भारत ने 2019 के बाद भगोड़ा प्रत्यर्पण अभियान तेज किया। 36 देशों से 274 अपराधी वापस लाए गए। नए कानून, इंटरपोल समन्वय और टेक्नोलॉजी आधारित ट्रैकिंग से प्रक्रिया तेज हुई, लेकिन कानूनी चुनौतियां और अंतरराष्ट्रीय बाधाएं अब भी बनी हुई हैं।
📍 नई दिल्ली
📰 4 अगस्त 2026
✍️ By Mohd Haris
भारत का भगोड़ा प्रत्यर्पण अभियान पिछले सात वर्षों में नई रफ्तार के साथ सामने आया है। गृह मंत्रालय के मुताबिक 2019 से अब तक 36 देशों से 274 भगोड़े अपराधियों को वापस लाया गया। इसमें आतंकवाद, आर्थिक अपराध, नार्कोटिक्स और संगठित अपराध से जुड़े आरोपी शामिल हैं।
सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और इकोनॉमी दोनों से जोड़कर देख रही है। आधिकारिक नैरेटिव साफ है, विदेश भागे अपराधियों के लिए अब सुरक्षित ठिकाने कम होते जा रहे हैं।
2014 से पहले प्रत्यर्पण प्रक्रिया धीमी थी। हर साल औसतन चार अपराधी ही वापस लाए जाते थे। कई केस विदेशी अदालतों में अटक जाते थे।
मुख्य वजहें थीं अधूरे दस्तावेज, कमजोर समन्वय और पुरानी कानूनी संरचना। उस समय भारत के पास केवल 37 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि थी।
अब मॉडल बदला गया।
इंटेलिजेंस आधारित ट्रैकिंग शुरू हुई।
डिजिटल सर्विलांस और डेटा शेयरिंग को प्राथमिकता मिली।
2018 में भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम लागू हुआ। इससे आर्थिक अपराधियों की संपत्ति जब्त करने का रास्ता खुला।
इसके बाद 2019 में NIA संशोधन और UAPA संशोधन लाए गए। इनसे एजेंसियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई का दायरा मिला।
2024 में लागू नए आपराधिक कानूनों में अनुपस्थिति में ट्रायल का प्रावधान जोड़ा गया। इसका मतलब है, आरोपी देश से बाहर हो तब भी मुकदमा चल सकता है।
भारत ने इंटरपोल सहयोग को तेजी से बढ़ाया। रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने की संख्या लगातार बढ़ी।
2022 में 40 नोटिस
2023 में 100
2024 में 107
2025 में 112
2026 में अब तक 182
यह डेटा बताता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रैकिंग तेज हुई है।
2025 में ‘भारतपोल’ लॉन्च हुआ। इससे सीबीआई, राज्य पुलिस और इंटरपोल के बीच रियल-टाइम डेटा शेयरिंग संभव हुई।
पहले जानकारी साझा करने में महीनों लगते थे। अब कई मामलों में 3 से 10 दिन में डेटा एक्सचेंज हो रहा है।
ऑपरेशन त्रिशूल के तहत भगोड़ों की लोकेशन ट्रैक की गई।
सैटेलाइट डेटा, डिजिटल फुटप्रिंट और सर्विलांस का इस्तेमाल हुआ।
कई मामलों में आरोपी ने नाम बदल लिया था।
फिर भी प्रोफाइल मैपिंग से पहचान हुई।
यह टेक्नोलॉजी-ड्रिवन अप्रोच इस अभियान का मुख्य हिस्सा है।
मुंबई हमलों के आरोपी तहव्वुर राणा का अमेरिका से प्रत्यर्पण इस अभियान का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।
ऐसे केस सरकार के लिए केवल कानूनी नहीं, बल्कि डिप्लोमैटिक टेस्ट भी होते हैं।
यह संदेश दिया गया कि जटिल मामलों में भी भारत लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने को तैयार है।
सरकार का दावा है कि यह एक स्ट्रक्चर्ड और स्ट्रैटेजिक अभियान है।
इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता बताया गया है।
लेकिन आलोचक कुछ सवाल उठाते हैं।
क्या सभी मामलों में समान प्राथमिकता दी गई?
क्या राजनीतिक और आर्थिक प्रोफाइल के आधार पर प्राथमिकता तय होती है?
कुछ लीगल एक्सपर्ट कहते हैं कि कई हाई-वैल्यू आर्थिक अपराधी अब भी विदेशों में हैं।
प्रत्यर्पण एक जटिल प्रक्रिया है।
हर देश का अपना कानून होता है।
डबल क्रिमिनैलिटी नियम लागू होता है।
यानी जिस अपराध के लिए प्रत्यर्पण मांगा गया है, वह दोनों देशों में अपराध होना चाहिए।
इसके अलावा मानवाधिकार और ट्रायल की निष्पक्षता भी विदेशी अदालतें देखती हैं।
कई मामलों में इसी आधार पर भारत के अनुरोध खारिज हुए हैं।
2019 से 2026 के बीच 17,874 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त हुई।
18,762 करोड़ रुपये की रिकवरी की गई।
यह आंकड़ा बताता है कि अभियान केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है।
इकोनॉमिक रिकवरी भी इसका अहम हिस्सा है।
जम्मू-कश्मीर और अन्य क्षेत्रों में विदेशी नेटवर्क का इस्तेमाल हुआ।
आतंकवाद, नार्को-टेरर और फेक करेंसी ऑपरेशन जुड़े रहे।
सरकार का कहना है कि भगोड़ों की वापसी इन नेटवर्क को कमजोर करती है।
अभियान जारी है, लेकिन चुनौतियां भी बनी हैं।
हर देश के साथ प्रत्यर्पण संधि नहीं है।
कानूनी प्रक्रिया लंबी और जटिल रहती है।
टेक्नोलॉजी और डिप्लोमेसी को साथ लेकर चलना होगा।
भगोड़ा प्रत्यर्पण अभियान ने भारत की इंटरनेशनल लॉ एनफोर्समेंट क्षमता को मजबूत किया है।
डेटा बताता है कि प्रगति हुई है।
लेकिन अधूरा काम अब भी बाकी है।
सिस्टम की असली परीक्षा तब होगी जब बड़े और जटिल केस भी इसी गति से निपटाए जाएं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।