जाम्बिया में हिचिलेमा की बड़ी जीत, दूसरी बार राष्ट्रपति बनेंगे
हिचिलेमा फिर बने जाम्बिया के राष्ट्रपति, 61% वोट हासिल
जाम्बिया चुनाव में हिचिलेमा की वापसी, विपक्ष ने दी कड़ी टक्कर
जाम्बिया के राष्ट्रपति हाकाइंडे हिचिलेमा ने 2026 का राष्ट्रपति चुनाव जीतकर दूसरा कार्यकाल हासिल किया। उन्हें करीब 61% वोट मिले, जबकि ब्रायन मुंडुबिले लगभग 38% पर रहे। जीत आर्थिक सुधारों के बावजूद महंगाई और जीवन-यापन की मुश्किलों के बीच मिली है। चुनाव प्रक्रिया में हिंसा और विपक्षी दावों ने भी सवाल उठाए हैं।
लुसाका, जाम्बिया | 18 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
जाम्बिया के राष्ट्रपति हाकाइंडे हिचिलेमा ने राष्ट्रपति चुनाव में निर्णायक जीत दर्ज करते हुए दूसरा कार्यकाल हासिल कर लिया है। इलेक्टोरल कमीशन ऑफ जाम्बिया के आधिकारिक नतीजों के मुताबिक हिचिलेमा को करीब 61% वोट मिले, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी ब्रायन मुंडुबिले को लगभग 38% मत हासिल हुए।
हिचिलेमा की जीत ऐसे वक्त हुई है जब उनकी सरकार आर्थिक स्थिरीकरण और कर्ज पुनर्गठन को अपनी बड़ी उपलब्धियों के रूप में पेश कर रही है। दूसरी तरफ विपक्ष ने महंगाई, खाद्य और ऊर्जा कीमतों तथा आम लोगों की आर्थिक मुश्किलों को चुनावी मुद्दा बनाया।
13 अगस्त को हुए राष्ट्रपति चुनाव में हिचिलेमा ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक उन्हें लगभग 30 लाख वोट मिले, जबकि मुंडुबिले को करीब 18.6 लाख मत प्राप्त हुए। जाम्बिया के चुनावी सिस्टम में राष्ट्रपति बनने के लिए 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करना जरूरी है। हिचिलेमा इस सीमा को आराम से पार कर गए, इसलिए दूसरे दौर के चुनाव की जरूरत नहीं पड़ी। मुख्य विपक्षी उम्मीदवार मुंडुबिले का प्रदर्शन फिर भी अपेक्षा से मजबूत माना गया। रॉयटर्स के मुताबिक उन्होंने रोजमर्रा की आर्थिक परेशानियों को चुनावी अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाया और तर्क दिया कि मैक्रोइकोनॉमिक सुधारों का लाभ आम परिवारों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचा है।
हिचिलेमा ने 2021 में सत्ता संभाली थी। उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में जाम्बिया का कर्ज संकट शामिल रहा। सरकार ने अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं के साथ कर्ज पुनर्गठन की दिशा में काम किया और आर्थिक स्थिरता बहाल करने को प्राथमिकता दी। कॉपर जाम्बिया की अर्थव्यवस्था का केंद्रीय हिस्सा है। देश के विशाल कॉपर संसाधनों ने जाम्बिया को अमेरिका और चीन के बीच महत्वपूर्ण रणनीतिक रुचि वाला देश भी बना दिया है। हिचिलेमा की सरकार ने खनन निवेश और कॉपर उत्पादन बढ़ाने को आर्थिक विस्तार की रणनीति का हिस्सा बनाया है। लेकिन आर्थिक आंकड़ों की तस्वीर और आम नागरिक का अनुभव एक जैसा नहीं है। रॉयटर्स की रिपोर्टिंग के मुताबिक आर्थिक सुधार के बावजूद गरीबी, महंगाई और जीवन-यापन की लागत चुनाव में बड़े मुद्दे बने रहे।
ब्रायन मुंडुबिले के लगभग 38% वोट हासिल करने से यह संकेत मिला कि विपक्षी चुनौती कमजोर नहीं थी। उन्होंने आर्थिक विकास के सरकारी दावों पर सवाल उठाते हुए रोजमर्रा की जिंदगी में महंगाई और रोजगार के असर को चुनावी बहस के केंद्र में रखा। मुंडुबिले और उनके समर्थकों ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए। चुनाव के बाद उन्होंने कुछ मतदान केंद्रों के परिणाम फॉर्म में संभावित बदलाव की आशंका जताई और स्वतंत्र जांच की मांग की। हिचिलेमा के खेमे ने इन आरोपों को खारिज किया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए चुनावी नतीजे को केवल सरकार की आर्थिक सफलता के तौर पर देखना अधूरा होगा। वोट शेयर यह भी बताता है कि विपक्ष ने जनता की आर्थिक नाराजगी को प्रभावी राजनीतिक मुद्दे में बदला।
जाम्बिया का चुनाव पूरी तरह विवादमुक्त नहीं रहा। मतदान और मतगणना के दौरान कुछ इलाकों में चुनाव अधिकारियों पर हमले और बैलेट पेपर चोरी की घटनाएं सामने आईं। इसके बाद इलेक्टोरल कमीशन ने कुछ समय के लिए मतगणना रोक दी थी। चुनावी प्रक्रिया के दौरान विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी ने भी तनाव बढ़ाया। रॉयटर्स के मुताबिक चुनाव की रात अधिकारियों ने 11 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें विपक्ष से जुड़े प्रमुख लोग शामिल थे। सरकार ने इन कार्रवाइयों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी आशंकाओं के आधार पर उचित ठहराया, जबकि विपक्ष ने इसे राजनीतिक दबाव के रूप में देखा। यह विवाद हिचिलेमा के दूसरे कार्यकाल के लिए एक अहम चुनौती है। उनकी सरकार को आर्थिक सुधारों के साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं और राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर उठ रहे सवालों का भी जवाब देना होगा।
हिचिलेमा के पहले कार्यकाल में आर्थिक सुधारों के साथ राजनीतिक असहमति को लेकर भी बहस हुई। आलोचकों ने सरकार पर विपक्ष के खिलाफ कार्रवाई और असहमति के लिए सीमित राजनीतिक स्पेस का आरोप लगाया। सरकार ने दमन के आरोपों से इनकार किया है। एपी की रिपोर्ट के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने चुनाव प्रक्रिया में राजनीतिक स्वतंत्रता और चुनावी माहौल को लेकर कुछ चिंताएं दर्ज कीं। जाम्बिया कॉन्फ्रेंस ऑफ कैथोलिक बिशप्स ने भी मतगणना के दौरान सेना की भूमिका को लेकर सवाल उठाए। इसलिए हिचिलेमा के दूसरे कार्यकाल का मूल्यांकन केवल वोट प्रतिशत से नहीं होगा। चुनाव के बाद संस्थागत पारदर्शिता, विपक्ष के साथ व्यवहार और कानून के शासन की स्थिति भी अंतरराष्ट्रीय निगरानी में रहेगी।
जाम्बिया अफ्रीका के महत्वपूर्ण कॉपर उत्पादक देशों में है। कॉपर इलेक्ट्रिक वाहनों, पावर ग्रिड, रिन्यूएबल एनर्जी और आधुनिक इंडस्ट्री के लिए अहम धातु है। इसी वजह से जाम्बिया की आर्थिक नीति अब केवल घरेलू मामला नहीं रह गई है। चीन लंबे समय से जाम्बिया के कॉपर और कोबाल्ट सेक्टर में प्रमुख निवेशकों में है। दूसरी तरफ अमेरिका भी महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई चेन में चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत अफ्रीकी देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है। हिचिलेमा की दूसरी जीत ऐसे दौर में हुई है जब अफ्रीका के खनिज संसाधनों को लेकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा तेज है। उनके सामने चुनौती होगी कि जाम्बिया विदेशी निवेश आकर्षित करे, लेकिन खनिज संपदा से मिलने वाला आर्थिक लाभ व्यापक आबादी तक भी पहुंचे।
हिचिलेमा ने दूसरे कार्यकाल के लिए अर्थव्यवस्था के विस्तार को केंद्रीय एजेंडा बनाया है। रॉयटर्स के मुताबिक उनका लक्ष्य जाम्बिया की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाना, रोजगार पैदा करना और घरेलू परिवारों के लिए आर्थिक अवसर बढ़ाना है। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह रहेगा कि मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता को रोजमर्रा की आर्थिक राहत में कैसे बदला जाए। कर्ज पुनर्गठन और निवेश महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं, लेकिन मतदाताओं के लिए खाद्य कीमतें, रोजगार, ऊर्जा लागत और आय का स्तर अधिक प्रत्यक्ष मुद्दे हैं। यही वह क्षेत्र है जहां दूसरे कार्यकाल की राजनीतिक सफलता तय होगी। अगर आर्थिक सुधारों का असर आम नागरिक तक स्पष्ट रूप से पहुंचता है, तो हिचिलेमा अपनी पहली पारी की आर्थिक नीति को मजबूत विरासत में बदल सकते हैं।
हिचिलेमा को अब विपक्ष के मजबूत वोट आधार को नजरअंदाज करने के बजाय उसे राजनीतिक संकेत के तौर पर देखना होगा। करीब 38% वोट पाने वाले मुंडुबिले ने यह दिखाया है कि आर्थिक असंतोष और राजनीतिक असहमति अभी भी जाम्बिया की सियासत में महत्वपूर्ण ताकत हैं। आने वाले महीनों में चुनावी विवादों की संभावित कानूनी चुनौती, राजनीतिक संस्थाओं का रवैया और आर्थिक नीतियों की रफ्तार अहम रहेगी। व्यापक राजनीतिक अशांति की संभावना पर विशेषज्ञों ने तत्काल बड़े खतरे की बात नहीं कही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर तनाव से इनकार भी नहीं किया गया है।
हाकाइंडे हिचिलेमा की दूसरी जीत जाम्बिया की सियासत में उनकी स्थिति मजबूत करती है। करीब 61% वोट का जनादेश उन्हें आर्थिक सुधार, कर्ज पुनर्गठन और निवेश केंद्रित रणनीति को आगे बढ़ाने का स्पष्ट अवसर देता है। लेकिन इस जीत के साथ जवाबदेही भी बढ़ी है। विपक्ष का करीब 38% वोट, जीवन-यापन की महंगाई, चुनावी प्रक्रिया को लेकर विवाद और राजनीतिक स्वतंत्रता पर सवाल बताते हैं कि हिचिलेमा की दूसरी पारी आसान नहीं होगी। जाम्बिया के लिए असली कसौटी अब चुनाव परिणाम नहीं, बल्कि अगले पांच वर्षों में आर्थिक सुधारों को व्यापक रोजमर्रा की समृद्धि में बदलना और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भरोसा मजबूत करना होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।