मराठी भाषा नियम पर हाई कोर्ट में सुनवाई
महाराष्ट्र में ऑटो, टैक्सी और ऐप आधारित कैब चालकों के लिए मराठी भाषा के ज्ञान की अनिवार्यता को लेकर चल रहा विवाद फिलहाल एक साल की मोहलत के साथ थम गया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार की ओर से दी गई जानकारी दर्ज करते हुए चार कैब चालकों की जनहित याचिका का निपटारा कर दिया।
सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने स्पष्ट किया कि ऑटो रिक्शा, टैक्सी और कैब चालकों को मराठी भाषा सीखने और उसका कामकाजी ज्ञान हासिल करने के लिए 1 साल का समय दिया जाएगा। अदालत ने सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लिया और याचिका का निपटारा कर दिया।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की पीठ में हुई सुनवाई
मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविंद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की पीठ ने की। याचिका चार ऐप आधारित कैब चालकों की ओर से दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसके तहत ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा का कामकाजी ज्ञान जरूरी किया गया था।
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सरकारी वकील ज्योति चव्हाण ने अदालत को बताया कि परिवहन विभाग की ओर से ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए 1 साल का समय देने की पुष्टि की गई है। इसके बाद अदालत ने राज्य सरकार का बयान दर्ज किया और याचिका को समाप्त कर दिया।
12 अगस्त के आदेश को लेकर उठा था विवाद
महाराष्ट्र के परिवहन विभाग ने 12 August 2026 को महाराष्ट्र मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1989 में बदलाव से जुड़ा आदेश जारी किया था। इसमें ऑटो रिक्शा, टैक्सी और ऐप आधारित कैब चालकों के लिए मराठी भाषा का कामकाजी ज्ञान एक शर्त के तौर पर रखा गया था। नियम के अनुपालन को परमिट और बैज से भी जोड़ा गया था।
सरकार की कार्रवाई के बाद कई गैर-मराठी भाषी ड्राइवरों को भाषा संबंधी जांच और नोटिस का सामना करना पड़ा। इसी के बाद इस मुद्दे ने कानूनी और सियासी दोनों स्तरों पर तूल पकड़ा।
ड्राइवरों ने क्या दलील दी
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि भाषा संबंधी शर्त उनके संवैधानिक अधिकारों और रोज़गार पर असर डाल सकती है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का हवाला दिया गया था।
ड्राइवरों की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 में ड्राइविंग लाइसेंस के लिए इस तरह की भाषा संबंधी अनिवार्यता निर्धारित नहीं है। याचिका में इस आधार पर राज्य सरकार के आदेश की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा था कि महाराष्ट्र में रोज़गार के लिए आने वाले दूसरे राज्यों के नागरिकों के साथ अलग व्यवहार नहीं होना चाहिए। हालांकि, ये याचिका में लगाए गए तर्क थे, जिन्हें अदालत ने इस स्तर पर अंतिम रूप से सही या गलत घोषित नहीं किया।
सरकार ने एक साल की मोहलत क्यों दी
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इससे पहले कहा था कि ऑटो और टैक्सी चालक अलग-अलग उम्र और शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आते हैं। कई ड्राइवर लंबे समय पहले औपचारिक शिक्षा छोड़ चुके हैं। ऐसे में कम समय में भाषा सीखने की शर्त उनके लिए मुश्किल बन रही थी।
ड्राइवर संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी सरकार के साथ बैठक में मराठी सीखने की आवश्यकता को लेकर अपनी सहमति जताई थी। साथ ही उन्होंने तैयारी के लिए अतिरिक्त समय की मांग रखी थी। इसके बाद राज्य सरकार ने 1 साल की मोहलत देने का फैसला किया।
सरकार के अनुसार इस अतिरिक्त अवधि में ड्राइवरों को भाषा सीखने का अवसर मिलेगा। इस दौरान भाषा संबंधी कमी के आधार पर कार्रवाई नहीं किए जाने की बात भी सरकार की ओर से कही गई है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई
मामला उस समय ज्यादा गंभीर हुआ जब परिवहन विभाग ने भाषा संबंधी नियम के अनुपालन की जांच शुरू की। कुछ ड्राइवरों को नोटिस दिए गए और भाषा परीक्षण को लेकर भी आपत्तियां सामने आईं।
गैर-मराठी भाषी ड्राइवरों के एक वर्ग ने आशंका जताई कि नियम के सख्त अमल से उनके परमिट, बैज और रोज़गार पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, सरकार का पक्ष रहा है कि सार्वजनिक परिवहन से जुड़े ड्राइवरों को राज्य की स्थानीय भाषा का बुनियादी ज्ञान होना यात्रियों के साथ संवाद के लिए उपयोगी है।
यही वजह है कि विवाद केवल भाषा नीति तक सीमित नहीं रहा। इसमें रोज़गार, प्रशासनिक नियम, संवैधानिक अधिकार और स्थानीय भाषा के संरक्षण जैसे कई पहलू शामिल हो गए।
हाई कोर्ट के फैसले का मतलब क्या है
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मराठी भाषा की अनिवार्यता को लेकर अंतिम संवैधानिक फैसला नहीं दिया। अदालत ने सरकार द्वारा 1 साल की मोहलत दिए जाने के बयान को रिकॉर्ड किया और उसके आधार पर याचिका का निपटारा कर दिया।
इसलिए इसे भाषा नियम को पूरी तरह रद्द किए जाने के तौर पर देखना सही नहीं होगा। मौजूदा घटनाक्रम का सीधा मतलब यह है कि सरकार ने ड्राइवरों को नियम पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय दिया है और अदालत ने इसी सरकारी आश्वासन के बाद मौजूदा याचिका को समाप्त कर दिया।
पहले भी अदालत में उठ चुका है भाषा का सवाल
महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा परमिट और मराठी भाषा से जुड़ा विवाद नया नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 1 March 2017 के एक आदेश का भी हवाला दिया था। उस मामले में नवंबर 2016 के एक सर्कुलर के जरिए ऑटो रिक्शा परमिट के लिए मराठी को अनिवार्य करने की व्यवस्था को चुनौती दी गई थी और अदालत ने उसे रद्द कर दिया था।
हालांकि मौजूदा मामला अलग सरकारी अधिसूचना और मौजूदा नियमों से जुड़ा है। इसलिए पुराने आदेश और वर्तमान नियम के बीच कानूनी स्थिति का मूल्यांकन अलग आधार पर होगा।
अब आगे क्या होगा
राज्य सरकार के फैसले के बाद ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए 1 साल का समय मिलेगा। इस अवधि में प्रशिक्षण और भाषा सीखने की व्यवस्था को लेकर सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
सरकार ने पहले राज्य में मराठी प्रशिक्षण केंद्रों की व्यवस्था और ड्राइवरों की सहायता के लिए हेल्पलाइन जैसी पहल की जानकारी भी दी थी। परिवहन विभाग का मकसद नियम को लागू करने के साथ ड्राइवरों को अनुपालन के लिए जरूरी सहायता देना बताया गया है।
अब असली चुनौती यह होगी कि अगले 1 साल में भाषा प्रशिक्षण कितना सुलभ और व्यावहारिक बनाया जाता है। खासकर उन ड्राइवरों के लिए जो लंबे समय से रोज़गार के लिए मुंबई और महाराष्ट्र के दूसरे शहरों में काम कर रहे हैं।
भाषा और रोज़गार के बीच संतुलन अहम
मराठी महाराष्ट्र की प्रमुख आधिकारिक भाषा है और स्थानीय प्रशासन तथा सार्वजनिक जीवन में इसके इस्तेमाल का अपना महत्व है। साथ ही ऑटो, टैक्सी और कैब सेवा शहरों की रोज़मर्रा की परिवहन व्यवस्था का अहम हिस्सा है।
इसलिए नीति का असर केवल भाषा सीखने तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा संबंध ड्राइवरों की रोज़ी-रोटी और यात्रियों की सेवा से भी है। सरकार के लिए चुनौती यही है कि स्थानीय भाषा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने और ड्राइवरों की आजीविका की हिफाज़त के बीच संतुलन कायम रहे।
बॉम्बे हाई कोर्ट में मौजूदा याचिका का निपटारा सरकार के एक साल के आश्वासन के आधार पर हुआ है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि इस अवधि में सरकार प्रशिक्षण और अनुपालन की व्यवस्था किस तरह लागू करती है और एक साल बाद भाषा नियम को किस रूप में आगे बढ़ाया जाता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।