर्ट नहीं करने पर भी अलग दंड का प्रावधान है।
पॉक्सो मामलों में मीडिया की भूमिका को लेकर भी कानून स्पष्ट प्रावधान करता है। धारा 23 बच्चे की पहचान को सार्वजनिक होने से बचाती है और नाम, पता, तस्वीर, परिवार की जानकारी, स्कूल तथा ऐसी अन्य जानकारी प्रकाशित करने पर रोक लगाती है जिससे बच्चे की पहचान उजागर हो सकती है।
एक जिम्मेदार न्यूज़ प्लेटफॉर्म के लिए यह प्रावधान विशेष महत्व रखता है। बाल यौन अपराधों की रिपोर्टिंग में घटना की जानकारी देना जरूरी है, लेकिन बच्चे की पहचान की हिफाज़त उससे भी महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है।
स्कूल बच्चों के लिए शिक्षा के साथ सामाजिक और व्यक्तिगत सुरक्षा की समझ विकसित करने की अहम जगह हैं। ऐसे कार्यक्रम बच्चों को यह समझने में मदद करते हैं कि असहज स्पर्श, धमकी, ब्लैकमेल, अनुचित डिजिटल संपर्क या किसी तरह का यौन व्यवहार सामान्य नहीं है।
दिलशाद गार्डन स्थित इस विद्यालय में आयोजित अभियान में गुड टच-बैड टच और साइबर सुरक्षा को पॉक्सो कानून के साथ जोड़ना इसी व्यापक सुरक्षा दृष्टिकोण का हिस्सा रहा। आयोजन सामग्री के मुताबिक छात्राओं को शोषण के खिलाफ आवाज उठाने और अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने का संदेश दिया गया।
पॉक्सो कानून डिजिटल माध्यमों से जुड़े शोषण को भी नजरअंदाज नहीं करता। कानून में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल माध्यमों से बच्चों को लगातार फॉलो या संपर्क करने, धमकाने और पोर्नोग्राफिक गतिविधियों में इस्तेमाल करने से जुड़े प्रावधान शामिल हैं।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का पॉक्सो ई-बॉक्स भी बच्चों से जुड़े उत्पीड़न की शिकायतों के लिए डिजिटल माध्यम उपलब्ध कराता है। इसके इंटरफेस में स्कूल, इंटरनेट या फोन, स्कूल बस, परिवार या रिश्तेदार और ब्लैकमेल जैसे संदर्भों में शिकायत दर्ज करने के विकल्प दिए गए हैं।
आयोजन में मुखर्जी मेमोरियल स्कूल शाहदरा सोसाइटी की अध्यक्षा जयंती गोयला, विद्यालय के प्रबंधक अशोक कुमार गुप्ता और उपप्रधानाचार्य प्रमिता गौतम की मौजूदगी रही। कार्यक्रम के अंत में विद्यालय परिवार ने मुख्य अतिथि और अन्य अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
मुखर्जी मेमोरियल स्कूल शाहदरा सोसाइटी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार संस्था वर्ष 1955 में स्थापित हुई थी और वर्तमान में वह कई शैक्षणिक संस्थानों का संचालन करती है। वेबसाइट पर मोतीराम मेमोरियल गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल को सोसाइटी के अंतर्गत संचालित संस्थानों में शामिल किया गया है।
ऐसे कार्यक्रमों का असर तभी टिकाऊ बनता है जब जागरूकता के साथ स्कूल स्तर पर स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था भी मौजूद हो। छात्राओं को यह पता होना चाहिए कि किसी असहज घटना की जानकारी किस शिक्षक, अभिभावक, पुलिस इकाई या बाल संरक्षण व्यवस्था तक पहुंचानी है।
पॉक्सो कानून बच्चे के बयान और जांच प्रक्रिया में भी कई सुरक्षा प्रावधान रखता है। कानून के मुताबिक बच्चे का बयान उसके निवास या उसकी पसंद की जगह पर दर्ज करने की व्यवस्था है और यथासंभव महिला पुलिस अधिकारी द्वारा बयान दर्ज किया जाना चाहिए। बच्चे को रात में पुलिस थाने में रखने पर भी रोक है।
कानून बच्चे की सहायता के लिए अभिभावक या भरोसेमंद व्यक्ति की मौजूदगी, जरूरत पड़ने पर अनुवादक या विशेषज्ञ की मदद और कानूनी सहायता जैसी व्यवस्थाओं को भी मान्यता देता है। इससे साफ होता है कि बाल संरक्षण का मकसद केवल आरोपी के खिलाफ कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया में बच्चे के हित और गरिमा की रक्षा करना भी है।
पॉक्सो जागरूकता को केवल एक स्कूल कार्यक्रम तक सीमित देखना पर्याप्त नहीं होगा। कानून में जागरूकता को खुद एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी माना गया है, लेकिन जमीन पर इसकी कामयाबी इस बात से जुड़ी है कि बच्चे, परिवार, शिक्षक और संस्थान कानून की प्रक्रिया को कितना समझते हैं।
दूसरी चुनौती यह है कि बच्चों से जुड़े मामलों में रिपोर्टिंग और गोपनीयता के बीच संतुलन बना रहे। शिकायत को दबाना कानून की भावना के खिलाफ है, लेकिन बच्चे की पहचान उजागर करना भी गंभीर कानूनी जोखिम पैदा करता है। इसलिए स्कूलों और मीडिया दोनों के लिए संवेदनशील और नियम आधारित प्रक्रिया जरूरी है।
बच्चों की सुरक्षा अब स्कूल परिसर तक सीमित नहीं है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के बढ़ते इस्तेमाल ने अभिभावकों और शिक्षकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं।
पॉक्सो कानून में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल माध्यमों से जुड़े यौन उत्पीड़न और बच्चों की अश्लील सामग्री से संबंधित अपराधों के लिए प्रावधान मौजूद हैं। इसलिए साइबर सुरक्षा को बाल संरक्षण की मुख्य चर्चा में शामिल करना कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टि से प्रासंगिक है।
दिलशाद गार्डन के इस अभियान की उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट है कि कार्यक्रम का मुख्य जोर छात्राओं को अपने अधिकारों और सुरक्षा उपायों के बारे में जानकारी देने पर रहा। हालांकि कार्यक्रम में कितनी छात्राएं शामिल हुईं, कितनी अवधि का सत्र हुआ और आगे स्कूल स्तर पर कौन-सी नियमित सुरक्षा गतिविधियां चलेंगी, इसकी जानकारी उपलब्ध सामग्री में नहीं दी गई है। इसलिए इन पहलुओं पर कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
आगे ऐसे अभियानों को नियमित प्रशिक्षण, शिकायत तंत्र, साइबर सुरक्षा शिक्षा और शिक्षकों की संवेदनशीलता प्रशिक्षण से जोड़ना अधिक प्रभावी दिशा हो सकती है। पॉक्सो अधिनियम खुद सरकारों और संबंधित अधिकारियों के प्रशिक्षण तथा जन-जागरूकता पर जोर देता है।
दिल्ली के दिलशाद गार्डन में आयोजित पॉक्सो जागरूकता अभियान ने छात्राओं के बीच बाल सुरक्षा और अधिकारों पर संवाद का अवसर दिया। कार्यक्रम में पॉक्सो कानून, गुड टच-बैड टच, साइबर सुरक्षा और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने जैसे विषयों पर जोर दिया गया।
सबसे अहम बात यह है कि पॉक्सो कानून जागरूकता को कानूनी ढांचे का हिस्सा मानता है। अब चुनौती यह है कि ऐसी पहलें एक-दिवसीय कार्यक्रम से आगे बढ़कर स्कूलों में निरंतर सुरक्षा व्यवस्था, स्पष्ट शिकायत तंत्र और बच्चों के अनुकूल सहायता प्रणाली का हिस्सा बनें। बाल सुरक्षा का प्रभावी मॉडल वही होगा जिसमें बच्चे अपने अधिकार जानें, शिकायत करने से न डरें और संस्थागत व्यवस्था उनकी बात को गंभीरता से सुने।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।