अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स के आयात पर 100% तक टैरिफ लगाने की घोषणा की है। फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी सप्लाई पर निर्भरता घटाने से जुड़ा है। संवेदनशील ड्रोन पर सबसे ऊंचा शुल्क लागू होगा, जबकि छोटे ड्रोन और कुछ सहयोगी देशों से आने वाले उत्पादों पर अलग दरें रहेंगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आयातित ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स पर 100% तक टैरिफ लगाने की घोषणा की है। अमेरिकी प्रशासन ने इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा, सप्लाई चेन की सुरक्षा और विदेशी ड्रोन तकनीक पर अमेरिकी निर्भरता कम करने की स्ट्रैटेजी से जोड़ा है। यह फैसला 13 अगस्त 2026 को हस्ताक्षरित राष्ट्रपति घोषणा के जरिए सामने आया।
फैसले के तहत सभी ड्रोन पर एक समान 100% शुल्क नहीं लगेगा। सबसे ऊंचा टैरिफ उन ड्रोन और संबंधित कंपोनेंट्स पर लागू होगा जिन्हें अमेरिकी प्रशासन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से संवेदनशील मानता है। छोटे और कम संवेदनशील ड्रोन के लिए अलग टैरिफ दर तय की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से संवेदनशील श्रेणी में आने वाले कुछ ड्रोन पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा। छोटे ड्रोन पर 25% शुल्क रखा गया है। ड्रोन के कुछ कंपोनेंट्स पर भी नए शुल्क लागू होंगे।
रिपोर्टों के मुताबिक, अधिक वजन वाले और थर्मल इमेजिंग जैसी क्षमताओं वाले ड्रोन इस संवेदनशील श्रेणी में आ सकते हैं। ऐसे ड्रोन के साथ उनके महत्वपूर्ण पार्ट्स और डॉकिन्ग स्टेशन भी नए शुल्क के दायरे में हैं।
यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि फैसला साधारण कंज्यूमर ड्रोन और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से अधिक सक्षम यूएएस सिस्टम को एक ही श्रेणी में नहीं रखता।
ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि अमेरिका ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स की विदेशी सप्लाई पर जरूरत से ज्यादा निर्भर है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग की जांच में विदेशी निर्मित अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम की अमेरिकी मार्केट में महत्वपूर्ण मौजूदगी और सप्लाई चेन से जुड़े सुरक्षा जोखिमों को रेखांकित किया गया था।
अमेरिका में ड्रोन को अब केवल एक कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इनका इस्तेमाल डिफेंस, निगरानी, कृषि, इंफ्रास्ट्रक्चर निरीक्षण और दूसरे संवेदनशील क्षेत्रों में होता है।
अमेरिकी ब्यूरो ऑफ इंडस्ट्री एंड सिक्योरिटी ने जुलाई 2025 में यूएएस और उनके पार्ट्स तथा कंपोनेंट्स के आयात से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा पहलू की जांच शुरू की थी।
अमेरिकी ड्रोन पॉलिसी का एक बड़ा संदर्भ चीन के साथ बढ़ती टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन प्रतिस्पर्धा है। अन्य अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक, वॉशिंगटन विदेशी ड्रोन टेक्नोलॉजी, खासकर चीनी सप्लाई चेन पर निर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा के नज़रिये से देख रहा है।
अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन ने भी विदेशी निर्मित यूएएस और महत्वपूर्ण यूएएस कंपोनेंट्स को राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम के संदर्भ में अपनी कवर्ड लिस्ट में शामिल किया है। एफसीसी के मुताबिक, नई डिवाइस मॉडल्स पर इसका असर पड़ता है, जबकि पहले से खरीदे गए ड्रोन के इस्तेमाल पर उस फैसले का सीधा असर नहीं है।
इससे साफ है कि टैरिफ फैसला अकेली कार्रवाई नहीं है। यह अमेरिकी प्रशासन की व्यापक ड्रोन सिक्योरिटी पॉलिसी का हिस्सा है।
इस फैसले का एक अहम पहलू यह है कि अमेरिका के कुछ सहयोगी देशों से आने वाले ड्रोन और कंपोनेंट्स भी शुल्क से पूरी तरह बाहर नहीं हैं।
रॉयटर्स के अनुसार, यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड, लिकटेंस्टीन और ताइवान से आने वाले कुछ ड्रोन और पार्ट्स पर 15% शुल्क लागू होगा। ब्रिटेन के लिए 10% दर रखी गई है।
इससे अमेरिकी नीति का फोकस केवल चीन तक सीमित नहीं दिखता। वॉशिंगटन विदेशी सप्लाई पर व्यापक निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है, हालांकि सहयोगी देशों के लिए दरें कम रखी गई हैं।
ट्रंप प्रशासन इस नीति को अमेरिकी ड्रोन मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के उपाय के तौर पर भी पेश कर रहा है। प्रशासन का आकलन है कि घरेलू उत्पादन मौजूदा और संभावित राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरतों को पूरी तरह पूरा करने की स्थिति में नहीं है।
टैरिफ से आयातित ड्रोन महंगे होंगे। इससे अमेरिकी कंपनियों को घरेलू उत्पादन बढ़ाने और वैकल्पिक सप्लायर विकसित करने के लिए प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
लेकिन यहां एक अहम सवाल भी है। अगर अमेरिकी उत्पादन क्षमता तत्काल विदेशी सप्लाई की जगह नहीं ले पाती, तो टैरिफ का शुरुआती असर कीमतों और उपलब्धता पर पड़ सकता है।
25% टैरिफ वाली श्रेणी में आने वाले छोटे ड्रोन अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं। 100% शुल्क वाली संवेदनशील श्रेणी में आने वाले उत्पादों पर लागत का असर और ज्यादा होगा।
ड्रोन पर निर्भर कृषि कंपनियों, सर्वे एजेंसियों, फिल्म और मीडिया प्रोडक्शन, इंफ्रास्ट्रक्चर निरीक्षण तथा दूसरे व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के लिए सप्लाई और कीमत दोनों महत्वपूर्ण मुद्दे बन सकते हैं।
हालांकि अंतिम असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां अतिरिक्त लागत का कितना हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचाती हैं और कितनी जल्दी अमेरिकी या सहयोगी देशों के वैकल्पिक सप्लायर तैयार होते हैं।
रॉयटर्स के मुताबिक, संवेदनशील ड्रोन पर नए शुल्क 21 दिनों में प्रभावी होने हैं। कुछ कम संवेदनशील कंपोनेंट्स और निर्धारित श्रेणियों के उत्पादों के लिए 180 दिनों की अवधि रखी गई है।
इससे कंपनियों को सप्लाई चेन बदलने, नए स्रोत तलाशने और अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने के लिए सीमित समय मिलेगा।
यह फैसला अमेरिका-चीन टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा के व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। पिछले कुछ समय में दोनों देशों ने ड्रोन और दूसरी रणनीतिक तकनीकों से जुड़ी सप्लाई चेन पर नियंत्रण बढ़ाया है।
चीन ने भी अमेरिका की पाबंदियों के जवाब में ड्रोन और संबंधित तकनीकों के एक्सपोर्ट पर नियंत्रण कड़ा किया है। बीजिंग की नई व्यवस्था के तहत अमेरिका को कुछ ड्रोन और तकनीकों के निर्यात की समीक्षा केस-बाय-केस आधार पर की जा रही है।
इस लिहाज़ से ड्रोन अब केवल ट्रेड का मामला नहीं रह गया है। यह टेक्नोलॉजी, डिफेंस और जियोपॉलिटिक्स के बीच बढ़ते टकराव का हिस्सा बन चुका है।
ट्रंप प्रशासन का तर्क सप्लाई चेन सिक्योरिटी पर आधारित है। लेकिन टैरिफ अपने आप घरेलू उत्पादन क्षमता पैदा नहीं करता।
अगर अमेरिकी कंपनियों के पास पर्याप्त उत्पादन क्षमता, कंपोनेंट सप्लायर और तकनीकी इकोसिस्टम तैयार नहीं है, तो आयात शुल्क का शुरुआती परिणाम महंगे उत्पाद और सीमित विकल्प हो सकता है।
दूसरी तरफ, लंबे समय में ऊंचे आयात शुल्क घरेलू कंपनियों को निवेश के लिए अधिक मजबूत प्रोत्साहन दे सकते हैं। यही इस नीति का मूल आर्थिक तर्क है।
अमेरिका पहले से ड्रोन इंडस्ट्री को राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिये से ज्यादा सख्ती से रेगुलेट कर रहा है। एफसीसी ने विदेशी यूएएस और महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स को राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम से जोड़ते हुए अपनी कवर्ड लिस्ट में शामिल किया है।
इसका मतलब है कि टैरिफ अकेला बैरियर नहीं है। इम्पोर्ट, एफसीसी अप्रूवल, कंपोनेंट सोर्सिंग और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग, सभी एक ही पॉलिसी फ्रेमवर्क में जुड़ते जा रहे हैं।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कंपनियां इस बदलाव का जवाब कैसे देती हैं। अमेरिकी निर्माता अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाते हैं या नहीं, विदेशी कंपनियां स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाती हैं या नहीं और सहयोगी देशों के साथ सप्लाई चेन कितनी तेजी से पुनर्गठित होती है, इन सभी पहलुओं पर नज़र रहेगी।
साथ ही, चीन और दूसरे प्रभावित देशों की प्रतिक्रिया भी अहम होगी। अगर दोनों पक्ष ड्रोन और संबंधित कंपोनेंट्स पर नियंत्रण और सख्त करते हैं, तो ग्लोबल ड्रोन सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ सकता है।
ट्रंप का ड्रोन टैरिफ फैसला अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और औद्योगिक पॉलिसी को एक साथ जोड़ता है। 100% शुल्क सभी ड्रोन पर लागू नहीं है, बल्कि संवेदनशील श्रेणियों पर केंद्रित है, जबकि छोटे ड्रोन और कुछ सहयोगी देशों के उत्पादों के लिए कम दरें तय की गई हैं।
अमेरिका का मकसद विदेशी निर्भरता घटाना और घरेलू ड्रोन उत्पादन बढ़ाना है। लेकिन इस रणनीति की असली कामयाबी इस बात से तय होगी कि अमेरिकी इंडस्ट्री कितनी तेजी से वैकल्पिक उत्पादन क्षमता तैयार करती है और क्या सुरक्षा लाभ बढ़ी हुई लागत से अधिक साबित होते हैं।
इस पूरे मामले का अगला अहम अध्याय अमेरिकी कंपनियों की प्रतिक्रिया, चीन की जवाबी पॉलिसी और वैश्विक ड्रोन सप्लाई चेन में होने वाले बदलाव होंगे।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।