अरब स्प्रिंग के बाद ट्यूनीशिया में रोजमर्रा की कई खाद्य वस्तुओं की कीमतें कई गुना बढ़ीं। 2010 से गाजर 428%, बीफ 290% और खाना पकाने का तेल 129% महंगा हुआ।
ट्यूनीशिया | 1 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
ट्यूनीशिया में अरब स्प्रिंग की शुरुआत को करीब 16 साल हो चुके हैं। राजनीतिक बदलाव के बाद देश ने लोकतांत्रिक संक्रमण, आर्थिक संकट, कोविड महामारी और कर्ज से जुड़ी मुश्किलों का सामना किया। लेकिन आम लोगों के लिए सबसे बड़ा दबाव रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतें बनी हुई हैं।
2010 और 2026 की कीमतों की तुलना करें तो कई खाद्य वस्तुओं के दाम में भारी इजाफा हुआ है। रिपोर्ट ने ट्यूनीशिया के आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर बताया कि गाजर की कीमत 2010 से 428 प्रतिशत, आलू 268 प्रतिशत और बीफ 290 प्रतिशत बढ़ चुका है।
2010 में 8 ट्यूनीशियाई दीनार से 4 किलो टमाटर, आधा किलो चिकन और एक लीटर खाना पकाने का तेल खरीदा जा सकता था।
आज वही 8 दीनार इस मात्रा के आधे से भी कम सामान के लिए पर्याप्त है। टमाटर की कीमत 113 प्रतिशत, चिकन 118 प्रतिशत और खाना पकाने का तेल 129 प्रतिशत बढ़ चुका है।
यह अंतर केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। इसका सीधा असर घरेलू बजट और लोगों की क्रय शक्ति पर पड़ा है।
मांस की कीमतों में सबसे बड़ा दबाव दिखाई देता है।
2010 के मुकाबले बीफ करीब 290 प्रतिशत महंगा हो चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक, बीफ की कीमत अब करीब 52.5 दीनार प्रति किलो तक पहुंच चुकी है।
भेड़ के मांस की कीमतों पर भी हालिया दबाव बना हुआ है। जुलाई 2026 में ट्यूनीशिया में लैम्ब की कीमत सालाना आधार पर 16.7 प्रतिशत बढ़ी। ताजे फलों में 13.8 प्रतिशत और बीफ में 13.7 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई।
गाजर की कीमत 2010 के मुकाबले 428 प्रतिशत बढ़ी है। यानी जिस कीमत पर पहले एक मात्रा मिलती थी, उसी रकम में अब पांच गुना से भी कम मात्रा मिलती है।
आलू की कीमत में 268 प्रतिशत वृद्धि हुई है। इसके उलट चावल की कीमत में केवल करीब 10 प्रतिशत वृद्धि हुई, क्योंकि यह अभी भी कड़े मूल्य नियंत्रण के दायरे में है।
यहीं से ट्यूनीशिया की महंगाई की एक अहम तस्वीर सामने आती है। सभी वस्तुओं की कीमतें एक जैसी गति से नहीं बढ़ीं।
ट्यूनीशिया की सालाना महंगाई दर 2023 में 9.3 प्रतिशत तक पहुंची थी। 2024 में यह 7.2 प्रतिशत रही और 2025 में करीब 5.2 प्रतिशत पर आ गई। जुलाई 2026 में महंगाई दर 5.1 प्रतिशत दर्ज हुई।
पहली नजर में यह सुधार दिखाई देता है।
लेकिन महंगाई दर कीमतों का स्तर नहीं बताती। यह बताती है कि कीमतें पिछले साल की तुलना में कितनी तेजी से बढ़ रही हैं।
अगर किसी वस्तु की कीमत कई वर्षों में पहले ही काफी बढ़ चुकी है, तो महंगाई दर घटने के बाद भी वह वस्तु महंगी बनी रहती है।
यही ट्यूनीशिया के आम परिवारों की मौजूदा मुश्किल का एक बड़ा कारण है।
जुलाई 2026 में ट्यूनीशिया में खाद्य और गैर-मादक पेय पदार्थों की कीमतें सालाना 6.6 प्रतिशत बढ़ीं। मांस, फल और मछली जैसी वस्तुओं में वृद्धि सामान्य महंगाई दर से काफी अधिक रही।
ट्यूनीशिया के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, गैर-नियंत्रित खाद्य वस्तुओं की कीमतें जुलाई में 7.4 प्रतिशत बढ़ीं, जबकि नियंत्रित खाद्य वस्तुओं की वृद्धि केवल 0.2 प्रतिशत रही।
इससे पता चलता है कि सरकारी मूल्य नियंत्रण वाली वस्तुओं और बाजार आधारित कीमतों के बीच बड़ा अंतर बन चुका है।
ट्यूनीशियाई दीनार की कमजोरी महंगाई की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दिसंबर 2010 में 1 अमेरिकी डॉलर के लिए करीब 1.47 ट्यूनीशियाई दीनार मिलते थे। अब 1 डॉलर के लिए करीब 2.93 दीनार चाहिए। यानी डॉलर के मुकाबले दीनार की कीमत लगभग आधी रह गई है।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्यूनीशिया खाद्य और दूसरी आवश्यक वस्तुओं का एक हिस्सा विदेशों से खरीदता है।
जब दीनार कमजोर होता है, तो डॉलर और यूरो में होने वाला आयात महंगा पड़ता है। इसका असर अंततः घरेलू बाजार की कीमतों पर आता है।
आईएमएफ ने 2013 में ही ट्यूनीशिया में खाद्य कीमतों के बढ़ने के पीछे घरेलू कारणों की ओर ध्यान दिलाया था।
आईएमएफ के विश्लेषण के मुताबिक, 2011 की क्रांति के बाद ट्यूनीशिया में गैर-नियंत्रित खाद्य कीमतें अंतरराष्ट्रीय खाद्य कीमतों से अलग गति से बढ़ने लगीं। 2010 के बाद के शुरुआती वर्षों में अंतरराष्ट्रीय खाद्य कीमतों में मामूली वृद्धि के बावजूद ट्यूनीशिया में गैर-नियंत्रित खाद्य कीमतें 17 प्रतिशत बढ़ी थीं।
आईएमएफ ने इसके पीछे लीबिया से लौटे प्रवासियों और शरणार्थियों से बढ़ी घरेलू मांग, पड़ोसी देशों के साथ अनौपचारिक व्यापार और खाद्य वितरण व्यवस्था में आई कमजोरी जैसे कारकों का उल्लेख किया था।
ट्यूनीशिया 1970 से कई बुनियादी खाद्य वस्तुओं पर सब्सिडी देता रहा है। सरकार उत्पादकों और आयातकों को भुगतान करके कुछ आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बाजार मूल्य से नीचे रखने की कोशिश करती है।
इस व्यवस्था ने चावल और कुछ अन्य नियंत्रित वस्तुओं की कीमतों को अपेक्षाकृत स्थिर रखने में मदद की।
लेकिन दूसरी तरफ गैर-सब्सिडी वाली वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि हुई।
यही कारण है कि ट्यूनीशिया में महंगाई का अनुभव हर परिवार के लिए समान नहीं है।
2022 के अंत में ट्यूनीशियाई सरकार ने आईएमएफ ऋण हासिल करने के लिए सार्वभौमिक खाद्य सब्सिडी को धीरे-धीरे लक्षित नकद सहायता में बदलने की योजना पर सहमति जताई थी।
लेकिन 2023 में राष्ट्रपति कैस सईद ने इन शर्तों के क्रियान्वयन को रोक दिया।
इससे सरकार के सामने दो मुश्किलें बनी रहीं। एक तरफ सब्सिडी का वित्तीय बोझ है, दूसरी तरफ कीमतें बढ़ने पर आम लोगों की क्रय शक्ति बचाने का दबाव है।
विश्व बैंक के अनुसार, ट्यूनीशिया की औसत महंगाई 2025 में 5.7 प्रतिशत रही, जो फरवरी 2023 के 10.4 प्रतिशत के उच्च स्तर से काफी कम है।
लेकिन महंगाई दर का कम होना अपने आप जीवन-यापन की लागत को पुराने स्तर पर नहीं लाता।
2010 से अब तक कई खाद्य वस्तुओं की कीमतों में जो संचयी वृद्धि हुई है, वह परिवारों के बजट पर लंबे समय तक असर डालती है।
इसीलिए ट्यूनीशिया में आज बहस केवल “महंगाई कितनी है” पर नहीं, बल्कि “लोगों की आय के मुकाबले कीमतें कितनी हैं” पर भी केंद्रित है।
ट्यूनीशिया अरब स्प्रिंग का शुरुआती केंद्र था। वहां राजनीतिक बदलाव ने पूरे अरब जगत में आंदोलन की लहर पैदा की।
लेकिन करीब डेढ़ दशक बाद आर्थिक मोर्चे पर तस्वीर जटिल है। महंगाई की रफ्तार कुछ कम हुई है, मगर कीमतों का आधार स्तर काफी ऊपर जा चुका है।
2010 से तुलना में गाजर, बीफ, आलू, चिकन और खाना पकाने के तेल की कीमतों में भारी वृद्धि इसका सीधा उदाहरण है।
ट्यूनीशिया के लिए चुनौती अब दोहरी है। सरकार को कीमतों पर काबू रखना है और साथ ही ऐसी आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करनी है जिससे आम लोगों की वास्तविक आय भी बढ़े।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।