जिन्ना की बीमारी छिपाने वाले 2 मुंबई डॉक्टरों को पाक सम्मान
जिन्ना का मेडिकल राज, मुंबई के दो डॉक्टरों को पाकिस्तान देगा बड़ा सम्मान
पाकिस्तान ने जिन्ना के दो भारतीय डॉक्टरों को क्यों चुना?
पाकिस्तान ने मुंबई के पारसी डॉक्टर जल रतनजी पटेल और जल धायबो-कू को मरणोपरांत निशान-ए-इम्तियाज़ देने के लिए नामित किया है। पाकिस्तानी मंत्री के मुताबिक दोनों ने 1946 में जिन्ना की गंभीर टीबी संबंधी स्थिति की जानकारी गोपनीय रखी थी। हालांकि, इतिहासकारों के स्रोतों में बीमारी और उसके राजनीतिक असर को लेकर मतभेद मौजूद हैं।
मुंबई/इस्लामाबाद | 18 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
भारत के विभाजन और पाकिस्तान के गठन के इतिहास से जुड़ा एक पुराना मेडिकल प्रसंग 2026 में फिर सुर्खियों में है। पाकिस्तान ने मुंबई के दो पारसी डॉक्टरों, डॉ. जल रतनजी पटेल और डॉ. जल धायबो-कू, को मरणोपरांत निशान-ए-इम्तियाज़ देने के लिए नामित किया है। पाकिस्तानी योजना मंत्री और अवॉर्ड्स कमेटी के प्रमुख अहसान इकबाल के मुताबिक इन डॉक्टरों ने मोहम्मद अली जिन्ना की गंभीर बीमारी की जानकारी पेशेवर गोपनीयता के तहत अपने तक सीमित रखी थी।
पाकिस्तानी पक्ष का कहना है कि 1946 में दोनों डॉक्टरों ने जिन्ना की एक्स-रे जांच की थी और उनकी टीबी गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी थी। अहसान इकबाल के मुताबिक डॉक्टरों ने अनुमान लगाया था कि जिन्ना के पास एक या दो साल का समय रह गया है। इसी गोपनीयता को पाकिस्तान के गठन की परिस्थितियों से जोड़ते हुए दोनों डॉक्टरों को सम्मान देने का फैसला किया गया है। लेकिन इस कहानी का सबसे अहम पहलू यह है कि इसका पूरा ऐतिहासिक नैरेटिव निर्विवाद नहीं है। पुराने चिकित्सा और ऐतिहासिक स्रोत जिन्ना की बीमारी, उसकी गंभीरता और डॉक्टरों की भूमिका को लेकर अलग-अलग विवरण देते हैं। इसलिए इसे सीधे तौर पर इस निष्कर्ष में बदलना कि डॉक्टरों ने अकेले पाकिस्तान के निर्माण का रास्ता तैयार किया, ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है।
अहसान इकबाल के अनुसार डॉ. जल रतनजी पटेल और रेडियोलॉजिस्ट डॉ. जल धायबो-कू ने जिन्ना की मेडिकल स्थिति को सार्वजनिक नहीं किया। पाकिस्तान सरकार की ओर से इसे उस दौर में पेशेवर गोपनीयता और चिकित्सकीय जिम्मेदारी का उदाहरण बताया गया है। दोनों डॉक्टरों को निशान-ए-इम्तियाज़ मरणोपरांत दिया जाएगा और रिपोर्ट के मुताबिक औपचारिक सम्मान समारोह मार्च 2027 में प्रस्तावित है। यह फैसला इसलिए भी असाधारण है क्योंकि दोनों डॉक्टर ब्रिटिश भारत के बॉम्बे, मौजूदा मुंबई, से जुड़े थे। जिन्ना का राजनीतिक जीवन और मुस्लिम लीग की गतिविधियां भी बॉम्बे से गहराई से जुड़ी थीं। इस तरह यह सम्मान भारत के विभाजन से पहले के उस साझा इतिहास की एक कम चर्चित कड़ी को सामने लाता है।
जिन्ना की खराब सेहत कोई पूरी तरह अज्ञात तथ्य नहीं थी। अकबर एस. अहमद की पुस्तक में उनके स्वास्थ्य संबंधी लंबे समय के संकट का उल्लेख मिलता है। पुस्तक के अनुसार 1930 के दशक के बाद जिन्ना की तबीयत को लेकर चिंता बढ़ती गई और उनके चिकित्सकों ने उन्हें आराम की सलाह दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के मंत्री अहसान इकबाल ने दावा किया कि 1946 की एक्स-रे जांच में टीबी गंभीर अवस्था में दिखाई दी थी। उनके मुताबिक डॉक्टरों ने जिन्ना की जीवन-प्रत्याशा एक या दो साल बताई थी। जिन्ना की मृत्यु 11 सितंबर 1948 को हुई। पाकिस्तान बनने के लगभग 13 महीने बाद उनकी मौत हुई और ऐतिहासिक स्रोतों में उनकी बीमारी को फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारी के रूप में दर्ज किया गया है।
यही इस पूरे मामले का सबसे विवादित हिस्सा है। पाकिस्तान के मंत्री का तर्क है कि अगर ब्रिटिश नेतृत्व, खासकर लॉर्ड माउंटबेटन, को जिन्ना की वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति पहले पता होती, तो विभाजन की प्रक्रिया का समय अलग हो सकता था। रिपोर्ट के मुताबिक इकबाल ने इसी संभावना को दोनों डॉक्टरों की भूमिका के महत्व से जोड़ा।
लेकिन संभावना और स्थापित ऐतिहासिक तथ्य में अंतर है। यह निश्चित रूप से कहना संभव नहीं है कि जिन्ना की बीमारी सार्वजनिक होने पर भारत का विभाजन रुक जाता या पाकिस्तान नहीं बनता। भारत का विभाजन कई राजनीतिक, सामुदायिक, संवैधानिक और औपनिवेशिक कारकों का परिणाम था। मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच राजनीतिक मतभेद, ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण की नीति और उस दौर की सांप्रदायिक राजनीति ने घटनाक्रम को प्रभावित किया। इसलिए जिन्ना की सेहत को पूरी प्रक्रिया का एकमात्र निर्णायक कारण मानना इतिहास को जरूरत से ज्यादा सरल बना देगा।
जिन्ना की बीमारी और माउंटबेटन से जुड़ा प्रसंग लंबे समय से ऐतिहासिक लेखन का हिस्सा रहा है। कुछ लोकप्रिय ऐतिहासिक विवरणों में यह दावा मिलता है कि अगर माउंटबेटन को जिन्ना की बीमारी की गंभीरता पता होती, तो वह सत्ता हस्तांतरण और विभाजन की रणनीति पर अलग तरह से विचार कर सकते थे।
लेकिन इस दावे की पुष्टि एक निर्विवाद प्राथमिक दस्तावेज से होना जरूरी है। उपलब्ध स्रोतों में इसे एक ऐतिहासिक संभावना और बाद के लेखकों के आकलन के रूप में देखना अधिक सुरक्षित है। यही वजह है कि इस कहानी की रिपोर्टिंग में ‘विभाजन रोक सकते थे’ जैसी निश्चित भाषा से बचना चाहिए। सही संपादकीय भाषा यह होगी कि जिन्ना की बीमारी की जानकारी राजनीतिक घटनाक्रम को प्रभावित कर सकती थी, लेकिन इसका प्रत्यक्ष परिणाम साबित नहीं किया जा सकता।
डॉ. जल रतनजी पटेल के बारे में उपलब्ध पुराने स्रोत कहानी को और पेचीदा बनाते हैं। हेक्टर बोलिथो की जिन्ना पर आधारित पुस्तक में पटेल के अपने विवरण का उल्लेख मिलता है। उसमें 1944 के एक इलाज का वर्णन है, जिसमें जिन्ना को कमजोरी, खांसी और फेफड़ों से जुड़ी समस्या थी तथा एक्स-रे के आधार पर अनसुलझे निमोनिया का उल्लेख किया गया था। एक अन्य ऐतिहासिक स्रोत भी इस बात की ओर संकेत करता है कि पटेल के पुराने बयान और बाद में लोकप्रिय हुई टीबी वाली कहानी के बीच अंतर था। इसका अर्थ यह नहीं कि जिन्ना टीबी से पीड़ित नहीं थे, बल्कि यह बताता है कि बीमारी की पहचान, उसकी तारीख और उसकी गंभीरता को लेकर ऐतिहासिक रिकॉर्ड पूरी तरह एकरूप नहीं हैं। इसलिए 1946 की एक्स-रे जांच और डॉक्टरों के अनुमान को वर्तमान पाकिस्तानी बयान के आधार पर रिपोर्ट किया जाना चाहिए, अंतिम ऐतिहासिक सत्य के तौर पर नहीं।
जल रतनजी पटेल बॉम्बे के प्रतिष्ठित चिकित्सक थे। उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री के अनुसार उन्होंने जिन्ना का इलाज किया था और बाद में भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें भारत सरकार ने 1962 में पद्म भूषण से सम्मानित किया था। पटेल की पहचान पारसी समुदाय से जुड़ी थी। पाकिस्तान के मौजूदा सम्मान प्रस्ताव में भी दोनों डॉक्टरों की बॉम्बे की पारसी पृष्ठभूमि का उल्लेख किया गया है। यह तथ्य इस कहानी को भारत-पाकिस्तान के राजनीतिक विवाद से अलग एक मानवीय और पेशेवर आयाम देता है। डॉक्टर का पेशेवर दायित्व मरीज की निजी स्वास्थ्य जानकारी की हिफाजत करना होता है, खासकर उस दौर में जब आधुनिक मेडिकल प्राइवेसी के मौजूदा कानूनी ढांचे विकसित नहीं हुए थे।
डॉ. जल धायबो-कू को जिन्ना की एक्स-रे जांच से जुड़ा रेडियोलॉजिस्ट बताया गया है। पाकिस्तान की मौजूदा घोषणा में उन्हें भी डॉ. पटेल के साथ सम्मान के लिए नामित किया गया है। पुरानी पाकिस्तानी सामग्री में भी धायबो-कू का नाम जिन्ना की मेडिकल जांच से जोड़ा गया है। एक विवरण के अनुसार उनके परिवार के पास जिन्ना की एक्स-रे और उससे जुड़े घटनाक्रम की जानकारी थी। हालांकि, इन पुराने विवरणों की हर बात स्वतंत्र प्राथमिक दस्तावेजों से प्रमाणित नहीं है। इसलिए उनके योगदान का उल्लेख उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर करना उचित है।
पाकिस्तान का यह फैसला केवल एक ऐतिहासिक सम्मान के रूप में नहीं देखा जाएगा। भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में विभाजन का इतिहास अब भी गहरी सियासी और भावनात्मक अहमियत रखता है। ऐसे में दो भारतीय डॉक्टरों को पाकिस्तान का बड़ा नागरिक सम्मान देना एक असामान्य प्रतीकात्मक फैसला है। यह उस दौर की साझा चिकित्सा, सामाजिक और पेशेवर विरासत की ओर भी ध्यान खींचता है, जब बॉम्बे और कराची एक ही औपनिवेशिक राजनीतिक ढांचे का हिस्सा थे। साथ ही, इस सम्मान का मौजूदा भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर तत्काल कोई बड़ा कूटनीतिक असर होने का दावा करना उचित नहीं होगा। अभी उपलब्ध सूचना मुख्य रूप से ऐतिहासिक सम्मान और पाकिस्तान के आधिकारिक बयान तक सीमित है।
पाकिस्तानी मंत्री ने अपने बयान में दोनों डॉक्टरों की पेशेवर गोपनीयता को पाकिस्तान के निर्माण की परिस्थितियों में महत्वपूर्ण योगदान बताया है।
लेकिन इतिहास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह कहना अधिक उचित होगा कि डॉक्टरों की भूमिका एक संभावित अप्रत्यक्ष कारक के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पाकिस्तान का निर्माण केवल जिन्ना के स्वास्थ्य पर निर्भर नहीं था। 1940 के दशक की सियासत में मुस्लिम लीग की मांग, कांग्रेस और लीग के बीच मतभेद, ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण की समयसीमा और सांप्रदायिक तनाव जैसे कई तत्व सक्रिय थे। जिन्ना की बीमारी इनमें से एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत कारक रही हो सकती है, लेकिन उपलब्ध साक्ष्य इसे निर्णायक अकेला कारण साबित नहीं करते।
विभाजन के समय तक जिन्ना की सेहत काफी कमजोर हो चुकी थी। पाकिस्तान बनने के बाद भी उन्होंने राज्य के शुरुआती संस्थागत ढांचे को स्थापित करने में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके एक साल से थोड़ा अधिक समय बाद 11 सितंबर 1948 को उनका निधन हो गया। इस समय-रेखा से यह स्पष्ट होता है कि बीमारी गंभीर थी और राजनीतिक घटनाक्रम के साथ जिन्ना की व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि पाकिस्तान का गठन उनकी मृत्यु से पहले हो चुका था।
मुंबई के इन दोनों डॉक्टरों की कहानी भारत-पाकिस्तान इतिहास के एक ऐसे पहलू को सामने लाती है जिसमें मेडिकल प्राइवेसी, राजनीतिक नेतृत्व और इतिहास के निर्णायक मोड़ आपस में जुड़े दिखाई देते हैं। लेकिन पत्रकारिता की जिम्मेदारी यह है कि उपलब्ध दावों और प्रमाणित तथ्यों के बीच फर्क कायम रखा जाए।
स्थापित तथ्य यह है कि पाकिस्तान ने डॉ. जल रतनजी पटेल और डॉ. जल धायबो-कू को मरणोपरांत निशान-ए-इम्तियाज़ देने के लिए नामित किया है। पाकिस्तानी मंत्री ने जिन्ना की बीमारी को गोपनीय रखने को इस सम्मान का आधार बताया है। वहीं, यह दावा कि इस गोपनीयता ने सीधे तौर पर पाकिस्तान के निर्माण को संभव बनाया, एक ऐतिहासिक व्याख्या है। इसके पीछे मौजूद मेडिकल और राजनीतिक नैरेटिव में स्रोतों के बीच अंतर भी मिलता है।
जिन्ना की बीमारी से जुड़ा यह मामला 1947 के इतिहास को एक अलग नज़रिए से देखने का मौका देता है। मुंबई के दो डॉक्टरों ने अगर अपने मरीज की मेडिकल जानकारी को गोपनीय रखा था, तो यह उनके पेशेवर दायित्व और उस समय के चिकित्सा नैतिकता के संदर्भ में महत्वपूर्ण घटना थी।
लेकिन इतिहास को एक ही व्यक्ति की बीमारी या दो डॉक्टरों की चुप्पी से समझना पर्याप्त नहीं है। विभाजन कई दशकों के राजनीतिक संघर्ष और 1940 के दशक की जटिल सियासत का नतीजा था। पाकिस्तान का यह सम्मान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने एक साझा भारतीय अतीत से जुड़े दो डॉक्टरों की भूमिका को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है। साथ ही, इस फैसले ने एक पुराना सवाल फिर सामने ला दिया है, अगर जिन्ना की वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति ब्रिटिश नेतृत्व और भारतीय राजनीतिक नेतृत्व को पहले पता होती, तो क्या 1947 का घटनाक्रम अलग होता? उपलब्ध इतिहास इसका निश्चित जवाब नहीं देता।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।