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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कर्मचारी की पहचान न होने पर भी कंपनी पर चलेगा आपराधिक केस

Wasi Siddiqui • 2026-09-08 14:19:08
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कर्मचारी की पहचान न होने पर भी कंपनी पर चलेगा आपराधिक केस

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कंपनी के खिलाफ आपराधिक मुकदमे के लिए हर मामले में आरोपी कर्मचारी की पहचान और गिरफ्तारी जरूरी नहीं। कंपनी की भूमिका प्रथम दृष्टया सामने आना पर्याप्त है।


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September 8, 2026

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Wasi Siddiqui



सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कंपनी पर आपराधिक मुकदमे के लिए कर्मचारी की पहचान अनिवार्य नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कंपनियों की आपराधिक जवाबदेही को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया कि केवल इस वजह से किसी कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को शुरुआती स्तर पर खत्म नहीं किया जा सकता कि कथित अपराध से जुड़े कर्मचारी, अधिकारी या दूसरे प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान नहीं हुई है या उसे आरोपी नहीं बनाया गया है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने यह फैसला सनोफी इंडिया लिमिटेड की अपील पर सुनाया। अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें कंपनी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से मना किया गया था।

सनोफी इंडिया मामले में क्या हुआ

मामला सनोफी इंडिया लिमिटेड के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो की कार्रवाई से जुड़ा है। कंपनी ने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के लिए दवाओं की खरीद से संबंधित एक मामले में कथित अनियमितताओं को लेकर आपराधिक कार्यवाही का सामना किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, कंपनी ने वर्ष 2011-12, 2013-14 और 2015-16 में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के रेयर मैटेरियल्स प्रोजेक्ट के लिए दवाओं की आपूर्ति की थी। जांच के बाद दाखिल आरोपपत्र में कंपनी को आरोपी बनाया गया था। साथ ही एक वैज्ञानिक अधिकारी के खिलाफ भी आरोप लगाए गए थे। हालांकि कंपनी के किसी कर्मचारी या अधिकारी को सह-आरोपी के तौर पर आरोपपत्र में शामिल नहीं किया गया था।

कंपनी ने इसी आधार पर अपनी दलील रखी कि जब उसके किसी अधिकारी या कर्मचारी को आरोपी नहीं बनाया गया, तो कंपनी के खिलाफ ऐसे अपराध की कार्यवाही कैसे जारी रह सकती है जिसमें आपराधिक मंशा साबित करना जरूरी है।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने कंपनी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी कंपनी के खिलाफ आपराधिक मुकदमे को केवल इस आधार पर खत्म करना उचित नहीं होगा कि उस कंपनी की ओर से कथित अपराध करने वाले किसी खास व्यक्ति की पहचान जांच के स्तर पर नहीं हो सकी।

अदालत ने कॉरपोरेट आपराधिक जवाबदेही के संदर्भ में यह भी स्पष्ट किया कि कंपनी एक कानूनी इकाई है और अपने कामकाज के लिए प्राकृतिक व्यक्तियों के माध्यम से कार्य करती है। ऐसे में किसी व्यक्ति के आचरण और मानसिक स्थिति को परिस्थितियों के आधार पर कंपनी से जोड़ा जा सकता है।

अदालत ने यह भी माना कि भारतीय कानून में कंपनियों को उन अपराधों के लिए जवाबदेह ठहराने की व्यवस्था मौजूद है जिनमें आपराधिक मंशा यानी मेन्स रिया एक आवश्यक तत्व है।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर मामले में कंपनी अपने आप दोषी मानी जाएगी। अभियोजन को कंपनी की भूमिका और उससे जुड़े तथ्यों को कानून के मुताबिक साबित करना होगा।

कर्मचारी की पहचान क्यों जरूरी नहीं मानी गई

फैसले का सबसे अहम पहलू यही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शुरुआती स्तर पर कंपनी के खिलाफ कार्यवाही खत्म करने के लिए किसी विशेष प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान हर मामले में अनिवार्य शर्त नहीं है।

अगर आरोपपत्र और उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि किसी व्यक्ति या व्यक्तियों ने कंपनी की ओर से काम किया और उनका आचरण कथित अपराध से जुड़ा है, तो केवल उनकी पहचान स्पष्ट न होने के आधार पर कंपनी को मुकदमे से बाहर नहीं किया जा सकता।

अदालत ने इस पड़ताल के लिए व्यापक ढांचा भी रखा है। इसमें यह देखना होगा कि किसी प्राकृतिक व्यक्ति या व्यक्तियों ने कंपनी की ओर से काम किया या नहीं, उनका काम कथित अपराध से जुड़ता है या नहीं और उपलब्ध परिस्थितियां कंपनी की आपराधिक मंशा की संभावना को पूरी तरह असंभव तो नहीं बनातीं।

कंपनी की आपराधिक मंशा कैसे तय होगी

किसी कंपनी का अपना शरीर या मानवीय दिमाग नहीं होता। इसलिए अदालतों के सामने यह सवाल रहता है कि कंपनी की आपराधिक मंशा को कानून की नजर में कैसे तय किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कॉरपोरेट क्रिमिनल लायबिलिटी और एट्रिब्यूशन के सिद्धांत पर विस्तृत चर्चा की। अदालत ने कहा कि किसी प्राकृतिक व्यक्ति की मानसिक स्थिति और उसका आचरण कुछ परिस्थितियों में कंपनी से जोड़ा जा सकता है।

इसका निर्धारण किसी व्यक्ति के पदनाम से अकेले नहीं होगा। व्यक्ति की वास्तविक भूमिका, कंपनी के साथ उसका संबंध, संबंधित लेनदेन और अपराध से जुड़ी परिस्थितियों को भी देखा जाएगा।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल निदेशक या शीर्ष अधिकारी ही ऐसे व्यक्ति नहीं होते जिनका आचरण कंपनी से जोड़ा जा सकता है। संबंधित मामले में किसी व्यक्ति की भूमिका और परिस्थितियों का विश्लेषण आवश्यक होगा।

अदालत ने ट्रायल के स्तर पर जाने की जरूरत क्यों बताई

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ऐसे मामलों में विस्तृत तथ्यात्मक जांच अक्सर ट्रायल के दौरान ही संभव होती है। आरोपपत्र में मौजूद सामग्री को शुरुआती स्तर पर देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि कंपनी की कोई भूमिका नहीं थी, उचित नहीं होगा, यदि रिकॉर्ड में कंपनी के आचरण से जुड़े प्रथम दृष्टया तथ्य मौजूद हों।

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, सनोफी इंडिया के मामले में रिकॉर्ड पर ऐसी सामग्री मौजूद थी जिससे प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता था कि प्राकृतिक व्यक्तियों ने कंपनी की ओर से संबंधित गतिविधियों में भूमिका निभाई और परिस्थितियां आपराधिक मंशा की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करती थीं। इसलिए इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही खत्म करने का आधार नहीं बनता था।

सुप्रीम कोर्ट ने सनोफी इंडिया की अपील खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने अंततः सनोफी इंडिया लिमिटेड की अपील खारिज कर दी। इसका सीधा अर्थ है कि कंपनी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही केवल इस आधार पर खत्म नहीं होगी कि आरोपित कर्मचारी या अधिकारी की पहचान या गिरफ्तारी नहीं हुई है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर अदालत को पूरे मामले का अंतिम फैसला नहीं करना है। ट्रायल में साक्ष्यों के आधार पर यह तय होगा कि कंपनी की भूमिका क्या थी और आरोपों को किस हद तक साबित किया जा सकता है।

कॉरपोरेट सेक्टर के लिए फैसले का महत्व

यह फैसला कंपनियों की आपराधिक जवाबदेही के लिहाज से अहम माना जा रहा है। इसका असर उन मामलों पर पड़ सकता है जहां किसी कंपनी पर धोखाधड़ी, साजिश, भ्रष्टाचार या दूसरे ऐसे अपराधों में भूमिका का आरोप हो जिनमें आपराधिक मंशा साबित करना जरूरी होता है।

पहले किसी कंपनी की ओर से यह दलील दी जा सकती थी कि जब कथित अपराध करने वाले व्यक्ति की पहचान नहीं हुई, तो कंपनी के खिलाफ आरोप टिक नहीं सकते। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट किया है कि केवल ऐसी कमी के आधार पर मुकदमे को शुरुआती चरण में खत्म करना जरूरी नहीं है।

फिर भी फैसला अभियोजन को कंपनी के खिलाफ बिना आधार के मुकदमा चलाने की खुली छूट नहीं देता। अदालत ने साफ किया है कि आरोपों में कंपनी की भूमिका से जुड़े प्रथम दृष्टया तथ्य होने चाहिए। यदि आरोपपत्र में ऐसे तथ्य ही मौजूद नहीं हैं, तो कार्यवाही रद्द होने का रास्ता खुला रहेगा।

कंपनियों के लिए जवाबदेही का नया न्यायिक संकेत

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेट जवाबदेही और व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कायम करने की कोशिश की है।

एक तरफ अदालत ने कंपनियों को केवल तकनीकी आधार पर आपराधिक मुकदमे से बाहर निकलने की गुंजाइश सीमित की है। दूसरी तरफ उसने यह भी स्पष्ट किया है कि कंपनी को दोषी ठहराने के लिए उसके साथ संबंधित प्राकृतिक व्यक्तियों के आचरण और मानसिक स्थिति को कानूनी सिद्धांतों के तहत जोड़ना होगा।

इससे जांच एजेंसियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश निकलता है। जांच में किसी कंपनी की भूमिका को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि किसी एक कर्मचारी की पहचान स्पष्ट नहीं हुई। साथ ही आरोपों को कंपनी के वास्तविक कामकाज और उपलब्ध साक्ष्यों से जोड़ना जरूरी रहेगा।

आगे क्या होगा

सनोफी इंडिया के मामले में अब आपराधिक कार्यवाही केवल कर्मचारी की पहचान न होने के आधार पर समाप्त नहीं होगी। आगे की न्यायिक प्रक्रिया में आरोपों और साक्ष्यों की विस्तृत पड़ताल होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति सभी हाईकोर्ट को भेजने का निर्देश भी दिया है। इससे देशभर में कॉरपोरेट आपराधिक मामलों की सुनवाई के दौरान इस फैसले के सिद्धांतों का इस्तेमाल होने की संभावना है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का फैसला कॉरपोरेट आपराधिक जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण न्यायिक स्पष्टता देता है। अदालत ने कहा है कि किसी कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को केवल इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता कि कथित अपराध से जुड़े प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान नहीं हुई।

हालांकि कंपनी के खिलाफ मुकदमा जारी रखने के लिए प्रथम दृष्टया सामग्री जरूरी है। कंपनी की ओर से किए गए काम, संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और आपराधिक मंशा से जुड़े हालात को कानून के मुताबिक जांचना होगा।

सनोफी इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर कंपनी की अपील खारिज की और कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। 

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Wasi Siddiqui

Wasi Siddiqui

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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