उत्तराखंड हाईकोर्ट ने तिब्बती मूल के एक व्यक्ति की नागरिकता अर्जी पर देहरादून डीएम को जांच का निर्देश दिया। दस्तावेज सही पाए जाने पर आवेदन छह सप्ताह में केंद्र के सक्षम अधिकारी को भेजना होगा। अदालत ने नागरिकता देने का आदेश नहीं दिया, बल्कि लंबित प्रशासनिक प्रक्रिया को कानून के मुताबिक आगे बढ़ाने को कहा है।
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देहरादून | 21 अगस्त 2026 | Apurva Choudhary
नागरिकता अर्जी पर हाईकोर्ट का अहम निर्देश
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने तिब्बती मूल के एक व्यक्ति की भारतीय नागरिकता के लिए दाखिल अर्जी पर देहरादून के जिलाधिकारी को तय प्रक्रिया के मुताबिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि डीएम आवेदन और उसके साथ जमा दस्तावेजों की जांच करें और अगर सब कुछ सही पाया जाता है, तो आवेदन केंद्र सरकार के सक्षम अधिकारी को छह सप्ताह के भीतर भेजें।
यह मामला तिब्बती मूल के व्यक्ति की नागरिकता अर्जी से जुड़ा है और इसमें सबसे अहम बात यह है कि हाईकोर्ट ने सीधे भारतीय नागरिकता देने का आदेश नहीं दिया। अदालत ने प्रशासनिक स्तर पर लंबित आवेदन की जांच और आगे की वैधानिक प्रक्रिया सुनिश्चित करने को कहा है।
मामले में जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की सिंगल बेंच ने तेनजिन थिनले बनाम जिला मजिस्ट्रेट, देहरादून याचिका पर सुनवाई की। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक याचिका संख्या WPMS/2414/2026 हैl
मामला क्या था और हाईकोर्ट क्यों पहुंचा?
याचिकाकर्ता तेनजिन थिनले ने नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6(1) के तहत प्राकृतिककरण के जरिए भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन किया था। उनका कहना था कि आवेदन के साथ जरूरी दस्तावेज जमा किए गए, लेकिन जिला स्तर से उसे केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी तक आगे नहीं भेजा गया।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर प्रशासन को आवेदन पर कार्रवाई करने और आवश्यक रिपोर्ट व औपचारिकताओं के साथ संबंधित केंद्रीय अधिकारी को भेजने का निर्देश देने की मांग की। उन्होंने प्राकृतिककरण के आधार पर नागरिकता प्रमाणपत्र जारी करने से जुड़ी राहत भी मांगी थी।
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से रिकॉर्ड में मौजूद याचिकाकर्ता की व्यक्तिगत जानकारी अदालत के सामने रखी गई। रिपोर्ट के अनुसार उनकी जन्मतिथि 15 सितंबर 1992 बताई गई और यह भी बताया गया कि वह 12 मई 2013 को तिब्बत से भारत आए थे।
हाईकोर्ट ने नागरिकता देने का आदेश क्यों नहीं दिया?
इस फैसले को लेकर सबसे जरूरी कानूनी अंतर यही है कि अदालत ने याचिकाकर्ता को भारतीय नागरिक घोषित नहीं किया है।
हाईकोर्ट का निर्देश मूल रूप से प्रशासनिक प्रक्रिया से संबंधित है। डीएम को पहले आवेदन और दस्तावेजों की जांच करनी है। यदि जांच में सामग्री सही पाई जाती है, तभी आवेदन केंद्र सरकार के सक्षम अधिकारी को भेजा जाना है। अदालत ने इसके लिए प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह सप्ताह की समयसीमा तय की है।
इसका अर्थ यह है कि नागरिकता देने का अंतिम निर्णय अभी बाकी है। आगे की कार्रवाई संबंधित वैधानिक प्राधिकारी द्वारा कानून में निर्धारित शर्तों और प्रक्रिया के आधार पर होगी।
नागरिकता अधिनियम की धारा 6 क्या कहती है?
नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6 प्राकृतिककरण यानी नैचुरलाइजेशन के जरिए भारतीय नागरिकता हासिल करने से संबंधित है। कानून के मुताबिक निर्धारित तरीके से आवेदन करने वाले पात्र व्यक्ति को, यदि केंद्र सरकार यह संतुष्ट हो कि वह तीसरी अनुसूची की शर्तें पूरी करता है, तो प्राकृतिककरण का प्रमाणपत्र दिया जा सकता है।
कानून में प्राकृतिककरण के लिए कई शर्तें हैं। सरकारी नागरिकता पोर्टल के मुताबिक सामान्य पात्रता में आवेदन से ठीक पहले लगातार 12 महीने भारत में निवास या भारत सरकार की सेवा से जुड़ी शर्त और उससे पहले के 14 वर्षों में कुल कम से कम 11 वर्षों तक भारत में निवास या सरकारी सेवा की शर्त शामिल है। अच्छे चरित्र और संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किसी भाषा का पर्याप्त ज्ञान भी पात्रता में शामिल है।
इसलिए किसी व्यक्ति का भारत में रहना अपने आप भारतीय नागरिकता मिलने के बराबर नहीं है। पात्रता, दस्तावेज, वैधानिक जांच और सक्षम प्राधिकारी का निर्णय सभी महत्वपूर्ण हैं।
डीएम को अब क्या करना होगा?
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद देहरादून डीएम के स्तर पर सबसे पहले याचिकाकर्ता की नागरिकता अर्जी और उसके साथ संलग्न दस्तावेजों की जांच होगी।
अदालत के आदेश के अनुसार यदि आवेदन और दस्तावेज जांच में सही पाए जाते हैं, तो उसे केंद्र सरकार के सक्षम अधिकारी के पास भेजा जाएगा। इस कार्रवाई के लिए छह सप्ताह की समयसीमा तय की गई है, जिसकी गणना प्रमाणित आदेश प्राप्त होने की तारीख से होगी।
यहां यह भी समझना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने डीएम को बिना जांच के आवेदन स्वीकार करने या नागरिकता देने का निर्देश नहीं दिया है। निर्देश का केंद्र बिंदु यही है कि आवेदन को कानून के मुताबिक जांचकर आगे की प्रक्रिया पूरी की जाए।
क्या भारत में आने की तारीख से नागरिकता का अधिकार बन जाता है?
नहीं। उपलब्ध रिकॉर्ड में याचिकाकर्ता के 12 मई 2013 को तिब्बत से भारत आने की जानकारी सामने आई है, लेकिन सिर्फ यह तथ्य अपने आप भारतीय नागरिकता का अधिकार स्थापित नहीं करता।
नैचुरलाइजेशन के मामलों में नागरिकता अधिनियम और लागू नियमों के तहत पात्रता की जांच होती है। सरकारी नियमों में आवेदन, दस्तावेज, शपथपत्र और अन्य आवश्यक औपचारिकताओं से जुड़ी प्रक्रिया भी निर्धारित है।
इसलिए इस मामले में आगे का नतीजा डीएम की जांच और उसके बाद सक्षम केंद्रीय प्राधिकारी द्वारा कानून के तहत लिए जाने वाले निर्णय पर निर्भर करेगा।
प्रशासनिक देरी पर अदालत की भूमिका
इस मामले का एक व्यापक पहलू प्रशासनिक देरी से भी जुड़ा है। जब किसी व्यक्ति ने कानून के तहत आवेदन किया हो और उसे निर्धारित प्रक्रिया में आगे बढ़ाने की जरूरत हो, तो अदालत प्रशासन को अपने वैधानिक दायित्व के मुताबिक कार्रवाई करने का निर्देश दे सकती है।
लेकिन न्यायिक निर्देश और नागरिकता प्रदान करने के अंतिम निर्णय के बीच अंतर बना रहता है। नागरिकता कानून में प्राकृतिककरण का प्रमाणपत्र देने का अधिकार केंद्र सरकार के स्तर पर निर्धारित है और यह संबंधित कानूनी पात्रता की संतुष्टि पर निर्भर करता है।
इसी वजह से इस मामले को सीधे “हाईकोर्ट ने नागरिकता दे दी” के तौर पर पेश करना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
तिब्बती मूल के आवेदक के लिए इस आदेश का क्या मतलब है?
इस आदेश का तत्काल असर यह है कि आवेदन अब निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया में आगे बढ़ सकता है। यदि दस्तावेज और दावे जांच में सही पाए जाते हैं, तो डीएम को उसे केंद्र सरकार के सक्षम अधिकारी तक भेजना होगा।
हालांकि आगे नागरिकता मिलेगी या नहीं, इसका फैसला इस आदेश से तय नहीं होता। सक्षम प्राधिकारी को संबंधित कानून और पात्रता मानदंड के आधार पर आवेदन पर निर्णय लेना होगा।
यानी हाईकोर्ट का आदेश प्रक्रिया को आगे बढ़ाने वाला है, नागरिकता प्रदान करने वाला अंतिम आदेश नहीं।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में अगला अहम चरण जिला प्रशासन की जांच होगी। दस्तावेजों और आवेदन की सत्यता तथा वैधानिक आवश्यकताओं की समीक्षा के बाद, यदि सब कुछ ठीक पाया जाता है, तो आवेदन केंद्र सरकार के सक्षम अधिकारी के पास भेजा जाना है।
इसके बाद प्राकृतिककरण से संबंधित केंद्रीय प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। नागरिकता अधिनियम के तहत प्रमाणपत्र मिलने और आवश्यक शपथ पूरी होने के बाद ही प्राकृतिककरण के जरिए नागरिकता प्रभावी होती है।
इसलिए इस मामले का अगला निर्णायक पड़ाव प्रशासनिक जांच और उसके बाद सक्षम केंद्रीय प्राधिकारी का फैसला होगा।