फजलुर रहमान ने पाक सेना को 1971 की याद क्यों दिलाई?
पाकिस्तान में सेना बनाम सियासत की नई बहस, फजलुर रहमान का हमला
मुनीर पर फजलुर रहमान का निशाना, 1971 के इतिहास का हवाला
मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी सेना की सियासी भूमिका पर सवाल उठाते हुए 1971 के इतिहास का हवाला दिया। उनका बयान खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और पीओके में जारी तनाव के बीच आया। इससे पाकिस्तान में सेना, लोकतंत्र और संवैधानिक शासन को लेकर बहस फिर तेज हुई है। आगे विपक्षी एकजुटता इसका बड़ा पहलू बनेगी।
पेशावर, पाकिस्तान | 24 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
पाकिस्तान में सेना और सियासत के रिश्ते को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फज़ल के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व पर निशाना साधते हुए 1971 के युद्ध और पाकिस्तान के विभाजन का संदर्भ दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने सेना को याद दिलाया कि इतिहास में सैन्य नेतृत्व के फैसलों के गंभीर नतीजे सामने आ चुके हैं।
यह बयान ऐसे वक्त आया है जब खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में सुरक्षा हालात को लेकर लगातार चिंता जताई जा रही है। साथ ही पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भी विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक असंतोष की खबरों ने इस पूरे मामले को अधिक संवेदनशील बना दिया है। हालांकि इन सभी क्षेत्रों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं और उन्हें एक ही राजनीतिक कारण से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
फजलुर रहमान लंबे समय से पाकिस्तान में सैन्य प्रतिष्ठान की राजनीतिक भूमिका की आलोचना करते रहे हैं। जुलाई में उन्होंने सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को चुनौती देते हुए कहा था कि अगर सैन्य नेतृत्व राजनीति में भूमिका चाहता है तो उसे वर्दी उतारकर चुनावी राजनीति में आना चाहिए। उन्होंने नागरिकों से मिलिशिया बनाने की अपील का भी विरोध किया था। उनका मूल तर्क यह रहा है कि देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य के संवैधानिक संस्थानों की है। आम नागरिकों को हथियारबंद समूहों के रूप में संगठित करना सुरक्षा संकट को हल करने के बजाय स्थानीय हिंसा और लंबे समय तक चलने वाली दुश्मनी को बढ़ा सकता है। अगस्त की शुरुआत में क्वेटा में फजलुर रहमान ने खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में राज्य की रिट कमजोर होने का दावा किया था। उन्होंने कहा था कि केवल ताकत के इस्तेमाल से पाकिस्तान की राजनीतिक और सुरक्षा समस्याओं का समाधान नहीं होगा और राजनीतिक संवाद की जरूरत है।
फजलुर रहमान के मौजूदा बयान में 1971 का संदर्भ पाकिस्तान के लिए बेहद संवेदनशील ऐतिहासिक अध्याय को सामने लाता है। 1971 के युद्ध के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना था। पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में यह घटना सत्ता के केंद्रीकरण, क्षेत्रीय असंतोष, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सैन्य हस्तक्षेप से जुड़ी व्यापक बहस का हिस्सा रही है। फजलुर रहमान पहले भी 1971 को राजनीतिक चेतावनी के रूप में इस्तेमाल कर चुके हैं। अप्रैल 2026 में उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश का अलग होना तत्कालीन शासकों के रवैये और उनके फैसलों से जुड़ा था और मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान को इतिहास से सबक लेना चाहिए। इसलिए मौजूदा बयान को केवल सेना पर एक राजनीतिक हमला मानना अधूरा होगा। इसके पीछे पाकिस्तान के संघीय ढांचे, प्रांतीय अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर चल रही पुरानी बहस भी मौजूद है।
खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान के सबसे चुनौतीपूर्ण सुरक्षा क्षेत्रों में बना हुआ है। अफगानिस्तान से लगती सीमा, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की गतिविधियां और स्थानीय राजनीतिक असंतोष ने वहां सुरक्षा नीति को जटिल बनाया है। हालिया सैन्य अभियानों में पाकिस्तान की सेना ने उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम में कई ऑपरेशन किए हैं। पाकिस्तानी सेना ने हाल में खैबर पख्तूनख्वा में 12 और बलूचिस्तान में 37 आतंकवादियों को मारने का दावा किया। ये आंकड़े सैन्य बयान पर आधारित हैं और ऐसे अभियानों में स्वतंत्र सत्यापन की सीमाएं बनी रहती हैं। बलूचिस्तान का संकट अलग प्रकृति का है। वहां लंबे समय से जातीय बलूच संगठनों की ओर से अधिक स्वायत्तता या स्वतंत्रता की मांग को लेकर विद्रोह चलता रहा है। क्षेत्र में आतंकवादी हमले, अलगाववादी हिंसा और राज्य की सुरक्षा नीति एक-दूसरे से जुड़कर जटिल सुरक्षा परिदृश्य तैयार करते हैं। फजलुर रहमान इन दोनों क्षेत्रों की स्थिति को राज्य की नीति की विफलता से जोड़ते हैं। लेकिन उनके राजनीतिक आकलन और जमीन पर मौजूद प्रत्येक सुरक्षा दावे को अलग-अलग तथ्यात्मक जांच की जरूरत है।
पाकिस्तान की राजनीति में सेना का प्रभाव लंबे समय से बहस का विषय रहा है। फजलुर रहमान का मौजूदा रुख इसी व्यापक विवाद का हिस्सा है। उनका कहना है कि सेना को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी तक सीमित रहना चाहिए और राजनीतिक फैसले निर्वाचित संस्थाओं के जरिए होने चाहिए।
24 अगस्त को डॉन ने रिपोर्ट किया कि फजलुर रहमान ने संसद में विपक्ष की कमजोरी को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हालिया सशस्त्र बलों की कमान से जुड़े कानून को जल्दबाजी में पारित किया गया और विपक्ष उसे प्रभावी ढंग से चुनौती देने में असफल रहा। द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के मुताबिक, पेशावर में उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी मजबूत रक्षा क्षमता का समर्थन करती है, लेकिन सेना को राजनीति में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। उन्होंने हालिया कानूनों को लेकर भी विपक्षी दलों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई। यहां एक अहम फर्क समझना जरूरी है। सेना की संस्थागत भूमिका और सैन्य नेतृत्व की राजनीतिक भूमिका को एक ही चीज मानना सही नहीं होगा। पाकिस्तान में चल रही बहस मुख्यतः इस बात पर केंद्रित है कि सुरक्षा संस्थानों की संवैधानिक सीमा कहां खत्म होती है और राजनीतिक निर्णय लेने की शक्ति कहां से शुरू होती है।
फजलुर रहमान के हालिया रुख को विपक्षी एकजुटता के संदर्भ में भी देखना होगा। 20 और 21 अगस्त को उनकी विपक्षी नेताओं के साथ बैठकों के बाद संयुक्त विपक्ष बनाने पर सैद्धांतिक सहमति की खबर सामने आई। इसमें महमूद खान अचकजई और सीनेट विपक्ष के नेता अल्लामा राजा नासिर अब्बास समेत कई विपक्षी नेता शामिल थे। विपक्ष का एजेंडा केवल सेना की भूमिका तक सीमित नहीं है। संविधान, संसद की भूमिका, सरकारी कानूनों की प्रक्रिया और भविष्य की राजनीतिक रणनीति भी इसमें शामिल हैं। इसलिए फजलुर रहमान के बयान को संभावित व्यापक विपक्षी रणनीति का हिस्सा मानना संभव है, लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि विपक्ष एक स्थायी और प्रभावी राजनीतिक मोर्चे में बदल चुका है। इसके लिए संगठनात्मक तालमेल, साझा कार्यक्रम और संसद के भीतर निरंतर समन्वय की जरूरत होगी।
फजलुर रहमान के बयान का सबसे विवादास्पद हिस्सा 1971 का संदर्भ है। इतिहास से राजनीतिक सबक लेना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा है, लेकिन मौजूदा पाकिस्तान और 1971 के पूर्वी पाकिस्तान की परिस्थितियों को सीधे समान मानना उचित नहीं होगा। 1971 के पीछे राजनीतिक प्रतिनिधित्व, चुनावी जनादेश, भाषा और क्षेत्रीय पहचान, आर्थिक असमानता, सैन्य कार्रवाई और भारत-पाकिस्तान युद्ध समेत कई कारक थे। आज खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और पीओके में मौजूद समस्याओं की अपनी अलग पृष्ठभूमि और स्थानीय राजनीतिक संदर्भ हैं। इसलिए 1971 का हवाला एक राजनीतिक चेतावनी के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन इसे भविष्य के किसी निश्चित परिणाम की भविष्यवाणी के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
पाकिस्तान के सामने फिलहाल एक साथ कई मोर्चे हैं। सुरक्षा संकट, राजनीतिक ध्रुवीकरण, केंद्र और प्रांतों के बीच तनाव, विपक्ष और सरकार के बीच अविश्वास तथा सैन्य प्रतिष्ठान की राजनीतिक भूमिका पर बहस एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। फजलुर रहमान का तर्क है कि इन समस्याओं का समाधान बल प्रयोग से नहीं बल्कि राजनीतिक संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया से होना चाहिए। अगस्त की शुरुआत में उन्होंने राष्ट्रीय संवाद और बहुदलीय बैठक की मांग भी की थी। सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान की दृष्टि अलग हो सकती है। आतंकवाद और विद्रोही हिंसा के सामने राज्य सुरक्षा कार्रवाई को अपनी जिम्मेदारी मानता है। ऐसे में चुनौती यह है कि सुरक्षा ऑपरेशन और राजनीतिक समाधान को एक-दूसरे का विकल्प न बनाया जाए।
आने वाले दिनों में तीन घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहेंगे। पहला, संयुक्त विपक्ष वास्तव में संसद के भीतर कितनी प्रभावी रणनीति बनाता है। दूसरा, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में सुरक्षा स्थिति किस दिशा में जाती है। तीसरा, सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान फजलुर रहमान तथा अन्य विपक्षी दलों के बढ़ते दबाव का किस तरह जवाब देते हैं। फजलुर रहमान की राजनीतिक स्थिति भी महत्वपूर्ण है। वे एक प्रभावशाली धार्मिक-राजनीतिक नेता हैं और उनकी पार्टी के पास खासकर खैबर पख्तूनख्वा में संगठित राजनीतिक आधार है। लेकिन उनके आलोचनात्मक बयानों को व्यापक जनमत का निश्चित प्रतिनिधित्व मानना भी सही नहीं होगा।
फजलुर रहमान का 1971 का संदर्भ पाकिस्तान में सेना और सियासत के रिश्ते पर चल रही बहस को फिर केंद्र में ले आया है। उनका आरोप है कि सैन्य हस्तक्षेप और कमजोर राजनीतिक संस्थाएं देश की समस्याओं को बढ़ा रही हैं। इन दावों के राजनीतिक हिस्से को तथ्यात्मक सुरक्षा आंकड़ों से अलग करके देखना जरूरी है। एक बात स्पष्ट है कि पाकिस्तान में संवैधानिक शासन, प्रांतीय असंतोष और सुरक्षा नीति पर बहस अब अलग-अलग मुद्दे नहीं रह गई है। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान की स्थिति, विपक्षी एकजुटता और सैन्य नेतृत्व की राजनीतिक भूमिका आने वाले समय में इस बहस की दिशा तय करेंगे। फजलुर रहमान के लिए 1971 इतिहास की चेतावनी है। पाकिस्तान के लिए असली सवाल यह है कि क्या उस इतिहास को राजनीतिक संवाद, संवैधानिक संस्थाओं और प्रभावी सुरक्षा नीति के जरिए एक सबक में बदला जाएगा, या फिर वही पुराने संस्थागत टकराव नई शक्ल में जारी रहेंगे।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।