महिला किसानों के लिए नया कानून, केंद्र में चल रही तैयारी
किसान महिलाओं पर केंद्र का फोकस, कानून बनाने पर विचार
महिला किसानों को अधिकार देने की तैयारी, केंद्र ने बढ़ाया कदम
प्रधानमंत्री की Economic Advisory Council के चेयरमैन एस. महेंद्र देव ने महिला किसानों के सशक्तिकरण के लिए कानूनी पहल की संभावना का संकेत दिया है। यह चर्चा महिला किसानों की पहचान, जमीन के अधिकार, संस्थागत ऋण, बीमा और सरकारी योजनाओं तक पहुंच से जुड़ी है।
📍 Location: तमिलनाडु / नई दिल्ली
📰 Date: 8 अगस्त 2026
✍️ By Mohd Haris
भारत में कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है, लेकिन किसान की औपचारिक पहचान, जमीन के स्वामित्व और संस्थागत सहायता के मामले में कई महिलाएं पीछे रह जाती हैं। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री की Economic Advisory Council के चेयरमैन एस. महेंद्र देव ने महिला किसानों के सशक्तिकरण के लिए संभावित legislation की चर्चा सामने रखी है।
इस प्रस्तावित दिशा का मकसद खेती और allied activities में काम करने वाली महिलाओं को policy framework में अधिक स्पष्ट पहचान देना है। यह मुद्दा केवल महिला कल्याण तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध कृषि उत्पादकता, ग्रामीण आय, credit access और सामाजिक सुरक्षा से है।
भारतीय कृषि में महिलाओं की भागीदारी कई स्तरों पर है। वे खेती, पशुपालन, बीज संरक्षण, harvesting, post-harvest processing और परिवार आधारित कृषि गतिविधियों में काम करती हैं।
लेकिन जमीन का title अक्सर पुरुष सदस्य के नाम होता है। इससे महिला किसान के लिए institutional credit, crop insurance, subsidy और दूसरी सरकारी योजनाओं तक सीधी पहुंच मुश्किल हो सकती है।
इसी समस्या को देखते हुए महिला किसान की पहचान को land ownership से अलग करने की मांग लंबे समय से सामने आती रही है।
महाराष्ट्र सरकार ने जून 2026 में women farmers को औपचारिक recognition देने के लिए एक draft bill को मंजूरी दी थी। प्रस्ताव में उन महिलाओं को भी किसान के रूप में पहचान देने का विचार है जो जमीन की मालिक नहीं हैं, लेकिन कृषि गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल हैं।
ऐसे framework में women farmer certificate जैसी व्यवस्था का विचार सामने आया है। इससे सरकारी schemes, institutional credit, crop insurance और training programmes तक पहुंच आसान बनाने का लक्ष्य है।
महाराष्ट्र का यह कदम राष्ट्रीय स्तर पर policy discussion को प्रभावित कर सकता है।
अगर केंद्र सरकार legislation लाती है तो सबसे बड़ा सवाल definition का होगा। महिला किसान की पहचान केवल land ownership के आधार पर होगी या actual agricultural work को भी मान्यता मिलेगी, यह नीति की दिशा तय करेगा।
एक व्यापक definition में cultivators, tenant farmers, sharecroppers, agricultural labour से जुड़ी महिलाएं और allied activities में काम करने वाली महिलाओं को अलग-अलग श्रेणियों में देखा जा सकता है।
यह व्यवस्था तैयार करना प्रशासनिक रूप से आसान नहीं होगा। सरकार को beneficiary identification के लिए reliable data और verification mechanism तैयार करना पड़ेगा।
महिला किसानों के empowerment में land rights का सवाल केंद्रीय है। अगर महिला जमीन की legal owner नहीं है तो केवल certificate देने से उसके आर्थिक अधिकार पूरी तरह मजबूत नहीं होंगे।
Inheritance laws, joint ownership, tenancy rights और land records में महिलाओं की स्थिति को भी देखना होगा।
इसलिए कोई भी नया कानून अगर केवल welfare schemes तक सीमित रहता है तो उसका प्रभाव सीमित रह सकता है। वास्तविक आर्थिक empowerment के लिए asset ownership और decision-making को भी policy में जगह देनी होगी।
कृषि में निवेश के लिए institutional credit महत्वपूर्ण है। महिला किसानों को अक्सर जमीन के ownership documents की कमी के कारण formal credit तक पहुंच में कठिनाई होती है।
इसी तरह crop insurance schemes में भी beneficiary identification का सवाल आता है। अगर महिला कृषि गतिविधि में सक्रिय है लेकिन land records में उसका नाम नहीं है, तो उसकी direct coverage सीमित हो सकती है।
महिला किसान की formal recognition इस gap को कम करने का रास्ता दे सकती है।
भारत में कृषि क्षेत्र के लिए कई subsidy और support schemes हैं। लेकिन योजना की उपलब्धता और वास्तविक beneficiary तक पहुंच में अंतर रहता है।
Department of Agriculture and Farmers Welfare के framework में भी women farmers के लिए gender-focused interventions का उल्लेख पहले से है। Mahila Kisan Sashaktikaran Pariyojana जैसी योजनाएं महिलाओं की कृषि आधारित livelihoods में भागीदारी बढ़ाने पर केंद्रित रही हैं।
इसलिए नया कानून existing schemes को खत्म करने के बजाय उन्हें अधिक targeted और legally recognised framework दे सकता है।
महिला किसानों की स्थिति सुधारने का सीधा असर rural economy पर पड़ सकता है। अगर महिलाओं को credit, technology, training और market access मिलता है तो household-level agricultural productivity और income management में बदलाव आ सकता है।
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ने से rural financial inclusion भी मजबूत हो सकता है।
लेकिन इसके लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं होगा। Banks, insurance companies, state departments और local administrations को भी implementation framework में जोड़ना होगा।
कृषि परिवारों में निर्णय लेने की प्रक्रिया अक्सर जमीन और आय पर नियंत्रण से जुड़ी होती है। अगर महिलाओं की formal farmer identity मजबूत होती है तो household और community level पर उनकी bargaining power भी बढ़ सकती है।
इसका असर बच्चों की शिक्षा, पोषण और household spending priorities पर भी पड़ सकता है। हालांकि इन outcomes को automatic मानना सही नहीं होगा। वास्तविक असर implementation और household circumstances पर निर्भर करेगा।
किसे महिला किसान माना जाए, इसका स्पष्ट definition सबसे बड़ी चुनौती होगी। अगर eligibility बहुत व्यापक होती है तो beneficiary verification कठिन हो सकता है। अगर definition बहुत सीमित रहती है तो कई वास्तविक महिला किसान बाहर हो सकती हैं।
दूसरी चुनौती राज्यों के land records की अलग-अलग व्यवस्था है। कृषि और land administration में राज्यों की बड़ी भूमिका है। इसलिए central legislation को state-level implementation के साथ carefully align करना होगा।
तमिलनाडु जैसे कृषि प्रधान राज्यों में महिला किसानों की भूमिका कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है। खेती के साथ dairy, livestock, horticulture और छोटे कृषि कारोबार में भी महिलाएं सक्रिय रहती हैं।
इसलिए women farmer policy को केवल खेत की जमीन तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। Allied agricultural activities को भी policy architecture में स्पष्ट स्थान देना होगा।
अगर केंद्र सरकार legislation पर आगे बढ़ती है तो consultation process महत्वपूर्ण होगा। किसान संगठनों, महिला किसान समूहों, राज्य सरकारों, banks और कृषि विशेषज्ञों से सुझाव लेने होंगे।
सबसे जरूरी होगा कि कानून के साथ implementation rules और funding mechanism भी स्पष्ट हों।
वरना formal recognition कागज तक सीमित रह सकती है।
महिला किसानों के सशक्तिकरण के लिए संभावित केंद्रीय legislation की चर्चा भारतीय कृषि नीति में महत्वपूर्ण दिशा दिखाती है। महिला किसान को केवल कृषि श्रमिक के बजाय economic stakeholder और farmer के रूप में पहचान देना policy framework को बदल सकता है।
लेकिन असली बदलाव identity certificate से आगे होगा। जमीन, credit, insurance, technology, market access और सरकारी योजनाओं में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी बढ़ानी होगी।
अगर केंद्र इस दिशा में कानून लाता है और राज्यों के साथ प्रभावी implementation करता है, तो इसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला आर्थिक स्वायत्तता दोनों पर पड़ सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।