India
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर सख्ती, मेटा ने कानून लागू करने वाली एजेंसियों से जानकारी साझा करने पर जताई सहमति
Mohammad Naved
•
2026-09-15 11:07:18
भारत सरकार बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही बढ़ा रही है। मेटा ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों की जानकारी संबंधित कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ साझा करने पर सहमति जताई है। सरकार का जोर आपत्तिजनक सामग्री की पहचान, रोकथाम और समयबद्ध कार्रवाई पर है।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 15 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर सरकार का बढ़ता दबाव
भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही मजबूत करने की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं। इसी सिलसिले में मेटा ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों की जानकारी संबंधित कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ साझा करने पर सहमति जताई है। यह जानकारी एबीपी लाइव की 15 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में सामने आई है।
मामला ऐसे समय सामने आया है जब सरकार इंटरनेट पर बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन शोषण, नुकसानदेह सामग्री और दूसरे ऑनलाइन अपराधों को लेकर प्लेटफॉर्म कंपनियों पर अधिक जवाबदेही तय करने की कोशिश कर रही है। सरकारी नीति का फोकस केवल शिकायत मिलने के बाद सामग्री हटाने तक सीमित नहीं है। पहचान, रोकथाम और कानून लागू करने वाली एजेंसियों को जरूरी सहयोग देने पर भी जोर है।
मेटा की सहमति का क्या मतलब है
एबीपी लाइव की रिपोर्ट के मुताबिक, मेटा ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों की जानकारी संबंधित कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ साझा करने पर सहमति जताई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार सोशल मीडिया कंपनियों के साथ लगातार बातचीत कर रही है, ताकि बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक कंटेंट की पहचान जल्दी हो और उसे प्लेटफॉर्म से हटाने की कार्रवाई प्रभावी तरीके से हो।
यहां एक अहम पहलू यह है कि उपलब्ध रिपोर्ट में जानकारी साझा करने की सहमति का जिक्र है, लेकिन इसके तहत साझा की जाने वाली हर तरह की जानकारी, प्रक्रिया, समयसीमा या तकनीकी प्रोटोकॉल का विस्तृत आधिकारिक ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए इसे व्यापक स्तर पर सभी उपयोगकर्ता डेटा साझा करने की घोषणा के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
सरकार का फोकस केवल सामग्री हटाने तक सीमित नहीं
भारत सरकार का मौजूदा रुख बताता है कि ऑनलाइन बाल सुरक्षा को एक व्यापक डिजिटल सुरक्षा मुद्दे के तौर पर देखा जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने जुलाई 2026 में कहा था कि सरकार सोशल मीडिया पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को लेकर गंभीर है और संबंधित प्लेटफॉर्म से रिपोर्ट मांगी गई थी। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को नोटिस जारी किया था।
सरकार की कोशिश ऐसे डिजिटल माहौल की है जिसमें बच्चों के खिलाफ नुकसानदेह सामग्री की पहचान तेजी से हो और कानून के मुताबिक कार्रवाई हो। इसके लिए सोशल मीडिया कंपनियों की तकनीकी क्षमता, आंतरिक मॉडरेशन व्यवस्था और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच समन्वय अहम भूमिका निभाएगा।
मौजूदा कानूनों में पहले से हैं कई प्रावधान
भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए पहले से कानूनी और नियामकीय ढांचा मौजूद है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत मध्यस्थ प्लेटफॉर्मों पर गैरकानूनी और बच्चों के लिए नुकसानदेह सामग्री को लेकर जिम्मेदारियां तय हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्लेटफॉर्मों को ऐसी सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए निर्धारित सावधानियां बरतनी होती हैं।
सरकारी जानकारी के मुताबिक, सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत बच्चों के लिए नुकसानदेह, अश्लील, अश्लील यौन सामग्री या बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री के खिलाफ कार्रवाई की व्यवस्था है। नियमों के अनुपालन में विफल रहने पर संबंधित मध्यस्थ को कानून के तहत मिलने वाली सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है और अन्य कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।
शिकायत से पहले पहचान पर बढ़ता जोर
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाल सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ऐसी सामग्री की पहचान है जो तेजी से अलग-अलग खातों और समूहों के जरिए फैल सकती है। सरकार अब ऐसी व्यवस्था पर जोर दे रही है जिसमें केवल उपयोगकर्ता की शिकायत का इंतजार करने के बजाय संभावित गैरकानूनी सामग्री की पहचान और रोकथाम के लिए तकनीकी उपाय मजबूत किए जाएं।
एबीपी लाइव की रिपोर्ट में भी बताया गया है कि अधिकारियों का फोकस ऐसी सामग्री की पहचान पर है जो बच्चों को नुकसान पहुंचा सकती है या उनके यौन शोषण से जुड़ी हो। रिपोर्ट के अनुसार, सरकार चाहती है कि प्लेटफॉर्म ऐसी सामग्री की पहचान और रोकथाम के लिए सक्रिय व्यवस्था विकसित करें।
कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए क्यों अहम है यह कदम
ऑनलाइन बाल शोषण के मामलों में डिजिटल साक्ष्य जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। किसी सामग्री का स्रोत, उससे जुड़े खाते, प्रसार का तरीका और उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड जांच एजेंसियों के लिए मामले की तह तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं।
इसी वजह से प्लेटफॉर्म और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच सहयोग को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, ऐसी जानकारी साझा करते समय कानूनी प्रक्रिया, गोपनीयता और डेटा सुरक्षा के मानकों का पालन भी उतना ही जरूरी है।
सरकार के सामने चुनौती यह है कि बच्चों की सुरक्षा और कानून प्रवर्तन की जरूरतों को पूरा करते हुए निर्दोष उपयोगकर्ताओं की निजता भी सुरक्षित रहे। यही संतुलन डिजिटल नियमन की विश्वसनीयता तय करेगा।
भारत का नियामकीय ढांचा लगातार मजबूत हुआ है
केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े नियमों को लगातार मजबूत किया है। सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के साथ डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून भी बच्चों से जुड़े व्यक्तिगत डेटा के लिए अलग सुरक्षा प्रावधान रखता है।
सरकार के अनुसार, बच्चों के व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण के लिए सत्यापित अभिभावकीय सहमति का प्रावधान है। साथ ही बच्चों की निगरानी और उनके लिए लक्षित विज्ञापन से संबंधित प्रतिबंध भी निर्धारित किए गए हैं।
सरकार ने अगस्त 2026 में भी कहा था कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा से जुड़े जोखिमों में नुकसानदेह सामग्री, साइबरबुलिंग, ऑनलाइन दुर्व्यवहार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और डिजिटल निर्भरता शामिल हैं। इन चुनौतियों को देखते हुए सूचना प्रौद्योगिकी कानून, संबंधित नियम और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून के जरिए एक व्यापक ढांचा तैयार किया गया है।
ऑनलाइन यौन शोषण के खिलाफ अलग संस्थागत व्यवस्था
बच्चों के ऑनलाइन यौन शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ केंद्र सरकार के अलग-अलग मंत्रालयों और संस्थाओं की भूमिका भी तय है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और गृह मंत्रालय अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में इससे जुड़े मामलों पर काम करते हैं।
सरकार ने अगस्त 2026 में कहा था कि बच्चों के ऑनलाइन यौन शोषण और उत्पीड़न को रोकने, उसका पता लगाने और उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए संस्थागत व्यवस्था तैयार की गई है। बाल यौन अपराध संरक्षण कानून भी ऑनलाइन माध्यम से होने वाले यौन उत्पीड़न को कानूनी दायरे में रखता है।
इससे स्पष्ट है कि मेटा से जानकारी साझा करने की सहमति को एक व्यापक सरकारी नीति के हिस्से के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि अलग-थलग कार्रवाई के रूप में।
दूसरे प्लेटफॉर्म भी सरकार के रडार पर
मामला केवल मेटा तक सीमित नहीं है। एबीपी लाइव की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार दूसरे सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों के साथ भी बातचीत कर रही है। उद्देश्य बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक और गैरकानूनी कंटेंट की पहचान तथा समय पर कार्रवाई की व्यवस्था को मजबूत करना है।
यदि यह नीति आगे बढ़ती है, तो अलग-अलग प्लेटफॉर्मों से कानून लागू करने वाली एजेंसियों को मिलने वाले सहयोग की प्रकृति और प्रक्रिया अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी। प्लेटफॉर्मों के लिए एक समान और स्पष्ट अनुपालन मानक भी इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा होगा।
निजता और बाल सुरक्षा के बीच संतुलन जरूरी
बच्चों की सुरक्षा को मजबूत करना सार्वजनिक हित का महत्वपूर्ण मुद्दा है। लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म से जानकारी साझा करने की व्यवस्था में निजता और डेटा सुरक्षा के सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हर सूचना साझा करने की प्रक्रिया स्पष्ट कानूनी आधार पर होनी चाहिए। किस स्थिति में जानकारी मांगी जाएगी, कौन-सी जानकारी साझा होगी, किस एजेंसी को मिलेगी और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से होगा, इन सवालों का स्पष्ट जवाब जरूरी है।
यह पारदर्शिता प्लेटफॉर्म, सरकार और आम उपयोगकर्ताओं के बीच भरोसा मजबूत करने में मदद करेगी।
सरकार का अगला फोकस क्या हो सकता है
सरकार की मौजूदा दिशा से संकेत मिलता है कि आने वाले समय में ऑनलाइन बाल सुरक्षा के लिए तकनीकी निगरानी, सामग्री की पहचान, शिकायत निवारण और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के बीच समन्वय पर अधिक जोर रहेगा।
फरवरी 2026 में सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में सिंथेटिक रूप से तैयार सामग्री से जुड़े प्रावधानों को भी मजबूत किया गया था। सरकार ने कहा था कि प्लेटफॉर्मों को बच्चों के लिए नुकसानदेह और गैरकानूनी कृत्रिम रूप से तैयार सामग्री के निर्माण और प्रसार को रोकने के लिए उचित तकनीकी उपाय अपनाने होंगे।
इसका मतलब है कि आने वाले दौर में बाल सुरक्षा का सवाल केवल पारंपरिक सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार सामग्री, फर्जी पहचान और तेजी से फैलने वाले डिजिटल नेटवर्क भी नियामकीय एजेंडा का हिस्सा बने रहेंगे।
मेटा की ओर से बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों की जानकारी कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ साझा करने की सहमति भारत में ऑनलाइन बाल सुरक्षा को लेकर बढ़ती नियामकीय सख्ती का महत्वपूर्ण संकेत है। एबीपी लाइव ने इसे सरकार की कार्रवाई और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ जारी बातचीत के संदर्भ में रिपोर्ट किया है।
हालांकि, इस कदम का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि जानकारी साझा करने की व्यवस्था कितनी स्पष्ट, कानूनी और जवाबदेह होती है। बच्चों की हिफाज़त के साथ उपयोगकर्ताओं की निजता, डेटा सुरक्षा और उचित कानूनी प्रक्रिया का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी होगा।
भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म का विस्तार लगातार बढ़ रहा है। ऐसे माहौल में बच्चों को ऑनलाइन शोषण और नुकसानदेह सामग्री से बचाने के लिए सरकार, तकनीकी कंपनियों, कानून लागू करने वाली एजेंसियों और अभिभावकों के बीच समन्वय की जरूरत बनी रहेगी।
Mohammad Naved
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।