शिल्ड बिल से बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर लगेगी रोक?
शिल्ड बिल पर क्यों बढ़ी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा की बहस?
बच्चों की सोशल मीडिया आज़ादी बनाम सुरक्षा, क्या है शिल्ड बिल?
भारत में SHIELD Bill 2025 के जरिए बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को सीमित करने की कोशिश सामने आई है। बीजेपी सांसद बैजयंत पांडा का प्राइवेट मेंबर्स बिल 13 साल से कम उम्र के बच्चों पर फोकस करता है। बिल अभी संसद में पेश नहीं हुआ है। बहस सुरक्षा, निजता और डिजिटल आज़ादी के बीच संतुलन पर है।
📍 Location: नई दिल्ली, भारत
📰 Date: 8 अगस्त 2026
✍️ By Asif Khan
भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर बहस अब सोशल मीडिया की पहुंच और उसकी उम्र सीमा तक पहुंच गई है। बीजेपी सांसद और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बैजयंत जय पांडा ने SHIELD Bill 2025 के जरिए 13 साल से कम उम्र के बच्चों के इंटरनेट और सोशल मीडिया इस्तेमाल को रेगुलेट करने का प्रस्ताव रखा है। यह एक Private Member’s Bill है, यानी इसे सरकार ने बतौर सरकारी विधेयक पेश नहीं किया है।
इस प्रस्ताव की अहमियत इसलिए बढ़ती है क्योंकि दुनियाभर में सरकारें बच्चों की ऑनलाइन सेफ्टी को लेकर नए कानून बना रही हैं। ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर 2025 से कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 16 साल से कम उम्र के यूजर्स के अकाउंट को रोकने के लिए प्लेटफॉर्म्स पर जिम्मेदारी डाली है। भारत में प्रस्तावित SHIELD Bill का मॉडल इससे अलग है और इसकी रिपोर्टेड मुख्य सीमा 13 साल से कम उम्र के बच्चों से जुड़ी है।
SHIELD का पूरा नाम Safeguarding Healthy Environments for Little Digital Natives Bill 2025 है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार इसका मकसद बच्चों के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया तक पहुंच को सीमित और रेगुलेट करना है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्ताव में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए पैरेंटल कंसेंट का प्रावधान envisaged किया गया है।
यह समझना जरूरी है कि प्रस्तावित बिल को लेकर सार्वजनिक रिपोर्टिंग में हर प्रावधान की पूरी कानूनी भाषा उपलब्ध नहीं है। इसलिए स्क्रीन टाइम कैप, हर प्लेटफॉर्म पर अनिवार्य आयु सत्यापन या सभी सोशल मीडिया ऐप्स पर एक समान प्रतिबंध जैसे दावे बिना मूल बिल टेक्स्ट के अंतिम तथ्य नहीं माने जाने चाहिए।
सबसे अहम तथ्य यह है कि SHIELD Bill अभी कानून नहीं है। फरवरी 2026 में इसे लोकसभा में पेश करने की कोशिश दूसरी बार टल गई थी। सदन स्थगित होने के कारण बिल पेश नहीं हो सका।
SHIELD Bill 2025 को कई महीनों से लोकसभा में पेश किए जाने के लिए सूचीबद्ध किया गया था। फरवरी 2026 में बैजयंत पांडा इसे सदन में पेश करना चाहते थे, लेकिन कार्यवाही स्थगित होने से ऐसा नहीं हो सका। इससे पहले विंटर सेशन में भी Private Members’ Bills के लिए तय कार्यवाही बाधित हुई थी।
इसका मतलब है कि मौजूदा स्थिति में इसे संसद की बहस, संसदीय जांच और वोटिंग की प्रक्रिया से गुजरना बाकी है। लिहाजा इसे “भारत का नया सोशल मीडिया कानून” कहना गलत होगा। सही शब्द “प्रस्तावित बिल” है।
यह फर्क न्यूज़रूम के लिहाज से अहम है। प्रस्ताव और लागू कानून के बीच लंबी विधायी प्रक्रिया होती है। बिल पेश होना, चर्चा, समिति को भेजा जाना, दोनों सदनों से पारित होना और राष्ट्रपति की मंजूरी, इन सभी चरणों के बाद ही कानून अस्तित्व में आता है।
बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पाबंदी की मांग के पीछे कई गंभीर चिंताएं हैं। इनमें साइबरबुलिंग, हानिकारक कंटेंट, ऑनलाइन शोषण, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और प्लेटफॉर्म के ऐसे डिजाइन फीचर्स शामिल हैं जो यूजर को ज्यादा समय तक जोड़े रखने के लिए बनाए जाते हैं।
ऑस्ट्रेलिया की ई-सेफ्टी अथॉरिटी के मुताबिक वहां लागू आयु प्रतिबंधों का मकसद बच्चों को ऐसे प्लेटफॉर्म डिजाइन से बचाना है जो स्क्रीन पर समय बढ़ाते हैं और स्वास्थ्य तथा वेलबीइंग पर असर डालने वाले कंटेंट तक पहुंच आसान बनाते हैं।
भारत में भी डेटा प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क बच्चों को अतिरिक्त सुरक्षा देता है। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स 2025 के तहत बच्चों के पर्सनल डेटा की प्रोसेसिंग के लिए माता-पिता या कानूनी अभिभावक की वेरिफाएबल कंसेंट से जुड़े प्रावधान हैं।
लेकिन डेटा सुरक्षा और सोशल मीडिया एक्सेस पर उम्र सीमा दो अलग मसले हैं। एक नियम डेटा के इस्तेमाल को नियंत्रित करता है, जबकि SHIELD Bill सोशल मीडिया तक पहुंच को लेकर व्यापक पॉलिसी सवाल उठाता है।
यहीं से बहस पेचीदा हो जाती है। बच्चों को नुकसानदेह डिजिटल माहौल से बचाना जरूरी है, लेकिन हर उम्र के बच्चे को सोशल मीडिया से पूरी तरह अलग करना भी समाधान नहीं माना जा सकता।
यूनिसेफ ने दिसंबर 2025 में कहा था कि सिर्फ आयु प्रतिबंध बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। संस्था के मुताबिक सोशल मीडिया कुछ बच्चों के लिए सीखने, संपर्क, खेल और आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम भी है।
इसलिए नीति का सवाल केवल यह नहीं है कि बच्चे सोशल मीडिया इस्तेमाल करें या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि प्लेटफॉर्म किस तरह डिजाइन किए जाएं, कंपनियां किस हद तक जवाबदेह हों और बच्चों की निजता की रक्षा करते हुए उम्र सत्यापन कैसे किया जाए।
अगर सरकार सोशल मीडिया पर आयु सीमा लागू करती है तो प्लेटफॉर्म को यह पता लगाना होगा कि यूजर की उम्र क्या है। यहां निजता और डेटा सिक्योरिटी का सवाल सामने आता है।
उम्र सत्यापन के लिए सरकारी पहचान दस्तावेज, फेस एनालिसिस, वॉइस एनालिसिस या दूसरे डिजिटल संकेत इस्तेमाल किए जा सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में प्लेटफॉर्म्स के लिए उम्र जांच के कई तरीके इस्तेमाल हो रहे हैं और वहां नियामक इनकी प्रभावशीलता तथा असर का आकलन कर रहा है।
भारत में यही व्यवस्था लागू होती है तो एक नई चिंता पैदा होगी। बच्चों को सुरक्षित करने के नाम पर कंपनियां कितनी निजी जानकारी हासिल करेंगी? डेटा कहां रखा जाएगा? उसे कितने समय तक रखा जाएगा? गलत उम्र आकलन होने पर अपील का रास्ता क्या होगा?
इन सवालों का जवाब कानून की सफलता के लिए उतना ही जरूरी होगा जितना उम्र सीमा तय करना।
ऑस्ट्रेलिया ने 10 दिसंबर 2025 से कई प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 16 साल से कम उम्र के लोगों के अकाउंट को रोकने की व्यवस्था लागू की। ई-सेफ्टी के मुताबिक मार्च 2026 तक नियामक ने कई बड़े प्लेटफॉर्म्स के अनुपालन पर चिंता जताई और कुछ मामलों में प्रवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाया।
ऑस्ट्रेलिया का अनुभव यह दिखाता है कि कानून पास करना शुरुआती चरण है। असली इम्तिहान उसके अमल का है। बच्चे उम्र गलत दर्ज कर सकते हैं, दूसरे अकाउंट इस्तेमाल कर सकते हैं और अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर चले जा सकते हैं।
यही वजह है कि भारत में भी केवल उम्र सीमा तय करने से समस्या खत्म नहीं होगी। प्लेटफॉर्म डिजाइन, एल्गोरिदमिक रिकमेंडेशन, पैरेंटल कंट्रोल, शिकायत तंत्र और डिजिटल लिटरेसी को साथ लेकर चलना होगा।
SHIELD Bill को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी हुई है। बैजयंत पांडा ने बिल पेश न हो पाने के लिए संसद में व्यवधान को जिम्मेदार ठहराया था। लेकिन इस मसले का व्यापक महत्व किसी एक पार्टी या सांसद की सियासत से आगे जाता है।
बच्चों की डिजिटल सुरक्षा अब वैश्विक पॉलिसी एजेंडा बन चुकी है। अमेरिका में भी बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग संघीय प्रस्ताव और राज्य कानून सामने आए हैं। जून 2026 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की एक समिति में बच्चों के लिए सोशल मीडिया सेफ्टी को लेकर द्विदलीय समझौते की रिपोर्ट सामने आई थी।
भारत के लिए चुनौती यह है कि वह विदेशी मॉडल की हूबहू नकल न करे। देश की डिजिटल आबादी, परिवार व्यवस्था, भाषाई विविधता और इंटरनेट की पहुंच अलग है।
अगर कड़े आयु प्रतिबंध लागू होते हैं तो सोशल मीडिया कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म के डिजाइन और वेरिफिकेशन सिस्टम में बदलाव करना पड़ेगा। इससे टेक्निकल कॉम्प्लायंस की लागत बढ़ सकती है।
दूसरी तरफ बच्चों से जुड़े डिजिटल विज्ञापन, पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन और डेटा प्रोसेसिंग पर भी असर पड़ेगा। यह डिजिटल एडवरटाइजिंग इकोसिस्टम के लिए महत्वपूर्ण बदलाव होगा।
भारत में स्टार्टअप्स और छोटी टेक कंपनियों के लिए भी अनुपालन लागत एक चुनौती बन सकती है। इसलिए किसी कानून में बड़े प्लेटफॉर्म और छोटे डिजिटल सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच मुनासिब अंतर रखना जरूरी होगा।
SHIELD Bill की अगली अहम परीक्षा संसद में पेश होने और उसके बाद होने वाली बहस होगी। वहां यह साफ होना जरूरी है कि किस उम्र तक कौन-सा प्रतिबंध लागू होगा, सोशल मीडिया की कानूनी परिभाषा क्या होगी और उम्र सत्यापन की जिम्मेदारी किसकी होगी।
इसके साथ यह भी तय होना चाहिए कि बच्चों के लिए सुरक्षित प्लेटफॉर्म डिजाइन की न्यूनतम शर्तें क्या होंगी। पैरेंटल कंसेंट अकेला सुरक्षा मॉडल नहीं बन सकता।
भारत को एक ऐसा फ्रेमवर्क चाहिए जिसमें बच्चों की सुरक्षा, निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और डिजिटल भागीदारी के बीच संतुलन हो। यूनिसेफ की चेतावनी भी इसी तरफ इशारा करती है कि केवल बैन या आयु सीमा से पूरी समस्या हल नहीं होगी।
SHIELD Bill ने भारत में एक जरूरी सवाल को संसद के सामने रखने की कोशिश की है। बच्चों को सोशल मीडिया के नुकसान से कैसे बचाया जाए, यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता।
लेकिन सही नीति केवल बच्चों को प्लेटफॉर्म से दूर करने पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। असली कसौटी यह होगी कि भारत बच्चों को सुरक्षित डिजिटल माहौल देता है या नहीं, प्लेटफॉर्म कंपनियों को जवाबदेह बनाता है या नहीं और इस प्रक्रिया में बच्चों की निजता तथा डिजिटल अधिकारों की हिफाज़त करता है या नहीं।
SHIELD Bill अभी प्रस्ताव है, कानून नहीं। इसलिए आगे की संसदीय बहस ही तय करेगी कि भारत बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए कितना व्यापक, व्यावहारिक और निजता-सम्मत मॉडल तैयार करता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।