Coca-Cola के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक UK Fanta में 4.5 ग्राम शुगर प्रति 100ml है, जबकि भारत में 13.7 ग्राम। ब्रिटेन की शुगर लेवी इसका अहम कारण है।
ब्रिटेन-भारत | 1 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
भारत और ब्रिटेन में बिकने वाली Fanta को लेकर एक दिलचस्प अंतर सामने आया है। Coca-Cola की आधिकारिक न्यूट्रिशन जानकारी के मुताबिक UK में Fanta Orange में प्रति 100ml करीब 4.5 ग्राम शुगर है, जबकि भारत में Fanta में कुल शुगर 13.7 ग्राम प्रति 100ml दर्ज है।
यानी समान मात्रा की तुलना करें तो भारत वाली Fanta में शुगर करीब तीन गुना है।
यह अंतर केवल स्वाद या स्थानीय पसंद का मामला नहीं है। इसके पीछे ब्रिटेन की ऐसी टैक्स नीति है, जिसने सॉफ्ट ड्रिंक कंपनियों को रेसिपी में शुगर घटाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिया।
ब्रिटेन में इसे आधिकारिक तौर पर Soft Drinks Industry Levy यानी SDIL कहा जाता है।
यह लेवी अप्रैल 2018 में लागू हुई थी। इसका मकसद कंपनियों पर ऐसा आर्थिक दबाव बनाना था जिससे वे अपने पेय पदार्थों में अतिरिक्त चीनी कम करें।
सरकार के मुताबिक, यह सीधे उपभोक्ता पर लगाया गया सामान्य बिक्री टैक्स नहीं है। इसका भुगतान पात्र पेय के निर्माता या आयातक करते हैं।
मौजूदा व्यवस्था में 5 ग्राम से कम शुगर प्रति 100ml वाले पात्र पेय पर SDIL नहीं लगता।
5 ग्राम से 7.9 ग्राम प्रति 100ml तक शुगर वाले पेय पर कम दर लागू होती है।
8 ग्राम या उससे ज्यादा शुगर प्रति 100ml वाले पेय पर ऊंची दर लागू होती है। 1 अप्रैल 2026 से ये दरें क्रमशः £2.08 और £2.78 प्रति 10 लीटर हैं।
यानी कंपनी के सामने सीधा आर्थिक हिसाब है। रेसिपी में शुगर कम करें, तो लेवी से बचने या उसे घटाने की गुंजाइश बढ़ती है।
Coca-Cola UK के अनुसार Fanta में प्रति 100ml 4.5 ग्राम शुगर है।
साथ ही इसमें Acesulfame K और Sucralose जैसे sweeteners का इस्तेमाल किया जाता है। यानी शुगर कम करने के बाद स्वाद बनाए रखने के लिए दूसरे स्वीटनिंग एजेंट इस्तेमाल किए गए हैं।
इस तरह UK Fanta मौजूदा SDIL की 5 ग्राम प्रति 100ml सीमा से नीचे रहती है।
Coca-Cola India के आधिकारिक उत्पाद विवरण में Fanta के लिए प्रति 100ml 13.7 ग्राम कुल शुगर दर्ज है।
इसमें 13.7 ग्राम added sugar भी दर्ज है। कंपनी की भारतीय उत्पाद सूची में इस पेय की सामग्री में चीनी, एप्पल जूस और दूसरे एडिटिव्स शामिल हैं।
इस आंकड़े की UK Fanta से सीधी तुलना करें तो अंतर काफी बड़ा दिखाई देता है।
नहीं।
टैक्स एक अहम आर्थिक प्रोत्साहन है, लेकिन किसी देश में उत्पाद की रेसिपी कई कारकों से तय होती है।
स्थानीय उपभोक्ता पसंद, नियामकीय व्यवस्था, बाजार रणनीति, लागत, उपलब्ध सामग्री और कंपनियों की उत्पाद नीति भी भूमिका निभाती है।
फूड सेफ्टी एजुकेटर उर्वशी अग्रवाल ने NDTV Profit से बातचीत में कहा कि UK की लेवी कंपनियों को कम शुगर वाली रेसिपी बनाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देती है।
ब्रिटेन सरकार के विश्लेषण के मुताबिक 2015 से 2020 के बीच SDIL के दायरे में आने वाले निर्माता ब्रांड और रिटेलर ब्रांड सॉफ्ट ड्रिंक की बिक्री-भारित औसत शुगर मात्रा 3.8 ग्राम से घटकर 2.1 ग्राम प्रति 100ml रह गई। यह करीब 46 प्रतिशत कमी है।
सरकार के अनुसार, लेवी के लागू होने के बाद कंपनियों ने कई उत्पादों की शुगर मात्रा 5 ग्राम प्रति 100ml की सीमा से ठीक नीचे लाई।
इसका अर्थ है कि नीति ने केवल टैक्स राजस्व जुटाने के बजाय उत्पादों की रेसिपी बदलने पर भी असर डाला।
ब्रिटेन सरकार के अनुसार, SDIL के दायरे में आने वाले करीब 89 प्रतिशत सॉफ्ट ड्रिंक अब 5 ग्राम प्रति 100ml से कम शुगर रखते हैं और इसलिए लेवी का भुगतान नहीं करते।
यह आंकड़ा नीति के एक महत्वपूर्ण असर को दिखाता है।
कंपनियों ने कई मामलों में टैक्स देने के बजाय उत्पाद को कम शुगर वाली श्रेणी में लाना पसंद किया।
भारत में फिलहाल ब्रिटेन जैसी Soft Drinks Industry Levy व्यवस्था नहीं है, जिसमें शुगर की मात्रा के आधार पर सॉफ्ट ड्रिंक निर्माताओं पर अलग से शुल्क लगाया जाए।
यही वह नीति अंतर है जिसे विशेषज्ञ भारत और ब्रिटेन में एक ही ब्रांड के अलग-अलग फॉर्मूलेशन की चर्चा में महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
भारत में पैकेज्ड फूड और पेय पदार्थों की न्यूट्रिशन लेबलिंग को लेकर बहस जारी है। हाल के वर्षों में हाई शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले उत्पादों पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी को लेकर भी चर्चा तेज हुई है।
यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा।
UK Fanta में शुगर कम है, लेकिन इसमें sweeteners का इस्तेमाल होता है। इसलिए केवल शुगर की मात्रा देखकर किसी पेय को पूरी तरह स्वस्थ विकल्प घोषित करना
उचित नहीं है।
WHO और अन्य स्वास्थ्य संस्थाएं लंबे समय से मुक्त यानी free sugars की मात्रा सीमित रखने की सलाह देती हैं। सॉफ्ट ड्रिंक में शुगर कम होना एक सकारात्मक बदलाव हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पेय स्वास्थ्यवर्धक बन गया।
यह बहस केवल Fanta तक सीमित नहीं है।
अगर सरकारें शुगर टैक्स या लेवी जैसी नीति अपनाती हैं, तो कंपनियों के सामने रेसिपी बदलने का आर्थिक प्रोत्साहन पैदा होता है।
ब्रिटेन का अनुभव दिखाता है कि टैक्स की दर और उसकी सीमा उत्पाद फॉर्मूलेशन को प्रभावित कर सकती है। 2015 से 2020 के बीच बिक्री-भारित औसत शुगर में 46 प्रतिशत गिरावट इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।
भारत में बहस इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां बड़े पैमाने पर पैकेज्ड फूड और पेय पदार्थों की खपत होती है।
भारत और ब्रिटेन की Fanta में शुगर का अंतर एक उत्पाद की कहानी जरूर है, लेकिन इसके पीछे सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का बड़ा सवाल छिपा है।
क्या सरकारों को कंपनियों को कम शुगर वाली रेसिपी अपनाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देना चाहिए?
ब्रिटेन ने लेवी के जरिए इसका एक मॉडल अपनाया। भारत ने अभी वैसी व्यवस्था लागू नहीं की है।
इसलिए एक ही ब्रांड के दो देशों में अलग फॉर्मूलेशन इस बात का उदाहरण है कि सरकारी नीति और बाजार के नियम खाद्य उत्पादों की संरचना को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।