मखाना बाजार में बड़ा उछाल, किसानों को उम्मीद
मखाने की बढ़ती मांग से खुलेंगे नए बाजार
12,000 करोड़ तक पहुंच सकता है मखाना बाजार
भारत का मखाना बाजार 2029-30 तक 11,000 से 12,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। बढ़ती घरेलू मांग, बेहतर कीमत, निर्यात और प्रीमियम ब्रांडिंग इसकी रफ्तार बढ़ा रहे हैं। बिहार उत्पादन का केंद्र बना हुआ है। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड और 476.03 करोड़ रुपये की केंद्रीय योजना से मूल्यवर्धन, प्रसंस्करण और किसानों को बाजार मिलेगा।
Location: नई दिल्ली
Date: 19 अगस्त 2026
ByMohd Naved
मखाना बाजार 2029-30 तक 12,000 करोड़ का हो सकता है
भारत का मखाना बाजार आने वाले वर्षों में कृषि अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा बन सकता है। एपीडा के सितंबर 2025 के मखाना डैशबोर्ड के मुताबिक, घरेलू बाजार 2021-22 से 2024-25 के बीच 17-18 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ा है और 2029-30 तक 11,000 से 12,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इसी आकलन में यह भी कहा गया है कि हालिया वृद्धि में कीमतों का योगदान उत्पादन वृद्धि की तुलना में ज्यादा रहा है।
मखाना, जिसे फॉक्स नट भी कहा जाता है, भारत में पारंपरिक खाद्य उत्पाद से आगे बढ़कर हेल्थ स्नैक की श्रेणी में अपनी जगह बना रहा है। बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता, प्रीमियम उत्पादों की मांग और ब्रांडेड पैकेजिंग ने इसके बाजार को नया आकार दिया है।
उपलब्ध फैक्टशीट के अनुसार, वित्त वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच मखाने के उत्पादन में करीब 4 से 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि औसत कीमत लगभग 500 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 1,250 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। इसका मतलब है कि बाजार की मौद्रिक वृद्धि केवल ज्यादा उत्पादन पर निर्भर नहीं रही, बल्कि कीमत और वैल्यू एडिशन ने भी अहम भूमिका निभाई है।
एपीडा के आंकड़े भी इस रुझान की पुष्टि करते हैं। उसके अनुसार 2020 से 2025 के बीच मखाने का खेती क्षेत्र करीब 25,000-27,000 हेक्टेयर से बढ़कर 35,000-40,000 हेक्टेयर हुआ, जबकि उत्पादन 60,000-63,000 मीट्रिक टन के स्तर तक पहुंचा।
मखाने की खेती लंबे समय से बिहार के मिथिलांचल और आसपास के जलक्षेत्रों से जुड़ी रही है। पारंपरिक तालाब आधारित खेती इसकी उत्पादन व्यवस्था का आधार रही है। अब फील्ड आधारित खेती और नई कृषि तकनीकों के विस्तार से इसका दायरा बढ़ाने की कोशिश हो रही है।
एपीडा के मुताबिक, फील्ड आधारित खेती उन इलाकों में मखाना उत्पादन का रास्ता खोलती है जहां पारंपरिक तालाब आधारित व्यवस्था संभव नहीं है। मखाना और मछली की एकीकृत खेती भी संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल और अतिरिक्त आय का रास्ता देती है।
उपलब्ध सरकारी फैक्टशीट में 2024-25 के लिए उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन और उत्पादकता 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान में उत्पादन 80,590 मीट्रिक टन और उत्पादकता 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर रहने का अनुमान दिया गया है।
इन आंकड़ों में एक अहम संदेश छिपा है। यदि उत्पादन और उत्पादकता दोनों में सुधार होता है, तो बाजार की वृद्धि केवल कीमत बढ़ने पर निर्भर नहीं रहेगी।
मखाना क्षेत्र में सरकारी नीति का रुख पिछले कुछ वर्षों में अधिक संस्थागत हुआ है। केंद्रीय बजट 2025-26 में बिहार में मखाना बोर्ड बनाने की घोषणा की गई थी। इसका उद्देश्य उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और मार्केटिंग को मजबूत करना था।
इसके बाद राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना हुई। सरकार के मुताबिक बोर्ड का औपचारिक शुभारंभ 15 सितंबर 2025 को बिहार में हुआ। दिसंबर 2025 में बोर्ड की पहली बैठक के दौरान क्षेत्र के लिए समन्वित विकास का रोडमैप सामने रखा गया।
केंद्र ने 2025-26 से 2030-31 तक मखाना विकास के लिए 476.03 करोड़ रुपये की केंद्रीय क्षेत्र योजना को मंजूरी दी है। इसमें अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण बीज, किसान प्रशिक्षण, कटाई और कटाई-पश्चात प्रबंधन, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग, मार्केटिंग, निर्यात और गुणवत्ता नियंत्रण शामिल हैं।
केंद्र सरकार का फोकस मखाना मूल्य शृंखला को संगठित करने पर है। सरकार के मुताबिक गुणवत्तापूर्ण बीज, प्रशिक्षण, प्रसंस्करण सुविधाओं और बाजार संपर्क को मजबूत करने से किसानों को बेहतर आर्थिक अवसर मिल सकते हैं।
बजट में मखाना बोर्ड के जरिए किसानों को प्रशिक्षण और हैंडहोल्डिंग सहायता देने तथा उन्हें किसान उत्पादक संगठनों से जोड़ने की दिशा भी तय की गई थी।
दूसरी तरफ बाजार का मौजूदा रुझान यह बताता है कि उपभोक्ता मांग में स्वास्थ्य और प्रीमियम उत्पादों का हिस्सा बढ़ रहा है। इससे सादा मखाना ही नहीं, बल्कि फ्लेवर्ड, पैकेज्ड और ब्रांडेड उत्पादों के लिए भी कारोबारी गुंजाइश बन रही है।
सबसे महत्वपूर्ण संकेत घरेलू बाजार की वृद्धि दर है। एपीडा के मखाना डैशबोर्ड में 2021-22 से 2024-25 के दौरान घरेलू बाजार की सालाना वृद्धि 17-18 प्रतिशत बताई गई है। इसी आकलन में 2029-30 तक 11,000-12,000 करोड़ रुपये के बाजार का अनुमान दिया गया है।
लेकिन इस अनुमान को समझते समय एक अहम सावधानी जरूरी है। एपीडा की रिपोर्ट के मुताबिक हाल के वर्षों में उत्पादन में केवल सीमित वृद्धि हुई, जबकि कीमतों में तेज़ इजाफा हुआ। इसलिए बाजार का विस्तार पूरी तरह मात्रा आधारित वृद्धि नहीं है। कीमत, प्रीमियमाइजेशन और ब्रांडेड बिक्री भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
निर्यात भी संभावनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एपीडा के अनुसार 2025 के अनुमान में भारत का मखाना उत्पादन 60,000-63,000 मीट्रिक टन के स्तर पर था और भारत के पास वैश्विक बाजार में प्रीमियम हेल्थ स्नैक के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर है।
यदि उत्पादन में उत्पादकता आधारित वृद्धि आती है, तो किसानों की आय के लिए स्थिति बेहतर हो सकती है। लेकिन इसका सीधा फायदा तभी टिकाऊ होगा जब किसानों को बाजार मूल्य का उचित हिस्सा मिले।
मखाना मूल्य शृंखला में खेती के बाद सफाई, सुखाने, ग्रेडिंग, पॉपिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग जैसे चरण हैं। इन गतिविधियों में स्थानीय प्रसंस्करण क्षमता बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और छोटे कारोबार के अवसर बढ़ सकते हैं।
सरकारी योजना में इसी वजह से कटाई-पश्चात प्रबंधन और मूल्य संवर्धन को महत्व दिया गया है। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की पहली बैठक में ग्रेडिंग, ड्राइंग, पॉपिंग और पैकेजिंग के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया था।
मखाना क्षेत्र को लेकर नीति का रुख अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। सरकार मूल्य शृंखला के अलग-अलग हिस्सों को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।
476.03 करोड़ रुपये की योजना का दायरा अनुसंधान से लेकर निर्यात तक फैला है। इसका अर्थ है कि सरकार मखाना को पारंपरिक कृषि उपज के बजाय संगठित कृषि-व्यवसाय और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के हिस्से के रूप में देख रही है।
हालांकि नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि योजनाओं का क्रियान्वयन खेत स्तर तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचता है।
मखाना बाजार का विस्तार बिहार के लिए खास महत्व रखता है क्योंकि राज्य इसका प्रमुख उत्पादन केंद्र है। एपीडा के आकलन में बिहार को भारत के मखाना उत्पादन का प्रमुख आधार बताया गया है।
किसानों के लिए बड़ा अवसर उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ बेहतर गुणवत्ता और बाजार संपर्क में है। यदि किसान केवल कच्चे उत्पाद की बिक्री तक सीमित रहते हैं, तो मूल्य शृंखला का बड़ा हिस्सा प्रसंस्करण और ब्रांडिंग स्तर पर बना रहेगा।
इसके विपरीत किसान उत्पादक संगठन, स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयां और बेहतर बाजार संपर्क किसानों की सौदेबाजी क्षमता बढ़ा सकते हैं। बजट 2025-26 में भी मखाना क्षेत्र से जुड़े लोगों को एफपीओ से संगठित करने पर जोर दिया गया था।
वैश्विक बाजार में प्लांट-बेस्ड और क्लीन-लेबल स्नैकिंग की मांग मखाने के लिए अवसर पैदा कर रही है। एपीडा के आकलन में अमेरिका, यूरोप, मध्य पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बाजारों में भारतीय मखाने के लिए संभावनाएं बताई गई हैं।
भारत की मौजूदा उत्पादन क्षमता उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत स्थिति देती है। लेकिन निर्यात बढ़ाने के लिए केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं होगा। गुणवत्ता मानक, स्थिर आपूर्ति, पैकेजिंग, प्रसंस्करण और अंतरराष्ट्रीय बाजारों की नियामकीय जरूरतें भी पूरी करनी होंगी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2029-30 तक 11,000-12,000 करोड़ रुपये के अनुमानित बाजार में किसानों की हिस्सेदारी कितनी बढ़ेगी।
दूसरा सवाल उत्पादकता का है। यदि उत्पादन वृद्धि मुख्य रूप से कीमतों के सहारे होती है, तो बाजार विस्तार के साथ उपभोक्ताओं पर कीमत का दबाव भी बढ़ सकता है। एपीडा ने भी मौजूदा वृद्धि को काफी हद तक कीमत आधारित बताया है।
तीसरा सवाल जल प्रबंधन और खेती के भौगोलिक विस्तार का है। मखाना उत्पादन को नए इलाकों तक ले जाने के लिए तकनीकी ज्ञान, गुणवत्तापूर्ण बीज और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि मॉडल की जरूरत होगी।
आने वाले वर्षों में मखाना क्षेत्र की दिशा तीन प्रमुख कारकों से तय होगी। पहला, प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में कितना सुधार आता है। दूसरा, किसानों को प्रसंस्करण और बाजार से कितना बेहतर जोड़ा जाता है। तीसरा, भारत निर्यात बाजार में गुणवत्ता और ब्रांडिंग के स्तर पर कितनी मजबूती हासिल करता है।
राष्ट्रीय मखाना बोर्ड और 476.03 करोड़ रुपये की केंद्रीय योजना इस दिशा में संस्थागत आधार उपलब्ध कराते हैं।
यदि इन पहलों का प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो मखाना क्षेत्र कच्चे कृषि उत्पाद से आगे बढ़कर प्रसंस्कृत खाद्य, ब्रांडेड स्नैक और निर्यात उत्पाद की मजबूत श्रेणी बन सकता है।
मखाना बाजार का 2029-30 तक 11,000-12,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान भारतीय कृषि और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। उपलब्ध आंकड़े मांग, कीमत और उत्पादन तीनों में बदलाव की तस्वीर पेश करते हैं, लेकिन बाजार की मौजूदा वृद्धि में कीमतों की भूमिका बड़ी रही है।
इसलिए असली कसौटी केवल बाजार का आकार नहीं होगी। किसान की आय, उत्पादकता, प्रसंस्करण क्षमता और निर्यात प्रतिस्पर्धा यह तय करेंगे कि मखाने की यह तेजी कितनी टिकाऊ साबित होती है। सरकारी योजना और राष्ट्रीय मखाना बोर्ड ने ढांचा तैयार किया है। अब निगाह इसके जमीनी अमल और किसानों तक पहुंचने वाले वास्तविक लाभ पर रहेगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।