हरीश रावत के इस्तीफे ने उत्तराखंड की 2027 चुनावी सियासत में भर्ती और भ्रष्टाचार के मुद्दे को नया मोड़ दिया है। अब कांग्रेस और धामी सरकार की जवाबदेही पर बहस तेज होगी।
📍 देहरादून, उत्तराखंड
🗓️ 12 सितंबर 2026
✍️ मोहम्मद नावेद
फुल न्यूज़ कंटेंट
हरीश रावत के कांग्रेस के अहम संगठनात्मक पदों से इस्तीफे ने उत्तराखंड की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उनके पूर्व ओएसडी और मौजूदा निजी सहायक चंदन सिंह जीना से जुड़े 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा मामले में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद रावत ने यह कदम उठाया है। मामला अभी जांच के दायरे में है, इसलिए राजनीतिक असर का आकलन करते समय आरोप और साबित तथ्य के बीच फर्क रखना जरूरी है।
रावत के इस्तीफे की टाइमिंग इसलिए अहम है क्योंकि उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज हो चुकी है। कांग्रेस लगातार बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों को लेकर बीजेपी सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और नकल विरोधी कानून को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के तौर पर पेश करती रही है।
हरीश रावत ने क्या छोड़ा?
हरीश रावत ने उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की एग्जीक्यूटिव और कांग्रेस वर्किंग कमेटी के स्थायी आमंत्रित सदस्य के पद से इस्तीफा देने का फैसला किया है। यह फैसला उस वक्त आया जब ईडी ने चंदन सिंह जीना समेत कई परिसरों पर तलाशी की कार्रवाई की।
जीना, हरीश रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान उनके ओएसडी रहे थे और बाद में उनके निजी सहायक के तौर पर भी जुड़े रहे। ईडी की कार्रवाई 2016 में उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग से जुड़ी ग्राम पंचायत विकास अधिकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं की मनी लॉन्ड्रिंग जांच का हिस्सा है।
जांच एजेंसी ने कहा है कि तलाशी के दौरान जीना के परिसर से नकदी, सोना और महंगी घड़ियां मिलीं। एजेंसी के अनुसार कुल करीब 1.28 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त या फ्रीज की गई है।
यहां सबसे अहम कानूनी पहलू यह है कि किसी व्यक्ति के परिसर से बरामदगी या किसी जांच में उसका नाम सामने आना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता। अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही निकलेगा।
रावत के सामने राजनीतिक चुनौती
हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली वरिष्ठ नेताओं में रहे हैं। हालांकि वह पहले ही संकेत दे चुके हैं कि 2027 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने की बात नहीं कही थी।
ऐसे में मौजूदा इस्तीफा चुनावी मैदान छोड़ने से अलग राजनीतिक कदम है। इसका सीधा असर उनकी व्यक्तिगत चुनावी उम्मीदवारी पर नहीं पड़ता, लेकिन कांग्रेस के लिए इसका नैरेटिव महत्व बड़ा है।
कांग्रेस पिछले कुछ समय से भर्ती व्यवस्था और युवाओं के रोजगार को बीजेपी सरकार के खिलाफ प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। अब 2016 की एक परीक्षा से जुड़ी जांच ने कांग्रेस के पुराने शासनकाल को भी राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
यही बीजेपी के लिए सबसे बड़ा सियासी अवसर है।
धामी सरकार के लिए फायदा कहां?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपनी सरकार की राजनीतिक पहचान में भर्ती पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को प्रमुख स्थान दिया है। सरकार की ओर से लगातार सरकारी नियुक्तियों और नकल विरोधी कानून को उपलब्धि के तौर पर सामने रखा जाता रहा है।
हाल के महीनों में धामी सरकार ने सरकारी नौकरियों में हजारों युवाओं को नियुक्ति पत्र दिए हैं। मुख्यमंत्री ने अलग-अलग मौकों पर 34 हजार से अधिक युवाओं को सरकारी सेवा मिलने का दावा किया है।
अब कांग्रेस शासनकाल की एक पुरानी भर्ती परीक्षा की जांच बीजेपी के लिए जवाबी राजनीतिक हथियार बन सकती है।
बीजेपी का संभावित सवाल सीधा होगा। अगर कांग्रेस सरकार के दौर की भर्ती व्यवस्था में गड़बड़ी के आरोपों की जांच हो रही है, तो कांग्रेस आज की सरकार की भर्ती व्यवस्था पर सवाल उठाने की नैतिक स्थिति में कितनी मजबूत है?
लेकिन यह बीजेपी के लिए पूरी तरह एकतरफा फायदा नहीं है।
क्योंकि युवाओं का सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि पिछली सरकार के दौरान क्या हुआ। सवाल यह भी होगा कि मौजूदा सरकार भर्ती परीक्षाओं को कितनी तेजी, पारदर्शिता और निष्पक्षता से संचालित कर रही है।
यानी भर्ती विवाद बीजेपी के लिए राजनीतिक फायदा तभी बनेगा जब सरकार अपनी मौजूदा व्यवस्था को लेकर भी ठोस जवाब दे सके।
कांग्रेस के सामने असली चुनौती
कांग्रेस के लिए समस्या केवल हरीश रावत का इस्तीफा नहीं है। बड़ी चुनौती पार्टी की राजनीतिक विश्वसनीयता है।
अगर पार्टी रोजगार और भर्ती को 2027 का प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाती है, तो उसे अपने शासनकाल से जुड़े पुराने मामलों पर भी स्पष्ट जवाब देना होगा।
कांग्रेस इस मामले को राजनीतिक कार्रवाई या बदले की कार्रवाई के तौर पर पेश कर सकती है। हरीश रावत ने भी जांच की टाइमिंग और राजनीतिक संदर्भ पर सवाल उठाए हैं।
लेकिन कांग्रेस का यह तर्क तभी प्रभावी होगा जब वह जांच के तथ्यों का सामना करते हुए यह स्पष्ट करे कि संबंधित परीक्षा में वास्तविक गड़बड़ी हुई या नहीं और अगर हुई तो जिम्मेदारी किसकी थी।
युवाओं के लिए असली सवाल
उत्तराखंड की राजनीति में भर्ती परीक्षाएं लंबे समय से संवेदनशील मुद्दा रही हैं। पहाड़ी राज्य में सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या और सीमित रोजगार अवसर इस मुद्दे को चुनावी तौर पर महत्वपूर्ण बनाते हैं।
इसलिए 2016 की परीक्षा से जुड़ा मामला केवल पुराने प्रशासनिक विवाद के रूप में नहीं देखा जाएगा।
मुख्य सवाल यह है कि अगर परीक्षा में कथित तौर पर ओएमआर शीट से छेड़छाड़ या दूसरे स्तर की अनियमितता हुई थी, तो इससे किन अभ्यर्थियों को नुकसान हुआ।
दूसरा सवाल जिम्मेदारी का है। परीक्षा संचालन, ओएमआर प्रक्रिया, निजी तकनीकी एजेंसी, अधिकारियों और कथित बिचौलियों की भूमिका क्या थी।
तीसरा सवाल यह है कि जांच कितनी दूर तक जाती है।
अगर जांच केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित रहती है और तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व से कोई प्रत्यक्ष संबंध सामने नहीं आता, तो कांग्रेस के पास इसे राजनीतिक कार्रवाई बताने की ज्यादा गुंजाइश होगी।
अगर जांच में राजनीतिक हस्तक्षेप या सत्ता से जुड़े लोगों की प्रत्यक्ष भूमिका के दस्तावेजी प्रमाण सामने आते हैं, तो कांग्रेस पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
हरीश रावत का इस्तीफा, नुकसान या रणनीति?
हरीश रावत के लिए यह फैसला दो तरह से देखा जा सकता है।
एक तरफ इससे उनके राजनीतिक प्रभाव पर तत्काल दबाव बढ़ता है। उनके करीबी सहयोगी से जुड़ी जांच का मुद्दा विपक्षी बीजेपी के हमले का हिस्सा बन सकता है।
दूसरी तरफ इस्तीफा एक रक्षात्मक राजनीतिक रणनीति भी बन सकता है। रावत यह संदेश दे सकते हैं कि जांच के कारण पार्टी की छवि प्रभावित न हो, इसलिए उन्होंने संगठनात्मक पदों से खुद को अलग किया।
यह कदम उन्हें पूरी तरह राजनीतिक हाशिये पर नहीं डालता। वह पहले ही चुनाव न लड़ने की बात कह चुके हैं और कांग्रेस की चुनावी रणनीति में वरिष्ठ नेता के तौर पर उनकी भूमिका बनी रह सकती है।
इसलिए इसे तत्काल राजनीतिक संन्यास समझना सही नहीं होगा।
2027 के चुनाव में क्या बदलेगा?
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में अभी कई महीने बाकी हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि हरीश रावत का इस्तीफा सीधे तौर पर चुनाव का परिणाम बदल देगा।
लेकिन चुनावी नैरेटिव में बदलाव की संभावना जरूर है।
कांग्रेस चाहती है कि चुनाव का केंद्र रोजगार, महंगाई, विकास, पलायन और सरकार की जवाबदेही बने।
बीजेपी के लिए भर्ती विवाद को कांग्रेस शासनकाल की कथित अनियमितताओं से जोड़ना एक वैकल्पिक नैरेटिव तैयार करता है।
यानी चुनावी बहस का एक हिस्सा बीजेपी सरकार की वर्तमान नीतियों से हटकर कांग्रेस शासनकाल की प्रशासनिक विरासत पर जा सकता है।
यही हरीश रावत के इस्तीफे का सबसे बड़ा राजनीतिक असर है।
धामी के लिए फायदा कितना स्थायी?
मुख्यमंत्री धामी को फिलहाल राजनीतिक तौर पर इस घटनाक्रम से कुछ लाभ मिल सकता है, खासकर भर्ती और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर।
लेकिन यह फायदा स्थायी तभी होगा जब जांच में ठोस तथ्य सामने आएं और सरकार अपनी वर्तमान भर्ती व्यवस्था को लेकर भी सवालों का संतोषजनक जवाब दे।
सिर्फ विपक्ष के पुराने मामलों को सामने रखना पर्याप्त नहीं होगा।
उत्तराखंड के युवा यह देखेंगे कि परीक्षा कितनी पारदर्शी है, परिणाम कितनी जल्दी आते हैं, भर्ती प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष है और विवादित परीक्षाओं में कार्रवाई कितनी तेजी से होती है।
यानी 2027 में मुद्दा केवल कांग्रेस बनाम बीजेपी नहीं रहेगा। मुद्दा भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता भी बनेगा।
आगे की राह
अब तीन घटनाक्रम पर नजर रहेगी।
पहला, कांग्रेस हरीश रावत के इस्तीफे पर क्या औपचारिक रुख अपनाती है।
दूसरा, ईडी की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या नए दस्तावेज या आरोपी सामने आते हैं।
तीसरा, बीजेपी इस मामले को कितनी आक्रामकता से 2027 के चुनावी अभियान में इस्तेमाल करती है।
इन तीनों घटनाक्रमों से यह तय होगा कि मौजूदा विवाद सीमित कानूनी मामला रहता है या उत्तराखंड के चुनावी विमर्श का बड़ा मुद्दा बनता है।
हरीश रावत का इस्तीफा फिलहाल धामी सरकार के लिए राजनीतिक अवसर जरूर पैदा करता है, लेकिन इसे निर्णायक चुनावी फायदा मानना जल्दबाजी होगी।
रावत के सहयोगी से जुड़ी ईडी जांच अभी जारी है। आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया से होगी। इसी वजह से राजनीतिक दलों के दावों और जांच के स्थापित तथ्यों के बीच स्पष्ट अंतर रखना जरूरी है।
2027 की लड़ाई में असली फैसला इस बात से होगा कि उत्तराखंड के मतदाता रोजगार, भर्ती पारदर्शिता, भ्रष्टाचार और सरकार की जवाबदेही को किस नजरिए से देखते हैं।
हरीश रावत का इस्तीफा नैरेटिव बदलने की शुरुआत हो सकता है। लेकिन अंतिम नैरेटिव जांच के सबूत, राजनीतिक रणनीति और जनता के भरोसे से तय होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।