अमेरिका में टिम एंड्रयूज़ के शरीर में जेनेटिकली एडिटेड सुअर का गुर्दा 271 दिन तक काम करता रहा और उन्हें डायलिसिस से राहत मिली। बाद में मानव गुर्दे का सफल प्रत्यारोपण हुआ।
बोस्टन, अमेरिका | 4 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
सुअर के गुर्दे ने इंसान में 271 दिन तक किया काम
अमेरिका में अंग प्रत्यारोपण चिकित्सा के क्षेत्र में एक अहम उपलब्धि सामने आई है। 66 वर्षीय टिम एंड्रयूज़ के शरीर में जेनेटिकली एडिटेड सुअर का गुर्दा 271 दिनों तक काम करता रहा। इस अवधि में उन्हें डायलिसिस की जरूरत नहीं पड़ी। बाद में उन्हें मानव डोनर से गुर्दा प्रत्यारोपित किया गया और वह भी सफलतापूर्वक काम करने लगा।
यह मामला मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के डॉक्टरों और शोधकर्ताओं ने The Lancet में प्रकाशित किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह पहली रिपोर्टेड मिसाल है जिसमें सुअर के गुर्दे से मानव गुर्दे के प्रत्यारोपण तक मरीज सफलतापूर्वक पहुंचा।
एंड्रयूज़ को क्यों लगाया गया सुअर का गुर्दा
एंड्रयूज़ को अंतिम चरण की किडनी बीमारी थी। मानव डोनर से गुर्दा मिलने की संभावना सीमित थी, इसलिए डॉक्टरों ने जेनेटिकली एडिटेड सुअर के गुर्दे को एक संभावित अस्थायी विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया।
यह प्रक्रिया ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन कहलाती है। इसमें किसी दूसरे प्रजाति के अंग को मानव शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है।
एंड्रयूज़ को 25 जनवरी 2025 को मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल में जेनेटिकली एडिटेड सुअर का गुर्दा लगाया गया था। यह प्रयोग FDA की Expanded Access व्यवस्था के तहत किया गया था।
गुर्दे में किए गए थे जेनेटिक बदलाव
सुअर के गुर्दे को मानव शरीर में प्रत्यारोपण के लिए जेनेटिकली एडिट किया गया था। इसका उद्देश्य इंसानी इम्यून सिस्टम द्वारा अंग को तुरंत अस्वीकार किए जाने का जोखिम कम करना और संक्रमण से जुड़े खतरे घटाना था।
मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम के अनुसार इस गुर्दे ने प्रत्यारोपण के तुरंत बाद काम करना शुरू कर दिया था। शुरुआत में T-cell mediated rejection का एक एपिसोड आया, जिसे इलाज के बाद नियंत्रित किया गया। निगरानी के दौरान सुअर से इंसान में किसी पैथोजन के संक्रमण का प्रमाण नहीं मिला।
271 दिन तक डायलिसिस की जरूरत नहीं पड़ी
एंड्रयूज़ के मामले की सबसे अहम उपलब्धि यह रही कि वह 271 दिनों तक सुअर के गुर्दे के साथ बिना डायलिसिस रहे।
पहले जेनेटिकली एडिटेड सुअर के गुर्दे के मानव प्रत्यारोपण में अधिकतम अवधि 130 दिन थी। एंड्रयूज़ का 271 दिनों का परिणाम उस समय इस क्षेत्र में नया रिकॉर्ड था।
इस अवधि ने वैज्ञानिकों को यह समझने का अवसर दिया कि जेनेटिकली एडिटेड पशु अंग मानव शरीर में कितने समय तक काम कर सकते हैं और लंबे समय में किस तरह की जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
गुर्दा आखिर क्यों हुआ फेल
271 दिनों के बाद सुअर के गुर्दे की कार्यक्षमता कम होने लगी।
शोधकर्ताओं के अनुसार एंड्रयूज़ के उपचार के दौरान एक संक्रमण के संदर्भ में इम्यूनोसप्रेशन कम किया गया था। इसके बाद प्रत्यारोपित गुर्दे में माइक्रोवैस्कुलर चोट और सूजन विकसित हुई, जो धीरे-धीरे बढ़ती गई और अंततः गुर्दे की विफलता का कारण बनी।
यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन की सबसे बड़ी वैज्ञानिक चुनौती केवल शुरुआती rejection रोकना नहीं है। अंग को लंबे समय तक सुरक्षित और प्रभावी तरीके से काम कराना भी उतना ही अहम है।
इसके बाद मिला मानव गुर्दा
सुअर का गुर्दा हटाए जाने के बाद एंड्रयूज़ ने कुछ समय डायलिसिस किया। जनवरी 2026 में उन्हें एक मृत मानव डोनर से गुर्दा मिला।
नए मानव गुर्दे ने तुरंत काम करना शुरू कर दिया। फॉलो-अप में इम्यून सिस्टम द्वारा नए गुर्दे को अस्वीकार करने या पिछले सुअर के गुर्दे की वजह से मानव अंग के प्रति अतिरिक्त संवेदनशीलता का प्रमाण नहीं मिला।
इससे एक नई चिकित्सकीय अवधारणा सामने आई है, जिसमें सुअर का गुर्दा अंतिम इलाज के बजाय मानव डोनर मिलने तक एक “ब्रिज” के रूप में इस्तेमाल हो सकता है।
271 दिन का रिकॉर्ड अब टूट चुका है
यहां एक अहम अपडेट जरूरी है।
एंड्रयूज़ के 271 दिन का रिकॉर्ड अब मौजूदा रिकॉर्ड नहीं है। 3 सितंबर 2026 को रिपोर्ट सामने आई कि एक अन्य महिला मरीज के शरीर में जेनेटिकली एडिटेड सुअर
का गुर्दा 285 दिनों से काम कर रहा था और वह बिना डायलिसिस रह रही थी। यह प्रत्यारोपण नवंबर 2025 में मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल में किया गया था।
इसलिए एंड्रयूज़ का 271 दिनों का आंकड़ा अब “उस समय का रिकॉर्ड” है। मौजूदा घटनाक्रम यह भी दिखाता है कि सुअर के गुर्दे की मानव शरीर में टिकाऊ क्षमता तेजी से बढ़ रही है।
दुनिया में किडनी की भारी कमी
इस शोध के पीछे सबसे बड़ी वजह मानव अंगों की कमी है।
किडनी फेल्योर से जूझ रहे मरीजों के लिए मानव डोनर गुर्दा सबसे बेहतर उपचार माना जाता है। लेकिन उपलब्ध अंगों की संख्या जरूरत से काफी कम है। इसी वजह
से अनेक मरीजों को लंबे समय तक डायलिसिस पर रहना पड़ता है।
डायलिसिस रक्त से अतिरिक्त तरल पदार्थ और अपशिष्ट हटाता है, लेकिन लंबे समय तक इसकी जरूरत मरीज के जीवन और स्वास्थ्य पर भारी असर डाल सकती है।
ऐसे में यदि जेनेटिकली एडिटेड सुअर के गुर्दे सुरक्षित तरीके से महीनों या भविष्य में वर्षों तक काम कर सकें, तो यह ट्रांसप्लांट सिस्टम पर दबाव कम करने का एक
रास्ता बन सकता है।
वैज्ञानिकों की रणनीति बदल रही है
पहले ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन को मुख्य रूप से मानव अंग का सीधा विकल्प बनाने की दिशा में देखा जाता था।
एंड्रयूज़ का मामला एक अलग रणनीति सामने लाता है। सुअर का गुर्दा मरीज को डायलिसिस से दूर रखते हुए तब तक सहारा दे सकता है, जब तक मानव डोनर
उपलब्ध न हो।
मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम के शोधकर्ताओं के अनुसार शुरुआती लक्ष्य ऐसा “ब्रिज” तैयार करना है। भविष्य में पर्याप्त सुरक्षा और टिकाऊपन साबित होने पर इसे स्थायी
उपचार के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावना का भी अध्ययन किया जा सकता है।
अभी किन चुनौतियों का सामना है
इस तकनीक को नियमित चिकित्सा उपचार बनने में अभी कई वैज्ञानिक और नियामकीय बाधाएं हैं।
सबसे बड़ी चुनौती इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया है। जेनेटिक एडिटिंग ने शुरुआती rejection को नियंत्रित करने में प्रगति की है, लेकिन लंबे समय तक रक्त वाहिकाओं
की चोट, सूजन और दूसरी इम्यून प्रतिक्रियाएं अब भी चिंता का विषय हैं।
इसके अलावा संक्रमण, इम्यूनोसप्रेसिव दवाओं के दुष्प्रभाव और अलग-अलग मरीजों में अंग के प्रदर्शन की विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण सवाल हैं।
इसलिए एक सफल मरीज का अनुभव अपने आप में व्यापक चिकित्सा सफलता का अंतिम प्रमाण नहीं है।
अगला चरण क्लिनिकल ट्रायल
जेनेटिकली एडिटेड सुअर के गुर्दे अब शुरुआती प्रयोगात्मक चरण से आगे बढ़ रहे हैं।
eGenesis जैसी कंपनियां बड़े मानव क्लिनिकल ट्रायल की तैयारी कर रही हैं। कंपनी के अनुसार 2027 में अधिक मरीजों के साथ विस्तारित अध्ययन की योजना है।
इसका उद्देश्य सुरक्षा, अंग की टिकाऊ क्षमता और लंबे समय तक काम करने की क्षमता का व्यवस्थित आकलन करना है।
इन ट्रायल के परिणाम यह तय करने में अहम होंगे कि ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन सीमित प्रयोगों से आगे बढ़कर नियमित चिकित्सा विकल्प बन पाता है या नहीं।
एंड्रयूज़ का मामला क्यों महत्वपूर्ण है
टिम एंड्रयूज़ का मामला इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि सुअर का गुर्दा इंसानी गुर्दे का स्थायी विकल्प साबित हो गया।
इसकी अहमियत यह है कि पहली बार एक मरीज ने जेनेटिकली एडिटेड सुअर के गुर्दे के सहारे 271 दिन बिना डायलिसिस गुजारे और उसके बाद मानव डोनर का
गुर्दा सफलतापूर्वक प्राप्त किया।
इसने एक व्यावहारिक चिकित्सा सवाल का जवाब देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। क्या पशु अंग मरीज को मानव डोनर मिलने तक सुरक्षित रूप से समय
दे सकते हैं?
एंड्रयूज़ का अनुभव बताता है कि इसका जवाब पूरी तरह नकारात्मक नहीं है।
लेकिन विज्ञान अभी अगले सवाल पर है। कितने मरीजों में यह परिणाम दोहराया जा सकता है, कितने समय तक अंग काम करेगा और किस तरह की इम्यूनोसप्रेशन
सबसे सुरक्षित होगी?
इन सवालों के जवाब बड़े और नियंत्रित क्लिनिकल अध्ययनों से मिलेंगे।
मानव अंगों की कमी के बीच नई उम्मीद
ज़ेनोट्रांसप्लांटेशन अभी प्रयोगात्मक चिकित्सा है। इसे मानव गुर्दे का स्थापित विकल्प नहीं माना जा सकता।
फिर भी एंड्रयूज़ और उनके बाद के मरीजों के परिणामों ने इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। जेनेटिक इंजीनियरिंग, इम्यूनोलॉजी और ट्रांसप्लांट सर्जरी के
संयोजन से सुअर के अंगों को मानव शरीर के लिए अधिक अनुकूल बनाने की दिशा में वास्तविक प्रगति हुई है।
271 दिनों का एंड्रयूज़ रिकॉर्ड अब पीछे छूट चुका है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से उसका महत्व कायम है, क्योंकि उसी अनुभव ने यह दिखाया कि सुअर का गुर्दा मानव
डोनर मिलने तक एक संभावित चिकित्सकीय “ब्रिज” बन सकता है।
अब अगली परीक्षा यह होगी कि इस सफलता को एक मरीज से आगे बढ़ाकर बड़े समूह में सुरक्षित, दोहराने योग्य और लंबे समय तक टिकाऊ उपचार में बदला जा
सके।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।