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मेटा पर फिर गंभीर सवाल, भारत में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े विज्ञापन जारी रहने का आरोप
Mohammad Naved
•
2026-09-10 12:55:50
टेक ट्रांसपेरेंसी प्रोजेक्ट की रिपोर्ट में मेटा के प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी 332 विज्ञापन सामग्री का दावा है। भारत में 84 विज्ञापन पाए गए।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 10 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved
भारत में फिर उठे मेटा की जवाबदेही पर सवाल
मेटा के फेसबुक और इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री वाले भुगतान किए गए विज्ञापनों को लेकर भारत में विवाद फिर गहरा गया है। अमेरिका स्थित टेक ट्रांसपेरेंसी प्रोजेक्ट की नई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 महीनों में फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ऐसी सामग्री वाले 332 विज्ञापन पाए गए। इनमें 84 विज्ञापन भारत में दिखाए गए थे।
रिपोर्ट का सबसे गंभीर पहलू यह है कि भारत में पाए गए 84 विज्ञापनों में से 78 कथित तौर पर उस सरकारी आदेश के बाद सामने आए, जिसमें मेटा को इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री वाले विज्ञापनों और कंटेंट को हटाने का निर्देश दिया गया था।
रिपोर्ट में क्या सामने आया
टेक ट्रांसपेरेंसी प्रोजेक्ट, यानी टीटीपी, ने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर 332 विज्ञापनों की पहचान की। संगठन के मुताबिक इनमें बड़ी संख्या में ऐसी तस्वीरें और वीडियो शामिल थे जिन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिये बदला गया था।
रिपोर्ट के अनुसार 332 विज्ञापनों में से 274 केवल अगस्त 2026 में सामने आए। इनमें भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया में दिखाए गए विज्ञापन भी शामिल थे।
टीटीपी ने यह भी दावा किया कि कुछ विज्ञापनों में वास्तविक बच्चों की तस्वीरों का इस्तेमाल करके उन्हें एआई के जरिये आपत्तिजनक यौन सामग्री में बदला गया। संगठन ने एक यूरोपीय राजघराने से जुड़े नाबालिग की तस्वीर के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया है।
सरकारी आदेश के बाद भी क्यों महत्वपूर्ण है मामला
भारत सरकार ने जुलाई 2026 में मेटा को इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री वाले विज्ञापनों को हटाने और इस मामले में विस्तृत जवाब देने का निर्देश दिया था। यह कार्रवाई बीबीसी आई की पिछली पड़ताल के बाद हुई थी, जिसमें भारत में इंस्टाग्राम पर ऐसे भुगतान किए गए विज्ञापनों की मौजूदगी का खुलासा किया गया था।
नई रिपोर्ट में भारत से जुड़े 84 विज्ञापनों का उल्लेख है। टीटीपी के अनुसार इनमें 78 विज्ञापन सरकारी आदेश और मेटा के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक के बाद सामने आए। यदि रिपोर्ट के ये निष्कर्ष सही हैं, तो इससे सवाल उठता है कि कंपनी के विज्ञापन परीक्षण और कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम सरकारी हस्तक्षेप के बाद भी ऐसी सामग्री को रोकने में कितने प्रभावी रहे।
यहां यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि टीटीपी के आंकड़े एक शोध संगठन की जांच पर आधारित हैं। इन निष्कर्षों की अंतिम कानूनी पुष्टि संबंधित भारतीय जांच एजेंसियों और अदालतों की प्रक्रिया से होगी।
मेटा का क्या कहना है
मेटा ने कहा है कि वह बच्चों के यौन शोषण और ऐसी सामग्री को स्वीकार नहीं करता। कंपनी के मुताबिक वास्तविक या एआई से तैयार की गई बाल यौन शोषण सामग्री दोनों उसके नियमों के खिलाफ हैं।
कंपनी का कहना है कि अपराधी लगातार अपनी रणनीति बदलते हैं और पहचान से बचने की कोशिश करते हैं। मेटा के अनुसार इसी वजह से उसकी डिटेक्शन और एनफोर्समेंट व्यवस्था को लगातार मजबूत किया जा रहा है।
जुलाई में भी मेटा ने कहा था कि वह बच्चों से जुड़े संदिग्ध व्यवहार की पहचान के लिए तकनीकी प्रणालियों का इस्तेमाल करता है और बड़ी संख्या में संदिग्ध अकाउंट हटाता है। कंपनी ने इन आरोपों को खारिज किया था कि वह जानबूझकर ऐसे विज्ञापनों को किसी विशेष दर्शक वर्ग तक पहुंचाती है।
मेटा की अपनी रिपोर्टिंग व्यवस्था पर भी सवाल
टीटीपी ने अपनी जांच में मेटा की रिपोर्टिंग व्यवस्था का भी परीक्षण किया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार भारत में मिले 84 विज्ञापनों में से संगठन 55 विज्ञापनों को मेटा की अपनी रिपोर्टिंग प्रणाली के जरिए रिपोर्ट करने में सक्षम हुआ।
टीटीपी का दावा है कि इनमें से 43 विज्ञापनों को शुरुआत में कंपनी की विज्ञापन नीतियों का उल्लंघन नहीं माना गया। यह दावा डिजिटल प्लेटफॉर्म की ऑटोमेटेड मॉडरेशन और मानव समीक्षा प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
टीटीपी ने यह भी कहा कि कंपनी को जानकारी दिए जाने के बाद भी एक दर्जन से अधिक विज्ञापन कुछ समय तक प्लेटफॉर्म पर दिखाई देते रहे।
भारत में जांच का दायरा बढ़ा
इस मामले में भारत की कई संस्थाएं सक्रिय हो चुकी हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग, एनसीपीसीआर ने जुलाई में बीबीसी आई की रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लिया था और मेटा से जवाब मांगा था।
मेटा ने आयोग को जवाब दिया। इसके बाद एनसीपीसीआर ने मामले की औपचारिक जांच शुरू की और मेटा इंडिया के वरिष्ठ अधिकारियों को पेश होने के लिए बुलाया। 9 सितंबर को मेटा के वरिष्ठ अधिकारी आयोग के सामने पेश हुए।
आयोग की जांच का एक प्रमुख सवाल यह है कि ऐसे विज्ञापन मेटा की विज्ञापन स्वीकृति प्रणाली से होकर कैसे गुजरे और कंपनी की भारत इकाई की इसमें क्या भूमिका रही।
मानवाधिकार आयोग ने भी मांगी रिपोर्ट
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मामले का संज्ञान लिया है। आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली पुलिस से कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।
आयोग ने मेटा की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एल्गोरिदमिक प्रणालियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। जांच का एक अहम पहलू यह है कि अगर किसी प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था कंटेंट को चुनने, आगे बढ़ाने, संशोधित करने या उससे कमाई करने में सक्रिय भूमिका निभाती है, तो उसकी कानूनी जिम्मेदारी किस सीमा तक तय होती है।
सुप्रीम कोर्ट में भी मामला पहुंचा
इस विवाद का एक कानूनी पहलू सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है। अगस्त 2026 में शीर्ष अदालत ने उस याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा जिसमें सोशल मीडिया मध्यस्थों द्वारा बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की अनिवार्य रिपोर्टिंग के नियमों को प्रभावी तरीके से लागू करने की मांग की गई थी।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2024 के फैसले का हवाला दिया गया है। उसमें पॉक्सो कानून के तहत ऐसी सामग्री की रिपोर्टिंग से जुड़े दायित्वों पर जोर दिया गया था। अगस्त की कार्यवाही में केंद्र के संबंधित मंत्रालयों को पक्षकार बनाने की अनुमति भी दी गई और अगली सुनवाई के लिए 24 सितंबर 2026 की तारीख तय की गई।
असली चुनौती केवल सामग्री हटाने की नहीं
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि आपत्तिजनक सामग्री कितनी जल्दी हटाई गई। असली सवाल यह है कि भुगतान किए गए विज्ञापन की पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा जांच किस स्तर पर विफल हुई।
एक विज्ञापन को प्लेटफॉर्म पर पहुंचने से पहले कई स्तरों की जांच से गुजरना चाहिए। इसमें विज्ञापनदाता की पहचान, भुगतान व्यवस्था, विज्ञापन की भाषा और दृश्य सामग्री, लिंक और जिस सेवा या ऐप का प्रचार किया जा रहा है, उसकी प्रकृति शामिल होती है।
यदि ऐसी सामग्री इन चरणों को पार करके उपयोगकर्ताओं तक पहुंचती है, तो प्लेटफॉर्म की मॉडरेशन व्यवस्था की संरचना और जवाबदेही दोनों पर सवाल उठते हैं।
एआई ने खतरे का स्वरूप बदला
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। पहले किसी बच्चे की वास्तविक तस्वीर या वीडियो के प्रसार का मामला होता था। अब उपलब्ध तकनीकों के जरिए वास्तविक तस्वीरों को बदलकर ऐसी सामग्री बनाई जा सकती है जो दिखने में वास्तविक जैसी प्रतीत होती है।
इससे प्लेटफॉर्म के लिए पहचान की चुनौती बढ़ती है। साथ ही पीड़ित बच्चों की तस्वीरों के दुरुपयोग का खतरा भी गंभीर होता है।
यही वजह है कि डिजिटल सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए केवल पारंपरिक कंटेंट मॉडरेशन पर्याप्त नहीं माना जा रहा। विज्ञापन नेटवर्क, एआई टूल, भुगतान प्रणाली, लिंक और बाहरी प्लेटफॉर्म के बीच बने पूरे डिजिटल नेटवर्क की निगरानी जरूरी होती जा रही है।
भारत में कानूनी जिम्मेदारी का सवाल
भारत में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का प्रसार गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में पॉक्सो कानून और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े प्रावधान लागू हो सकते हैं।
इसलिए जांच का अगला चरण केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं रहेगा कि सामग्री किसने अपलोड की। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि उसे विज्ञापन के रूप में किसने खरीदा, किस प्रणाली से मंजूरी मिली, कितने लोगों तक पहुंची और शिकायत मिलने के बाद कितनी जल्दी कार्रवाई हुई।
यही बिंदु एनसीपीसीआर और एनएचआरसी की मौजूदा जांच को महत्वपूर्ण बनाता है।
आगे क्या होगा
फिलहाल भारत में एनसीपीसीआर और एनएचआरसी की कार्रवाई जारी है। मेटा के अधिकारियों ने एनसीपीसीआर के सामने अपना पक्ष रखा है। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की रिपोर्टिंग जिम्मेदारियों से जुड़ा मामला लंबित है।
टीटीपी की नई रिपोर्ट ने पहले से चल रही जांच को एक नया आधार दिया है। अब जांच एजेंसियों के सामने यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि सरकारी निर्देश के बाद भी भारत में ऐसे विज्ञापन कैसे दिखाई दिए और मेटा की आंतरिक व्यवस्था ने उन्हें समय पर क्यों नहीं रोका।
मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा। लेकिन मौजूदा तथ्य डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर बच्चों की सुरक्षा, विज्ञापन मॉडरेशन और एआई आधारित कंटेंट के नियमन को लेकर गंभीर बहस की जरूरत साफ तौर पर दिखाते हैं।
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा में केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है। उन नियमों की वास्तविक निगरानी, समयबद्ध कार्रवाई और जवाबदेही भी उतनी ही अहम है। भारत में मेटा से जुड़े इस मामले की आगे की जांच इसी कसौटी पर परखी जाएगी।
Mohammad Naved
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।