जमानत क्या है और अभियुक्त को कब मिलती है राहत?
जमानत के नियम क्या हैं? जानिए पूरी कानूनी प्रक्रिया
गिरफ्तारी के बाद जमानत कैसे मिलती है? समझिए नियम
जमानत आपराधिक मामले में आरोपी को मुकदमे के दौरान शर्तों के साथ अस्थायी रिहाई का कानूनी माध्यम है। अदालत मामले की प्रकृति, परिस्थितियों और अन्य प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करती है। वर्तमान में आपराधिक प्रक्रिया के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू है, जिसमें जमानत और बॉन्ड से जुड़े प्रावधान हैं।
Location: भारत
Date: 31 जुलाई 2026
By K P Saimi
आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के बाद उसके सामने सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवालों में से एक जमानत का होता है। सामान्य अर्थ में जमानत वह कानूनी व्यवस्था है जिसके तहत किसी आरोपी को मुकदमे की सुनवाई पूरी होने से पहले निर्धारित शर्तों के साथ हिरासत से रिहा किया जा सकता है।
जमानत का अर्थ आरोपी को दोषमुक्त घोषित करना नहीं है। यह मुकदमे के दौरान मिलने वाली रिहाई है, जिसमें आरोपी को अदालत की ओर से लगाई गई शर्तों का पालन करना होता है और आवश्यकता के अनुसार न्यायिक प्रक्रिया में उपस्थित रहना होता है।
भारत में आपराधिक प्रक्रिया से जुड़े मामलों के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) 1 जुलाई 2024 से लागू है। इसके अध्याय XXXV में जमानत और बॉन्ड से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े प्रावधान भी निर्धारित किए गए हैं। कानून के अनुसार गिरफ्तार व्यक्ति को बिना अनावश्यक देरी के मजिस्ट्रेट या संबंधित पुलिस अधिकारी के सामने ले जाने का प्रावधान है। किसी गिरफ्तार व्यक्ति को सामान्य परिस्थितियों में 24 घंटे से अधिक समय तक बिना मजिस्ट्रेट के विशेष आदेश के हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
BNSS की धारा 47 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार और, लागू स्थिति में, जमानत के अधिकार के बारे में जानकारी दिए जाने का प्रावधान है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि हर मामले में जमानत स्वतः नहीं मिलती। अपराध जमानती है या गैर-जमानती, मामले की परिस्थितियां क्या हैं और संबंधित कानूनी प्रावधान क्या कहते हैं, इन बातों के आधार पर प्रक्रिया अलग हो सकती है।
1. नियमित जमानत
नियमित जमानत सामान्यतः उस स्थिति से जुड़ी होती है जब आरोपी गिरफ्तारी के बाद हिरासत में होता है और अदालत से रिहाई की मांग करता है। गैर-जमानती अपराधों में अदालत संबंधित कानून और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए जमानत देने या न देने पर विचार करती है।
BNSS की धारा 480 गैर-जमानती अपराधों में जमानत से संबंधित प्रावधान देती है। वहीं उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय को धारा 483 के तहत जमानत से संबंधित विशेष शक्तियां प्राप्त हैं।
2. अग्रिम जमानत
अग्रिम जमानत उस स्थिति से संबंधित है जब किसी व्यक्ति को किसी गैर-जमानती अपराध के आरोप में गिरफ्तारी की आशंका हो। BNSS की धारा 482 में गिरफ्तारी की आशंका वाले व्यक्ति के लिए जमानत का निर्देश देने का प्रावधान है।
इस प्रकार की राहत भी अदालत के आदेश और निर्धारित शर्तों के अधीन होती है।
3. अंतरिम जमानत
अंतरिम जमानत किसी मामले में सीमित अवधि या विशेष परिस्थिति के लिए दी जाने वाली अस्थायी राहत हो सकती है। इसकी उपलब्धता और शर्तें संबंधित मामले तथा अदालत के आदेश पर निर्भर करती हैं।
इसलिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि हर आरोपी को समान तरीके से अंतरिम जमानत मिलेगी। अदालत मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर निर्णय करती है।
जमानत का फैसला करते समय अदालत मामले से जुड़े कानूनी और तथ्यात्मक पहलुओं पर विचार करती है। इनमें अपराध की प्रकृति और गंभीरता, उपलब्ध सामग्री, आरोपी की स्थिति तथा न्यायिक प्रक्रिया पर संभावित प्रभाव जैसे पहलू प्रासंगिक हो सकते हैं।
गैर-जमानती अपराधों में अदालत द्वारा लगाई जाने वाली शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना भी हो सकता है कि आरोपी न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करे और अदालत के समक्ष उपस्थित होता रहे।
BNSS की धारा 483 के तहत उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय को जमानत देने तथा कुछ परिस्थितियों में पहले लगाई गई शर्तों को संशोधित या हटाने की शक्ति दी गई है। इसी धारा में कुछ गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में लोक अभियोजक को नोटिस देने संबंधी प्रावधान भी हैं।
जमानत की प्रक्रिया में आवश्यक दस्तावेज मामले और अदालत के निर्देशों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। सामान्य तौर पर जमानत आवेदन, मामले से संबंधित रिकॉर्ड और अदालत द्वारा मांगे गए बॉन्ड या जमानत संबंधी दस्तावेज प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं।
कई मामलों में जमानतदार और बॉन्ड की आवश्यकता भी हो सकती है। BNSS की धारा 484 बॉन्ड की राशि से संबंधित प्रावधान करती है, जबकि धारा 485 आरोपी और जमानतदारों के बॉन्ड से संबंधित है।
नोट: किसी विशेष मामले में आवश्यक दस्तावेजों की सटीक सूची अदालत के आदेश, अपराध की प्रकृति और स्थानीय न्यायिक प्रक्रिया के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए केवल सामान्य सूची के आधार पर किसी मामले की पूरी प्रक्रिया तय नहीं की जा सकती।
जमानत मिलने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी मामले से पूरी तरह मुक्त हो गया। मुकदमा जारी रह सकता है और आरोपी को अदालत द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन करना पड़ सकता है।
अदालत द्वारा निर्धारित बॉन्ड या जमानत की शर्तों का उल्लंघन होने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। BNSS में जमानत बॉन्ड के रद्द होने और जमानत से संबंधित अन्य प्रक्रियाओं के लिए भी प्रावधान मौजूद हैं।
उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय के पास जमानत पर रिहा व्यक्ति को दोबारा हिरासत में भेजने का निर्देश देने की शक्ति भी है।
जमानत और दोषमुक्ति दो अलग कानूनी अवधारणाएं हैं। जमानत मुकदमे के दौरान हिरासत से रिहाई से संबंधित है, जबकि दोषमुक्ति का संबंध मुकदमे के परिणाम से होता है।
इसलिए किसी आरोपी को जमानत मिलने को अदालत द्वारा उसे निर्दोष घोषित किए जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अंतिम परिणाम मुकदमे की सुनवाई और न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करता है।
जमानत की व्यवस्था आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया के बीच संतुलन से जुड़ी है। एक ओर जांच और मुकदमे की प्रक्रिया को सुरक्षित रखना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर आरोपी को मुकदमे के दौरान कानून के अनुसार उपलब्ध राहत का अवसर भी मिलता है।
जमानत के मामलों में अदालत का आदेश, लागू कानून और मामले के विशिष्ट तथ्य महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति के मामले में जमानत की संभावना के बारे में सामान्य जानकारी के आधार पर निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
जमानत मिलने के बाद आपराधिक मामला अपने निर्धारित कानूनी चरणों के अनुसार आगे बढ़ता है। आरोपी को अदालत द्वारा तय शर्तों का पालन करना होता है और मामले की सुनवाई में आवश्यकतानुसार उपस्थित रहना पड़ सकता है।
यदि जमानत से जुड़ी शर्तों का उल्लंघन होता है, तो संबंधित अदालत कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकती है। BNSS में जमानत और बॉन्ड से जुड़े मामलों के लिए अलग-अलग प्रावधान मौजूद हैं।
जमानत आपराधिक न्याय व्यवस्था में आरोपी को मुकदमे के दौरान शर्तों के साथ अस्थायी रिहाई का कानूनी अवसर देती है। यह दोषमुक्ति नहीं होती और न ही इसका अर्थ मुकदमे का अंत है।
वर्तमान कानून के तहत जमानत से संबंधित प्रमुख प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अध्याय XXXV में दिए गए हैं। नियमित जमानत, अग्रिम जमानत और अंतरिम राहत की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। किसी विशेष मामले में अंतिम निर्णय संबंधित अदालत लागू कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर करती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।