चीन में कुछ ऑफिस कर्मचारियों के बीच ‘ऑफिस एजिंग’ से बचने के लिए डेस्क पर छतरी, सनस्क्रीन और फेस कवर इस्तेमाल करने का ट्रेंड सोशल मीडिया पर चर्चा में है।
चीन | 2 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
चीन के कुछ ऑफिसों में इन दिनों ऐसा नज़ारा देखने को मिल रहा है, जो पहली नज़र में समुद्र किनारे की तस्वीर जैसा लगता है। कर्मचारी कंप्यूटर के सामने बैठे हैं, लेकिन उनकी डेस्क पर छतरियां खुली हैं। कुछ लोग सनस्क्रीन लगा रहे हैं, जबकि कुछ चेहरे को ढकने वाले कवर और सन हैट इस्तेमाल कर रहे हैं।
सोशल मीडिया पर इस पूरे ट्रेंड को “ऑफिस एजिंग” कहा जा रहा है। इसके पीछे तर्क यह है कि लंबे वक्त तक ऑफिस में रहने से त्वचा बेजान दिखने लगी है, आंखों में थकान बढ़ रही है और काम के दौरान शरीर पर लगातार तनाव महसूस हो रहा है। चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडनोट पर इस मुद्दे को लेकर कर्मचारियों की पोस्ट तेजी से चर्चा में आई हैं।
इस चर्चा को उस समय ज्यादा तवज्जो मिली जब चीन के जियांग्सू प्रांत के एक सोशल मीडिया यूजर ने दावा किया कि नई नौकरी शुरू करने के करीब एक महीने बाद उसके चेहरे का रंग पहले से गहरा दिखने लगा और आंखों में लगातार थकान रहने लगी।
इस पोस्ट के बाद दूसरे कर्मचारियों ने भी अपने अनुभव साझा किए। एक यूजर ने कहा कि छुट्टी के बाद उसका चेहरा पहले से ज्यादा साफ और हल्का दिखने लगा। एक अन्य कर्मचारी ने ऑफिस में लगातार सेकंड-हैंड स्मोक यानी परोक्ष धूम्रपान को लेकर परेशानी जताई।
यहीं से “ऑफिस एजिंग” की चर्चा केवल त्वचा तक सीमित नहीं रही। इसके साथ ऑफिस की लाइटिंग, हवा की गुणवत्ता, वेंटिलेशन, लंबे काम के घंटे और मानसिक थकान जैसे सवाल भी जुड़ गए।
सोशल मीडिया पर सामने आए उदाहरणों के मुताबिक कुछ कर्मचारियों ने अपनी डेस्क के पास छतरियां लगानी शुरू कर दीं। कुछ लोग सन हैट या फेस कवर पहन रहे हैं। कई कर्मचारी चेहरे के साथ बाजुओं पर भी सनस्क्रीन लगाने की बात कर रहे हैं।
यह तस्वीर देखने में असामान्य जरूर है, लेकिन इसके पीछे चीन में लंबे समय से बढ़ती सन-प्रोटेक्शन कल्चर भी एक वजह है। चीन में फोटोएजिंग यानी यूवी एक्सपोज़र से होने वाली त्वचा की उम्र संबंधी क्षति को लेकर जागरूकता पिछले वर्षों में बढ़ी है। सरकारी शिन्हुआ रिपोर्ट के मुताबिक चीन का सनस्क्रीन कपड़ों और एक्सेसरीज का बाजार भी तेजी से बढ़ा है।
यहीं इस ट्रेंड का सबसे अहम सवाल सामने आता है।
सोशल मीडिया पर ऑफिस की तेज लाइटिंग को त्वचा के रंग में बदलाव और एजिंग से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन इसे स्थापित वैज्ञानिक तथ्य की तरह पेश करना सही नहीं होगा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कुछ फ्लोरोसेंट लैंप सामान्य रोशनी के दौरान थोड़ी मात्रा में यूवीए और यूवीबी विकिरण छोड़ते हैं। हालांकि सामान्य ऑफिस लाइटिंग से मिलने वाला एक्सपोज़र धूप के मुकाबले काफी अलग होता है। डब्ल्यूएचओ ने यह भी बताया है कि आधुनिक लाइटिंग उपकरणों
में सुरक्षा मानक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यूवी विकिरण का त्वचा पर असर जरूर वैज्ञानिक रूप से स्थापित है। यूवीए त्वचा की गहरी परतों तक पहुंच सकता है और समय के साथ त्वचा की इलास्टिसिटी कम करने तथा समय से पहले एजिंग में योगदान दे सकता है। यूवीबी सनबर्न और त्वचा की दूसरी क्षतियों से जुड़ा है।
लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना कि हर ऑफिस की एलईडी या फ्लोरोसेंट लाइट त्वचा को धूप की तरह नुकसान पहुंचा रही है, उपलब्ध सबूतों से ज्यादा बड़ा दावा होगा।
चीन के कर्मचारियों की शिकायतों में केवल त्वचा का जिक्र नहीं है। आंखों की थकान, ड्राई एयर, वेंटिलेशन और लंबे समय तक बंद ऑफिस में बैठने की परेशानी भी सामने आ रही है।
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट में ऑफिस के कूल-टोन लाइटिंग डिजाइन का जिक्र किया गया है। ऐसी रोशनी का इस्तेमाल कर्मचारियों को अलर्ट रखने और काम के दौरान सतर्कता बनाए रखने के उद्देश्य से किया जाता है। लेकिन लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठना, तेज रोशनी, कम
ब्रेक और खराब इनडोर एनवायरनमेंट मिलकर थकान की समस्या बढ़ा सकते हैं।
इसलिए “ऑफिस एजिंग” को केवल कॉस्मेटिक चिंता मानना भी अधूरा नजरिया होगा।
चीन के सोशल मीडिया पर ऑफिस से जुड़ी एक और दिलचस्प प्रवृत्ति सामने आई है। कुछ वीडियो में लोग काम पर पहुंचने के बाद और ऑफिस से निकलते वक्त अपने चेहरे और लुक की तुलना करते दिखाई देते हैं।
सुबह चेहरा फ्रेश नजर आता है। शाम तक त्वचा डल दिखने लगती है, आंखों में थकान दिखाई देती है और चेहरे पर सूजन जैसी शिकायतें नजर आती हैं।
यह बदलाव जरूरी नहीं कि स्थायी “एजिंग” का संकेत हो। लंबे समय तक काम, नींद की कमी, तनाव, कम पानी पीना, एयर-कंडीशनिंग, स्क्रीन टाइम और शारीरिक गतिविधि की कमी भी व्यक्ति के चेहरे और आंखों पर असर डाल सकती है।
इसलिए सोशल मीडिया पर दिखने वाले “पहले और बाद” के वीडियो को मेडिकल डायग्नोसिस मानना सही नहीं होगा।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक अत्यधिक यूवी एक्सपोज़र त्वचा की समय से पहले एजिंग और त्वचा कैंसर समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है। धूप में
रहने के दौरान छाया, सुरक्षात्मक कपड़े और जरूरत के अनुसार ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन उपयोगी सुरक्षा उपाय हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि हर कर्मचारी को सामान्य ऑफिस में पूरे दिन छतरी लगाकर बैठना जरूरी है।
अगर डेस्क खिड़की के बिल्कुल पास है और लंबे समय तक सीधे सूरज की रोशनी पड़ती है, तो खिड़की से आने वाले यूवी एक्सपोज़र पर ध्यान देना ज्यादा प्रासंगिक हो सकता है। दूसरी तरफ, केवल सफेद या नीली ऑफिस लाइट देखकर उसे सूरज की यूवी किरणों के बराबर मान लेना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
जून 2026 में चीन के जियांग्सू प्रांत की एक महिला से जुड़ा मामला सामने आया था। उसने तेज धूप से बचने के लिए सनस्क्रीन लगाने के बाद पूरे चेहरे को टोपी और फेस कवर से ढक लिया था। बाद में उसके चेहरे पर लालिमा और खुजली की समस्या हुई।
डॉक्टरों ने इसे अत्यधिक सन-प्रोटेक्शन के कारण हुई त्वचा की जलन से जोड़ा। यह मामला बताता है कि सुरक्षा उपाय भी जरूरत और परिस्थिति के हिसाब से होने चाहिए।
इस पूरे ट्रेंड को केवल चीन के कर्मचारियों की सनस्क्रीन आदत के तौर पर देखना आसान है। लेकिन इसके पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है।
अगर कर्मचारी दिनभर ऑफिस में बैठकर आंखों की थकान, त्वचा की परेशानी, खराब हवा, धूल, धूम्रपान और मानसिक तनाव की शिकायत कर रहे हैं, तो बहस केवल सनस्क्रीन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
ऑफिस डिजाइन, रोशनी की तीव्रता, वेंटिलेशन, एयर क्वालिटी, स्क्रीन टाइम और काम के घंटों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
“ऑफिस एजिंग” कोई स्थापित मेडिकल बीमारी नहीं है। फिलहाल यह सोशल मीडिया से निकला एक लोकप्रिय शब्द है। लेकिन इसके पीछे जिन वास्तविक परेशानियों का जिक्र कर्मचारी कर रहे हैं, उन्हें पूरी तरह मजाक में उड़ाना भी सही नहीं होगा।
इस ट्रेंड की सबसे अहम बात शायद छतरी नहीं है।
असली सवाल यह है कि कर्मचारी अपने वर्कप्लेस को लेकर किस स्तर की बेचैनी महसूस कर रहे हैं कि वे डेस्क पर खुद अपना छोटा-सा “प्रोटेक्शन जोन” बनाने लगे हैं।
एक तरफ चीन में सन-प्रोटेक्शन और स्किनकेयर को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। दूसरी तरफ ऑफिस कर्मचारियों के लंबे समय तक इनडोर रहने और काम से जुड़ी थकान पर चर्चा तेज हो रही है।
इसलिए “ऑफिस में छतरी” फिलहाल एक वायरल और असामान्य दृश्य जरूर है, लेकिन इसके पीछे की बहस इससे कहीं ज्यादा गंभीर है।
आने वाले वक्त में कंपनियों के लिए सवाल केवल यह नहीं रहेगा कि कर्मचारी कितने घंटे ऑफिस में मौजूद हैं। सवाल यह भी होगा कि जिस जगह वे दिन का बड़ा हिस्सा बिताते हैं, वह जगह उनकी आंखों, त्वचा, सांस और मानसिक स्थिति के लिए कितनी अनुकूल है।
और शायद यही “ऑफिस एजिंग” ट्रेंड का सबसे बड़ा संदेश है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।