अमेरिका के करीब जा रहा इराक, ईरान से बढ़ेगी दूरी?
इराक का बड़ा फैसला, ईरान समर्थित मिलिशिया पर दबाव
वॉशिंगटन से दोस्ती, तेहरान से रिश्ते, किस तरफ है इराक?
इराक अमेरिका के साथ आर्थिक और सुरक्षा रिश्ते मजबूत कर रहा है, जबकि ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों को 30 सितंबर तक हथियार राज्य के नियंत्रण में लाने का दबाव है। इसके बावजूद बगदाद ने तेहरान से संवाद और आर्थिक संबंध जारी रखे हैं। इसलिए मौजूदा बदलाव को पाला बदलने के बजाय रणनीतिक संतुलन कहना ज्यादा सटीक है।
इराक की मौजूदा सियासी तस्वीर को अगर केवल अमेरिका बनाम ईरान के चश्मे से देखा जाए, तो यह कहना आसान होगा कि बगदाद धीरे-धीरे वॉशिंगटन के करीब जा रहा है। लेकिन जमीनी हालात इससे ज्यादा पेचीदा हैं। इराक अमेरिका के साथ आर्थिक और सुरक्षा रिश्ते मजबूत कर रहा है, साथ ही ईरान से अपने पुराने सियासी, मजहबी और कारोबारी रिश्ते भी बनाए हुए है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल ईरान समर्थित हथियारबंद गुटों का है। इराकी सरकार ने इन गुटों से 30 सितंबर तक हथियार राज्य के नियंत्रण में लाने को कहा है। यह समयसीमा अमेरिकी सैनिकों की इराक से प्रस्तावित पूर्ण वापसी की तारीख से भी जुड़ी हुई है।
इसलिए तस्वीर किसी एक खेमे में शामिल होने की कम और अपनी संप्रभुता तथा आर्थिक हित बचाने की कोशिश ज्यादा दिखाई देती है।
इराक के प्रधानमंत्री अली अल-ज़ैदी की जुलाई में अमेरिका यात्रा ने इस नई दिशा को अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया। व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ मुलाकात के दौरान दोनों पक्षों ने आर्थिक रिश्ते गहरे करने और इराक के तेल उत्पादन को बढ़ाने पर बात की।
वॉशिंगटन की दिलचस्पी केवल तेल तक सीमित नहीं है। अमेरिका चाहता है कि इराक अपने क्षेत्र में सक्रिय ईरान समर्थित हथियारबंद गुटों पर नियंत्रण बढ़ाए और हथियारों को राज्य के अधीन लाने की कोशिश करे। अमेरिकी रक्षा नेतृत्व की ओर से भी इस दिशा में दबाव की बात सामने आई है।
बगदाद के लिए यह दबाव इसलिए अहम है क्योंकि उसे अमेरिका के साथ आर्थिक और सुरक्षा सहयोग की जरूरत है। लेकिन यही कदम उसे घरेलू सियासत में कठिन टकराव की तरफ भी ले जा सकता है।
इराकी नेतृत्व ने ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों को 30 सितंबर तक निरस्त्रीकरण या राज्य सुरक्षा ढांचे में एकीकरण की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत दिया है। कुछ गुटों ने राज्य सुरक्षा संस्थानों में शामिल होने की सहमति जताई है, जबकि ताकतवर गुटों ने हथियार छोड़ने से इनकार किया है।
काताइब हिज़्बुल्लाह जैसे गुट अपने हथियारों को “प्रतिरोध” का हिस्सा बताते हैं। उनका रुख यह संकेत देता है कि बगदाद के लिए केवल प्रशासनिक आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं होगा। असली इम्तिहान तब होगा जब सरकार इन गुटों से व्यावहारिक तौर पर हथियार वापस लेने की कोशिश करेगी।
यही वह मोड़ है जहां अमेरिका और ईरान के बीच इराक की संतुलनकारी नीति सबसे कठिन परीक्षा से गुजरेगी।
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका और इराक के रिश्तों में बढ़ती नजदीकी के साथ अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का अंत भी करीब है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी 30 सितंबर तक पूरी करने की योजना पर अमल जारी है। यह विरोधाभास अहम है। एक तरफ वॉशिंगटन बगदाद से राज्य के नियंत्रण को मजबूत करने और मिलिशिया पर कार्रवाई की उम्मीद कर रहा है, दूसरी तरफ अमेरिकी सैन्य उपस्थिति खत्म होने जा रही है। इराकी सरकार के लिए इसका मतलब यह है कि उसे अमेरिकी समर्थन के बिना घरेलू हथियारबंद गुटों से निपटने की अपनी क्षमता साबित करनी होगी।
यहां जवाब सीधा “हां” नहीं है। ईरान का इराक में प्रभाव केवल सरकारी स्तर पर नहीं है। 2003 के बाद ईरान ने इराकी सियासी दलों, धार्मिक नेटवर्क और सशस्त्र संगठनों के साथ गहरे रिश्ते विकसित किए हैं। विश्लेषकों के मुताबिक यह प्रभाव इराक की सियासत और सुरक्षा ढांचे में संरचनात्मक रूप से मौजूद है। इराक की भौगोलिक स्थिति भी अहम है। वह ईरान का पड़ोसी है और दोनों देशों के बीच व्यापार तथा सामाजिक और धार्मिक रिश्ते लंबे समय से मौजूद हैं। इसलिए बगदाद के लिए तेहरान से पूर्ण दूरी बनाना व्यावहारिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर मुश्किल है।
यही वजह है कि मौजूदा नीति को “ईरान से ब्रेक” कहना जल्दबाजी होगी। इसे “अमेरिका से रिश्ते मजबूत करते हुए ईरान के साथ संबंध बचाए रखने” की रणनीति कहना ज्यादा सटीक है।
19 अगस्त को ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़र ग़ालिबाफ तीन दिन की यात्रा पर बगदाद पहुंचे। उनका दौरा ऐसे वक्त हुआ है जब इराकी सरकार ईरान समर्थित मिलिशिया के निरस्त्रीकरण को लेकर अमेरिकी दबाव और घरेलू विरोध के बीच फंसी हुई है।
ग़ालिबाफ ने बगदाद एयरपोर्ट के पास उस जगह से क्षेत्र में “नए निज़ाम” को मजबूत करने की बात कही, जहां 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरानी कुद्स फोर्स के कमांडर क़ासिम सुलेमानी मारे गए थे। यह प्रतीकात्मक संदेश भी था कि ईरान इराक को अपने रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र से बाहर जाते हुए नहीं देखना चाहता।
इसी दौरे में इराकी संसद अध्यक्ष ने ईरान से होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते इराकी तेल निर्यात के लिए विशेष व्यवस्था की मांग की। यह कदम बताता है कि आर्थिक संकट के बीच बगदाद तेहरान से बातचीत जारी रखना चाहता है।
इराक की अर्थव्यवस्था के लिए तेल निर्यात जीवनरेखा है। द नेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक संघीय बजट की करीब 90 प्रतिशत आय तेल से आती है। होर्मुज़ संकट के कारण इराक के तेल राजस्व में भारी गिरावट दर्ज हुई है।
रिपोर्ट के अनुसार फरवरी में इराक की तेल आय करीब 6.8 अरब डॉलर थी, जो मई और जून में घटकर करीब 2.3 अरब डॉलर रह गई। दूसरी तरफ सरकार को वेतन, पेंशन और सामाजिक कल्याण पर हर महीने करीब 6.5 अरब डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।
ऐसे हालात में इराक किसी एक शक्ति से पूरी तरह दूरी बनाकर आर्थिक जोखिम नहीं बढ़ाना चाहता। अमेरिका के साथ निवेश और सुरक्षा सहयोग जरूरी है, लेकिन ईरान के साथ व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क भी उसकी आर्थिक जरूरतों का हिस्सा हैं।
बगदाद पर दोनों तरफ से दबाव है। अमेरिका चाहता है कि इराक गैर-राज्य हथियारबंद संगठनों को नियंत्रित करे। ईरान से जुड़े गुट इस प्रक्रिया को अपने प्रभाव और “प्रतिरोध” की क्षमता के लिए खतरा मानते हैं। 19 अगस्त की एक आकलन रिपोर्ट में कहा गया कि प्रधानमंत्री अल-ज़ैदी पर अमेरिका और ईरान समर्थित इराकी गुटों, दोनों का दबाव है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरानी अधिकारी भी बगदाद पहुंचकर सरकार और मिलिशिया के बीच टकराव रोकने तथा निरस्त्रीकरण को हतोत्साहित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि इराक की नीति केवल विदेश नीति का मामला नहीं है। यह घरेलू सत्ता-संतुलन, सुरक्षा और राज्य की संप्रभुता से सीधे जुड़ा हुआ है।
अभी ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। अमेरिका और इराक के बीच आर्थिक और सुरक्षा संवाद मजबूत हुआ है, लेकिन बगदाद ने ईरान से दूरी बनाने की कोई व्यापक नीति घोषित नहीं की है। उलटे, ईरानी संसद अध्यक्ष की हालिया यात्रा बताती है कि तेहरान के साथ उच्चस्तरीय संपर्क जारी है।
इराकी सरकार ने पहले अमेरिकी हमलों की भी आलोचना की है। जुलाई में अमेरिका और सऊदी हमलों में ईरान से जुड़े इराकी सशस्त्र गुटों के ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद बगदाद ने इसे अपनी संप्रभुता के लिए नुकसानदेह बताया था।
यानी अमेरिका के साथ सहयोग का मतलब अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को हर स्थिति में स्वीकार करना नहीं है। बगदाद अपनी संप्रभुता का सवाल भी लगातार उठा रहा है।
इराक की रणनीति की विश्वसनीयता का सबसे बड़ा पैमाना 30 सितंबर की समयसीमा होगी। अगर सरकार हथियारबंद गुटों को राज्य के सुरक्षा ढांचे में प्रभावी तरीके से ला पाती है, तो बगदाद की संप्रभुता मजबूत हो सकती है। अगर ताकतवर गुट खुले तौर पर आदेश को चुनौती देते हैं, तो घरेलू टकराव का जोखिम बढ़ सकता है। अमेरिकी सैनिकों की प्रस्तावित वापसी इस परीक्षा को और कठिन बनाती है। वॉशिंगटन के प्रत्यक्ष सैन्य दबाव में कमी आने के बाद बगदाद को खुद अपनी सुरक्षा नीति लागू करनी होगी। यहीं से पता चलेगा कि मौजूदा नीति केवल कूटनीतिक संतुलन है या वास्तव में इराकी राज्य अपनी सुरक्षा व्यवस्था को पुनर्गठित करने की कोशिश कर रहा है।
इराक के सामने तीन समानांतर जरूरतें हैं। उसे अमेरिका के साथ आर्थिक और सुरक्षा सहयोग बनाए रखना है, ईरान के साथ सीमा और व्यापार संबंध संभालने हैं और देश के भीतर हथियारों पर राज्य का नियंत्रण मजबूत करना है।
इन तीनों लक्ष्यों को एक साथ हासिल करना आसान नहीं है। किसी एक दिशा में तेज झुकाव से दूसरे पक्ष की प्रतिक्रिया और घरेलू राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है। सबसे व्यावहारिक रास्ता यही दिखाई देता है कि बगदाद अपनी विदेश नीति को “किसी एक खेमे” की बजाय “राष्ट्रीय हित” के आधार पर पेश करता रहे। लेकिन इसकी सफलता केवल बयानों से नहीं, बल्कि मिलिशिया नीति और आर्थिक फैसलों के वास्तविक अमल से तय होगी।
अमेरिका का साथ लेकर इराक के ईरान से पूरी तरह पाला बदलने की तस्वीर अभी सामने नहीं आई है। मौजूदा हालात ज्यादा जटिल हैं। बगदाद वॉशिंगटन से आर्थिक और सुरक्षा सहयोग बढ़ा रहा है, लेकिन तेहरान के साथ अपने पुराने रिश्ते भी कायम रखे हुए है। सबसे अहम बदलाव मिलिशिया नीति में दिख रहा है। 30 सितंबर की समयसीमा के जरिए सरकार हथियारों पर राज्य का नियंत्रण मजबूत करना चाहती है, जबकि ईरान समर्थित कुछ ताकतवर गुट इसका विरोध कर रहे हैं। इसलिए फिलहाल “इराक ने पाला बदल लिया” कहना तथ्य से आगे निकलना होगा। ज्यादा सटीक नज़रिया यह है कि बगदाद अमेरिका और ईरान के बीच अपनी गुंजाइश बचाते हुए राज्य की संप्रभुता और आर्थिक हित मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। आने वाले हफ्तों में मिलिशिया निरस्त्रीकरण और अमेरिकी सैनिकों की वापसी इस नीति की असली दिशा तय करेंगे।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।