ऑस्ट्रेलिया में शरण लेने वाली ईरान की महिला फुटबॉल टीम की दो खिलाड़ियों ने पहली बार विस्तार से बताया है कि मार्च में एएफसी महिला एशियन कप के दौरान राष्ट्रगान नहीं गाने का फैसला महज़ एक खेल मैदान की खामोशी नहीं था। अतेफेह रमेज़ानिज़ादेह और फातेमा पसंदीदह के मुताबिक यह तेहरान की हुकूमत और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई के विरोध में किया गया एक साइलेंट प्रोटेस्ट था।
ब्रिस्बेन, ऑस्ट्रेलिया | 7 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
दोनों खिलाड़ियों ने ऑस्ट्रेलिया के नाइन नेटवर्क के कार्यक्रम “60 मिनट्स” में अपने अनुभव साझा किए। यह उनके ऑस्ट्रेलिया में शरण लेने के बाद पहला प्रमुख मीडिया इंटरव्यू था। अतेफेह की उम्र 34 साल और फातेमा की उम्र 22 साल है।
यह मामला 2 मार्च 2026 को उस समय सुर्खियों में आया था, जब ईरानी महिला टीम ने दक्षिण कोरिया के खिलाफ अपने शुरुआती एशियन कप मुकाबले से पहले राष्ट्रगान बजने के दौरान उसे गाने से इनकार कर दिया था। उस वक्त खिलाड़ियों ने अपने फैसले की सार्वजनिक वजह नहीं बताई थी।
राष्ट्रगान के दौरान क्यों चुप रहीं खिलाड़ी
अब अतेफेह रमेज़ानिज़ादेह ने कहा है कि उनकी खामोशी ईरान में प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ खड़े होने का तरीका थी। उन्होंने बताया कि वह जानती थीं कि इस कदम के गंभीर नतीजे हो सकते हैं, लेकिन उन्हें लगा कि सही काम यही था।
अतेफेह के मुताबिक वह चाहती थीं कि राष्ट्रगान को गर्व और दिल से गाएं, लेकिन ईरान की मौजूदा परिस्थितियों में वह ऐसा नहीं कर सकती थीं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके लिए यह खामोशी किसी भी तरह की यातना का खतरा पैदा कर सकती थी।
फातेमा पसंदीदह ने भी इसी रुख की पुष्टि की। उनके मुताबिक उनके देश के लोग अपनी जान जोखिम में डाल रहे थे और कुछ लोगों की जान चली गई थी। ऐसे माहौल में राष्ट्रगान के दौरान खामोश रहना उन्हें अपने लोगों के लिए कम से कम कुछ करने जैसा लगा।
पहले सिर्फ इशारा था, अब खुलकर सामने आईं
मार्च में जब खिलाड़ियों ने राष्ट्रगान नहीं गाया था, तब उनके इस कदम को अलग-अलग नजरिए से देखा गया। कुछ लोगों ने इसे ईरानी सरकार के खिलाफ प्रतिरोध माना, जबकि कुछ ने इसे ईरान में अमेरिकी और इज़रायली हमलों के बाद शोक के संकेत के तौर पर देखा।
उस समय टीम की तरफ से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया था। बाद में ईरानी राज्य टेलीविजन पर खिलाड़ियों को “गद्दार” तक कहा गया और उनकी कार्रवाई को युद्धकाल में देशद्रोह जैसा बताया गया।
अब दोनों खिलाड़ियों के बयान ने उस घटना की सियासी अहमियत को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया है।
ऑस्ट्रेलिया में शरण की नौबत कैसे आई
राष्ट्रगान के विवाद के बाद खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर ऑस्ट्रेलिया में चिंता बढ़ी। टीम की कुछ खिलाड़ियों को ईरान लौटने पर संभावित उत्पीड़न का खतरा बताया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने मार्च में पांच खिलाड़ियों को मानवीय वीज़ा देने की पुष्टि की थी। बाद की रिपोर्टिंग में सामने आया कि कुल सात टीम सदस्यों ने ऑस्ट्रेलिया की तरफ से शरण की पेशकश स्वीकार की, लेकिन अंततः अतेफेह रमेज़ानिज़ादेह और फातेमा पसंदीदह ही ऑस्ट्रेलिया में रहीं।
बाकी खिलाड़ियों ने वापस ईरान लौटने का फैसला किया। रिपोर्टों में परिवारों पर दबाव और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का जिक्र सामने आया है, हालांकि हर खिलाड़ी के व्यक्तिगत फैसले की पूरी वजह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया सरकार की भूमिका
ऑस्ट्रेलिया के गृह मामलों के मंत्री टोनी बर्क ने मार्च में खिलाड़ियों के मामले में व्यक्तिगत तौर पर भूमिका निभाई थी। एबीसी के मुताबिक जब खिलाड़ियों ने शरण की इच्छा जताई, तब ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों ने उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने और मानवीय वीज़ा प्रक्रिया पूरी करने में मदद की।
बाद में अतेफेह और फातेमा को ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता भी मिल गई। दोनों ने अगस्त 2026 में नागरिकता हासिल की और अब ब्रिस्बेन की वाइनम वुल्व्स टीम के लिए फुटबॉल खेल रही हैं।
परिवार से दूरी का दर्द
इस पूरी कहानी का सबसे संवेदनशील पहलू खिलाड़ियों का अपने परिवारों से अलग होना है।
अतेफेह ने बताया कि उनके माता-पिता ने उन्हें ईरान लौटने के लिए कहा था। उनके मुताबिक परिवार ने उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश की कि वापस आने पर कुछ नहीं होगा। लेकिन उन्होंने लौटने से इनकार कर दिया।
उन्होंने कहा कि शायद वह लंबे समय तक अपने परिवार से नहीं मिल पाएंगी। फिर भी वह उन लोगों के प्रति उदासीन नहीं रह सकती थीं जिन्हें ईरान में विरोध प्रदर्शन के दौरान जान गंवानी पड़ी।
फातेमा ने भी परिवार से संपर्क को लेकर सावधानी बरतने की बात कही। उनका कहना है कि वह ऐसी बातचीत नहीं करना चाहतीं जिससे उनके परिवार या पूर्व साथियों को खतरा हो।
ईरान में खिलाड़ियों को लेकर विवाद
राष्ट्रगान के दौरान खिलाड़ियों की खामोशी के बाद ईरानी राज्य मीडिया में उनकी आलोचना हुई। एक टीवी प्रस्तोता ने उन्हें “वॉरटाइम ट्रेटर्स” यानी युद्धकालीन गद्दार बताया था।
ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक इस घटना के बाद खिलाड़ियों को ईरान लौटने पर संभावित उत्पीड़न का खतरा था। संगठन ने इस विरोध को ईरान में महिलाओं और प्रदर्शनकारियों पर सरकारी कार्रवाई के व्यापक संदर्भ से जोड़कर देखा।
हालांकि, यह भी उल्लेखनीय है कि पूरी टीम ने बाद के मुकाबलों में राष्ट्रगान गाया। दक्षिण कोरिया के खिलाफ शुरुआती मैच में खामोशी के बाद ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस के खिलाफ खिलाड़ियों ने राष्ट्रगान के दौरान अलग रवैया अपनाया।
खेल से आगे बढ़कर मानवाधिकार का सवाल
इस घटना ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी कि अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों की राजनीतिक और मानवीय अभिव्यक्ति की सीमा क्या होनी चाहिए।
एक तरफ खेल संस्थाएं मैदान को सियासी टकराव से दूर रखने की कोशिश करती हैं। दूसरी तरफ जब खिलाड़ी खुद अपने देश की सरकार से खतरा महसूस करें, तब उनका मैदान पर किया गया कोई प्रतीकात्मक कदम मानवाधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मुद्दा बन सकता है।
ईरानी खिलाड़ियों का मामला इसी टकराव की मिसाल है। यहां राष्ट्रगान के दौरान कुछ मिनट की खामोशी बाद में उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बन गई।
ग्राउंड रियलिटी
यह कहानी सिर्फ दो खिलाड़ियों के ऑस्ट्रेलिया पहुंचने की नहीं है। इसके पीछे वह जोखिम भी है जिसे उन्होंने अपने परिवार, करियर और राष्ट्रीय टीम से जुड़े भविष्य के सामने रखकर लिया।
अतेफेह और फातेमा अब ऑस्ट्रेलिया में नई ज़िंदगी शुरू कर चुकी हैं। लेकिन दोनों के बयानों से साफ है कि शरण मिलने के बाद भी अपने परिवार और देश से दूरी का भावनात्मक असर खत्म नहीं हुआ है।
अतेफेह की इच्छा है कि एक दिन वह ऐसे ईरान लौटें जहां हालात बदल चुके हों और लोग आज़ाद तथा खुशहाल जीवन जी सकें।
अंतरराष्ट्रीय असर
इस मामले ने ऑस्ट्रेलिया की मानवीय शरण नीति और ईरानी खिलाड़ियों की सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय ध्यान में ला दिया। ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी खिलाड़ियों के मामले को ईरान में असहमति और मानवाधिकारों से जुड़े व्यापक संदर्भ में रखा।
खेल की दुनिया में यह घटना इसलिए भी अहम है क्योंकि खिलाड़ियों का एक छोटा-सा प्रतीकात्मक फैसला उनके लिए सुरक्षा और शरण का सवाल बन गया।
यह मामला यह भी दिखाता है कि किसी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में दिखाई देने वाली कुछ सेकंड की खामोशी के पीछे कितना गहरा सामाजिक और सियासी संदेश छिपा हो सकता है।
निष्कर्ष
ईरान की महिला फुटबॉल टीम की राष्ट्रगान के दौरान खामोशी अब सिर्फ एक खेल घटना नहीं रह गई है। अतेफेह रमेज़ानिज़ादेह और फातेमा पसंदीदह के मुताबिक वह खामोशी तेहरान की हुकूमत और प्रदर्शनकारियों के दमन के खिलाफ उनका विरोध थी।
उस फैसले के बाद दोनों ने अपने देश, परिवार और राष्ट्रीय टीम से दूरी का कठिन रास्ता चुना। आज वे ऑस्ट्रेलिया की नागरिक हैं और वहीं फुटबॉल खेल रही हैं।
उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि कभी-कभी मैदान पर न बोला गया शब्द भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति और मानवाधिकार की बहस में सबसे तेज़ आवाज़ बन जाता है।