9/11 की 25वीं बरसी पर आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयानों का संदर्भ सामने आया है। भारत आतंकवाद के वित्तपोषण, सुरक्षित पनाहगाह और सीमा पार नेटवर्क के खिलाफ वैश्विक कार्रवाई की वकालत करता रहा है।
नई दिल्ली | 11 सितंबर 2026
नई दिल्ली। अमेरिका में हुए 9/11 आतंकी हमलों को आज 25 साल पूरे हो गए। इस हमले ने वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था, आतंकवाद रोधी नीतियों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा बदल दी थी। इस मौके पर आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने तथा हालिया बयानों का संदर्भ फिर अहम हो गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आतंकवाद के खिलाफ भारत के सख्त रुख को कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्पष्ट कर चुके हैं। उनका जोर आतंकवाद को किसी एक देश या क्षेत्र की समस्या मानने के बजाय वित्तपोषण, कट्टरपंथ, सुरक्षित पनाहगाह और सीमा पार नेटवर्क समेत पूरे तंत्र के खिलाफ कार्रवाई पर रहा है।
11 सितंबर 2001 को अल-कायदा से जुड़े आतंकवादियों ने अमेरिका में विमानों का अपहरण कर न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन को निशाना बनाया। एक अन्य विमान पेंसिल्वेनिया में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। इन हमलों में करीब 3,000 लोगों की जान गई।
हमलों के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ व्यापक सैन्य और सुरक्षा अभियान शुरू किया। अफगानिस्तान में सैन्य कार्रवाई से लेकर खुफिया तंत्र, सीमा सुरक्षा और विमानन सुरक्षा में बड़े बदलाव किए गए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी आतंकवाद के वित्तपोषण और आतंकी नेटवर्क के खिलाफ सदस्य देशों की जिम्मेदारियों को मजबूत किया।
भारत के लिए आतंकवाद का खतरा 9/11 से पहले का है। जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से हिंसक आतंकवाद, सीमा पार नेटवर्क और आतंकी ढांचे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती रहे हैं।
भारत ने 26/11 मुंबई हमलों समेत कई बड़े आतंकी हमलों का सामना किया है। इसी वजह से नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ एक समान नीति और दोहरे मानदंड से बचने की मांग करती रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने हाल के वर्षों में आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति को शून्य सहनशीलता के दृष्टिकोण से जोड़ा है। उन्होंने कहा है कि आतंकवाद से मुकाबले में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एकजुट होकर कार्रवाई करनी होगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद के मुद्दे पर कई मौकों पर यह तर्क रखा है कि आतंकवाद को केवल आतंकी हमले के बाद की कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके पीछे मौजूद वित्तीय नेटवर्क, भर्ती, कट्टरपंथ, सुरक्षित ठिकानों और सहयोगी तंत्र को भी निशाना बनाना जरूरी है।
हालिया शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन में मोदी ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल कार्रवाई और प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने आतंकवादी वित्तपोषण, भर्ती, कट्टरपंथ और सुरक्षित पनाहगाहों के पूरे तंत्र को खत्म करने की जरूरत पर जोर दिया।
यह रुख भारत की उस कूटनीतिक रणनीति से जुड़ा है जिसमें आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहमति, खुफिया सहयोग और अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रभावी इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है।
9/11 के बाद आतंकवाद का स्वरूप भी बदला है। आतंकवादी संगठन अब केवल पारंपरिक हथियारों और संगठित समूहों पर निर्भर नहीं हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म, साइबर माध्यम, ऑनलाइन कट्टरपंथ और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं।
इसी वजह से भारत आतंकवाद के खिलाफ बहुपक्षीय सहयोग को अहम मानता है। भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक सम्मेलन की दिशा में आगे बढ़ने की मांग करता रहा है।
इस मुद्दे पर वैश्विक स्तर पर अभी भी कई मतभेद हैं। आतंकवाद की व्यापक कानूनी परिभाषा और अलग-अलग देशों के राजनीतिक हितों को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहमति पूरी तरह कायम नहीं हो सकी है।
भारत की कूटनीति में आतंकवाद पर दोहरे मानदंड का मुद्दा लगातार प्रमुख रहा है। नई दिल्ली का तर्क है कि किसी भी आतंकी संगठन या नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई उसकी राजनीतिक पहचान या क्षेत्रीय स्थिति के आधार पर अलग नहीं होनी चाहिए।
हाल में एससीओ घोषणापत्र में भी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरे मानदंड को अस्वीकार्य बताया गया। इसमें संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका और सुरक्षा परिषद के संबंधित प्रस्तावों तथा वैश्विक आतंकवाद रोधी रणनीति के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया गया।
भारत पिछले कई वर्षों से आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग को अपनी विदेश नीति के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में आगे बढ़ाता रहा है। इसमें आतंकवादी वित्तपोषण रोकना, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, सीमा सुरक्षा मजबूत करना और आतंकवाद के समर्थक नेटवर्क पर कार्रवाई जैसे मुद्दे शामिल हैं।
भारत का रुख केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली आतंकवाद के खिलाफ कानूनी, वित्तीय, कूटनीतिक और सुरक्षा तंत्र को एक साथ मजबूत करने की बात करती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी हाल के बयानों में आतंकवाद के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को खत्म करने की जरूरत बताई है। उनके अनुसार आतंकवाद को किसी रणनीतिक साधन के रूप में इस्तेमाल करने की नीति के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट संदेश जरूरी है।
इस वर्ष 9/11 हमलों की 25वीं बरसी मनाई जा रही है। अमेरिका में न्यूयॉर्क, पेंटागन और पेंसिल्वेनिया में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी जा रही है। स्मरण समारोहों में पीड़ितों के नाम पढ़े जा रहे हैं और उन सुरक्षाकर्मियों तथा राहतकर्मियों को भी याद किया जा रहा है जिन्होंने हमलों के बाद राहत और बचाव अभियान में हिस्सा लिया था।
इन 25 वर्षों में आतंकवाद विरोधी नीतियों में व्यापक बदलाव आया है। लेकिन अफ्रीका, पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय आतंकी संगठन यह दिखाते हैं कि खतरा खत्म नहीं हुआ है।
आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई की सबसे बड़ी चुनौती अब बदलते हुए आतंकी नेटवर्क हैं। ऑनलाइन कट्टरपंथ, डिजिटल प्रचार, ड्रोन तकनीक, अवैध वित्तीय नेटवर्क और सीमा पार गतिविधियां सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई मुश्किलें पैदा कर रही हैं।
ऐसे में केवल सैन्य कार्रवाई से आतंकवाद को खत्म करने की रणनीति पर्याप्त नहीं मानी जाती। सुरक्षा एजेंसियों के बीच सूचना साझा करना, आतंकवादी वित्तपोषण रोकना, कानून का प्रभावी इस्तेमाल और युवाओं में कट्टरपंथ रोकना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
भारत का रुख इसी व्यापक सुरक्षा दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है। प्रधानमंत्री मोदी लगातार आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक और बिना दोहरे मानदंड वाली अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की बात करते रहे हैं।
9/11 की 25वीं बरसी केवल अमेरिका में हुए एक भयावह आतंकी हमले की याद नहीं है। यह उस वैश्विक सुरक्षा बदलाव की भी याद दिलाती है जिसने पिछले 25 वर्षों में देशों की आतंकवाद रोधी रणनीतियों को प्रभावित किया।
भारत के लिए यह अवसर आतंकवाद के खिलाफ अपने लंबे अनुभव और वैश्विक सहयोग की जरूरत को सामने रखने का भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश स्पष्ट रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कार्रवाई केवल हमले के बाद नहीं, बल्कि उसके वित्तपोषण, नेटवर्क, भर्ती और सुरक्षित ठिकानों के खिलाफ भी होनी चाहिए।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।