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ट्रम्प ने H-1B वीजा प्रतिबंध एक साल बढ़ाया, 1 लाख डॉलर भुगतान की शर्त बरकरार
Harish Qureshi
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2026-09-19 11:48:42
अमेरिका ने कुछ H-1B आवेदकों के लिए 1 लाख डॉलर भुगतान की शर्त सितंबर 2027 तक बढ़ा दी है। नीति अदालत में चुनौती के बीच जारी है और भारतीय टेक पेशेवरों पर नजर है।
वॉशिंगटन डीसी | 19 सितंबर 2026
By Mohd Haris
अमेरिका में H-1B वीजा कार्यक्रम को लेकर ट्रम्प प्रशासन ने एक और बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कुछ विदेशी कुशल पेशेवरों के अमेरिका में प्रवेश पर लागू 1 लाख डॉलर भुगतान की शर्त को अगले 1 साल के लिए बढ़ा दिया है। नया विस्तार सितंबर 2027 तक प्रभावी रहेगा।
इस फैसले से अमेरिकी टेक उद्योग, विदेशी कुशल कर्मचारियों और खास तौर पर भारत से जुड़े पेशेवरों के लिए H-1B व्यवस्था फिर चर्चा में आ गई है। हालांकि यह नीति सभी H-1B धारकों पर समान रूप से लागू नहीं होती और इसके कई अपवाद भी हैं।
H-1B पर क्या बदला
व्हाइट हाउस की 18 सितंबर 2026 की उद्घोषणा के मुताबिक, अमेरिका में विशेषज्ञता वाले रोजगार के लिए आने वाले कुछ H-1B कर्मचारियों के प्रवेश पर रोक लागू रहेगी, जब तक संबंधित याचिका के साथ 1 लाख डॉलर का भुगतान नहीं किया जाता।
यह व्यवस्था उन मामलों पर केंद्रित है जिनमें संबंधित H-1B कर्मचारी अमेरिका के बाहर मौजूद है और नए रोजगार के आधार पर अमेरिका में प्रवेश करना चाहता है। राष्ट्रीय हित से जुड़े मामलों में अमेरिकी प्रशासन को अपवाद देने का अधिकार भी रखा गया है।
नई व्यवस्था 21 सितंबर 2026 से प्रभावी होगी और मौजूदा प्रावधान के तहत 12 महीने तक जारी रहेगी। इसके बाद आगे विस्तार का फैसला प्रशासन की समीक्षा पर निर्भर करेगा।
हर H-1B धारक पर लागू नहीं
इस नीति को सभी H-1B कर्मचारियों पर लागू प्रतिबंध के रूप में देखना सही नहीं होगा।
व्हाइट हाउस के आदेश में स्पष्ट किया गया है कि प्रतिबंध मुख्य रूप से उन विदेशी कर्मचारियों पर लागू होता है जिन्हें अमेरिका में प्रवेश के लिए नई H-1B व्यवस्था के तहत अनुमति चाहिए। मौजूदा H-1B धारकों के कुछ नवीनीकरण मामलों तथा अमेरिका में पहले से मौजूद लोगों से जुड़े कुछ मामलों को अलग रखा गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, छात्र वीजा से स्थिति बदलने वाले कुछ आवेदक और मौजूदा H-1B वीजा के नवीनीकरण भी इस भुगतान व्यवस्था से बाहर हैं।
ट्रम्प प्रशासन का तर्क
ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि H-1B कार्यक्रम का इस्तेमाल कुछ कंपनियों और आउटसोर्सिंग फर्मों ने अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों को रखने के लिए किया है।
व्हाइट हाउस ने कहा है कि नई नीति का मकसद अमेरिकी श्रमिकों की सुरक्षा, वेतन दबाव को कम करना और H-1B व्यवस्था में कथित दुरुपयोग पर लगाम लगाना है। प्रशासन ने यह भी कहा है कि कार्यक्रम का मूल उद्देश्य अत्यधिक कुशल और विशेष योग्यता वाले कर्मचारियों की जरूरत पूरी करना था।
यह प्रशासन का आधिकारिक तर्क है। इसके प्रभाव को लेकर अमेरिकी उद्योग और श्रम बाजार में अलग-अलग राय मौजूद हैं।
भारतीय पेशेवरों के लिए क्यों अहम
H-1B व्यवस्था भारत के लिए खास महत्व रखती है। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा के वित्तीय वर्ष 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, स्वीकृत H-1B याचिकाओं में भारत में जन्मे लाभार्थियों की हिस्सेदारी 71 प्रतिशत थी। चीन लगभग 12 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर था।
इस वजह से H-1B नियमों में बदलाव का भारतीय आईटी पेशेवरों, टेक कंपनियों और अमेरिका में काम करने की योजना बना रहे कुशल कर्मचारियों पर सीधा असर पड़ सकता है।
हालांकि किसी भारतीय नागरिक के लिए अलग से कोई नया प्रतिबंध घोषित नहीं किया गया है। प्रभाव H-1B व्यवस्था के दायरे में आने वाले मामलों पर निर्भर करेगा।
टेक कंपनियों पर भी असर
H-1B कार्यक्रम अमेरिकी टेक उद्योग के लिए लंबे समय से विदेशी विशेषज्ञों की भर्ती का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। Reuters के मुताबिक, मौजूदा नीति को लेकर अनिश्चितता के कारण कुछ कंपनियों ने अपनी भर्ती रणनीतियों में बदलाव किया है और कुछ ने भारत जैसे देशों में अपने संचालन के विस्तार पर भी ध्यान दिया है।
1 लाख डॉलर का भुगतान नियोक्ताओं के लिए भर्ती की लागत में बड़ा बदलाव पैदा करता है। इससे कंपनियों को नए विदेशी कर्मचारियों की भर्ती और मौजूदा वैश्विक कार्यबल के बीच संतुलन पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।
कानूनी लड़ाई जारी
H-1B शुल्क व्यवस्था की कानूनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। Reuters के मुताबिक, एक अमेरिकी संघीय अदालत ने शुल्क वृद्धि को गैरकानूनी ठहराया था और मामला अपील की प्रक्रिया में है। एक अन्य कानूनी चुनौती पर भी अदालत में सुनवाई जारी है।
इसका अर्थ है कि ट्रम्प प्रशासन द्वारा अवधि बढ़ाए जाने के बावजूद अंतिम कानूनी स्थिति अदालतों के फैसलों से प्रभावित हो सकती है।
नीति का अगला चरण इसलिए प्रशासनिक फैसले के साथ-साथ न्यायिक समीक्षा पर भी निर्भर करेगा।
H-1B कार्यक्रम क्या है
H-1B अमेरिका का गैर-आप्रवासी वीजा कार्यक्रम है। इसके तहत अमेरिकी नियोक्ता विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित और अन्य विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर सकते हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत 1990 में हुई थी और यह अमेरिकी टेक उद्योग में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। Reuters के अनुसार, सामान्य तौर पर H-1B वीजा के लिए शुल्क 2,000 से 5,000 डॉलर के बीच रहे हैं, जबकि नई व्यवस्था में कुछ मामलों के लिए 1 लाख डॉलर की राशि निर्धारित की गई है।
अमेरिका में बहस क्यों तेज है
H-1B कार्यक्रम को लेकर अमेरिका में मूल बहस दो हिस्सों में बंटी हुई है।
श्रम संगठनों और नीति के समर्थकों का तर्क है कि कुछ नियोक्ता विदेशी कर्मचारियों का इस्तेमाल कम लागत पर करते हैं, जिससे अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन और रोजगार पर दबाव पड़ सकता है।
दूसरी ओर, कारोबारी समूह और टेक उद्योग से जुड़े पक्ष लंबे समय से कहते रहे हैं कि अमेरिका में कुछ उच्च-कौशल क्षेत्रों में योग्य कर्मचारियों की कमी है और H-1B कार्यक्रम इस अंतर को भरने में मदद करता है।
इसलिए नीति का असर केवल आव्रजन तक सीमित नहीं है। इसका संबंध अमेरिकी श्रम बाजार, टेक उद्योग, कंपनियों की भर्ती लागत और वैश्विक प्रतिभा की आवाजाही से भी है।
आगे क्या होगा
21 सितंबर 2026 से नई विस्तारित अवधि प्रभावी होगी। इसके बाद अमेरिकी प्रशासन को H-1B आवेदन, श्रम बाजार और कार्यक्रम के प्रभावों की समीक्षा करनी होगी।
व्हाइट हाउस ने संबंधित विभागों को H-1B व्यवस्था में वेतन, औद्योगिक परिस्थितियों और रोजगार विशेषज्ञता से जुड़े अतिरिक्त आंकड़ों पर समन्वय बढ़ाने का निर्देश भी दिया है।
साथ ही, अदालतों में चल रही कानूनी प्रक्रिया यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि 1 लाख डॉलर भुगतान की व्यवस्था किस रूप में आगे जारी रहती है।
भारतीय आईटी क्षेत्र के लिए संकेत
भारत H-1B व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभार्थी समूह रहा है। वित्तीय वर्ष 2024 में स्वीकृत H-1B याचिकाओं में भारत में जन्मे लाभार्थियों की हिस्सेदारी 71 प्रतिशत थी।
इसलिए अमेरिका की आव्रजन नीति में हर बड़ा बदलाव भारतीय आईटी पेशेवरों और अमेरिका में सेवाएं देने वाली कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण होता है।
फिलहाल सबसे अहम तथ्य यह है कि 1 लाख डॉलर भुगतान वाली व्यवस्था को एक और साल के लिए बढ़ाया गया है, लेकिन इसकी अंतिम कानूनी स्थिति अदालतों के फैसलों पर निर्भर है। भारतीय पेशेवरों पर वास्तविक असर उनके वीजा प्रकार, आवेदन की स्थिति और अमेरिका में प्रवेश की जरूरत पर निर्भर करेगा।
Harish Qureshi
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।