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जनगणना 2027 पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश बोले, प्रक्रिया विकृत और इरादा संदिग्ध
Wasi Siddiqui
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2026-09-10 15:49:19
📍 नई दिल्ली
🗓️ 10 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
कांग्रेस ने जनगणना 2027 की प्रक्रिया और चार चुनावी राज्यों में समय से पहले जनसंख्या गणना कराने के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जयराम रमेश ने इसे खराब योजना और संदिग्ध राजनीतिक मंशा से जोड़ा है, जबकि पूर्व जनगणना अधिकारियों ने डेटा की शुद्धता और गोपनीयता को लेकर चिंता जताई है।
जनगणना 2027 को लेकर नई सियासी बहस
भारत की आगामी जनगणना को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने जनगणना 2027 की प्रक्रिया, इसके समय निर्धारण और जाति संबंधी जानकारी जुटाने के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पूरी कवायद में ऐसी खामियां हैं, जो अंतिम आंकड़ों की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती हैं।
यह विवाद ऐसे वक्त में सामने आया है जब केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा और उत्तराखंड के गैर-बर्फीले इलाकों में जनसंख्या गणना का कार्यक्रम देश के बाकी हिस्सों से पहले रखने का फैसला किया है। इन राज्यों में गणना 1 दिसंबर 2026 से 4 जनवरी 2027 तक होगी। इसके बाद 5 जनवरी से 9 जनवरी तक संशोधन चरण रखा गया है।
चार राज्यों में पहले गणना क्यों?
सरकार के मुताबिक इन राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इसी वजह से जनसंख्या गणना का कार्यक्रम आगे किया गया है, ताकि जनगणना और चुनावी प्रक्रिया के बीच प्रशासनिक टकराव कम हो। बाकी देश में जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में प्रस्तावित है।
कांग्रेस इस तर्क को स्वीकार नहीं कर रही है। जयराम रमेश ने सवाल उठाया है कि जब इन राज्यों में चुनाव पहले से निर्धारित थे, तो जनसंख्या गणना का कार्यक्रम पहले से उसी हिसाब से क्यों नहीं बनाया गया। उन्होंने इस फैसले को खराब योजना बताया और राजनीतिक मंशा पर भी सवाल खड़े किए।
यहां एक अहम अंतर समझना जरूरी है। चार राज्यों में गणना पहले कराने का सरकारी फैसला अपने आप में किसी राजनीतिक हेरफेर का प्रमाण नहीं है। राजनीतिक मंशा से जुड़ा आरोप कांग्रेस का दावा है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध तथ्यों से नहीं होती।
पूर्व जनगणना अधिकारियों ने भी जताई चिंता
जयराम रमेश के बयान के बीच कुछ पूर्व जनगणना अधिकारियों ने भी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उनकी चिंता मुख्य रूप से डेटा की गुणवत्ता, प्रवासी आबादी की गणना और जनगणना में पूछे जा रहे अतिरिक्त सवालों को लेकर है।
पूर्व अधिकारियों की एक प्रमुख दलील यह है कि अलग-अलग राज्यों में जनसंख्या गणना अलग समय पर होने से प्रवासी मजदूरों की गिनती को लेकर चुनौती पैदा हो सकती है। खासकर ऐसे लोग जो काम या रोजगार के कारण अपने मूल राज्य से बाहर रहते हैं, उनके दो अलग-अलग समय पर होने वाले गणना चक्रों में सही स्थान पर दर्ज होने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
हालांकि यह एक विशेषज्ञ चिंता है, इसे अभी वास्तविक आंकड़ों में हुई कमी के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। जनगणना पूरी होने और आंकड़ों के सत्यापन के बाद ही यह आकलन संभव होगा कि इस व्यवस्था का वास्तविक असर कितना पड़ा।
जाति संबंधी सवाल पर भी विवाद
जनगणना 2027 में जाति संबंधी जानकारी जुटाने का फैसला भी राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा है। कांग्रेस का आरोप है कि जाति संबंधी सवाल का प्रारूप पर्याप्त रूप से व्यवस्थित नहीं है। पार्टी का कहना है कि खुले तरीके से जाति का नाम दर्ज करने की व्यवस्था से अलग-अलग नाम, उपजातियां और वर्तनी सामने आ सकती हैं, जिससे आंकड़ों के वर्गीकरण में मुश्किल पैदा होगी।
कांग्रेस ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री को पहले पत्र लिखे जाने का भी हवाला दिया है। पार्टी का कहना है कि जाति संबंधी सवालों को अधिक स्पष्ट और मानकीकृत तरीके से तैयार किया जाना चाहिए।
सरकार की ओर से जनगणना 2027 को व्यापक डिजिटल अभ्यास के रूप में तैयार किया जा रहा है। इसमें पहली बार पूरी जनगणना डिजिटल माध्यम से संचालित करने की योजना है और नागरिकों को स्व-गणना का विकल्प भी दिया गया है।
जनगणना में 40 सवालों का प्रावधान
जनसंख्या गणना के लिए अधिसूचित प्रश्नावली में 40 सवाल रखे गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक इनमें परिवार और व्यक्ति से संबंधित कई तरह की जानकारी शामिल है। जाति से जुड़ा सवाल भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
कुछ नए सवालों को लेकर पूर्व अधिकारियों ने भी सवाल उठाए हैं। इनमें माता-पिता से संबंधित विवरण और कुछ पहचान दस्तावेजों से जुड़ी जानकारी शामिल होने की बात सामने आई है। पूर्व अधिकारियों के एक वर्ग ने पूछा है कि जनगणना जैसे सांख्यिकीय अभ्यास में ऐसी सूचनाओं की उपयोगिता और आवश्यकता किस तरह तय की गई है।
यहां भी सावधानी जरूरी है। जनगणना में किसी प्रश्न का शामिल होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसके पीछे कोई नागरिक-पंजीकरण या अन्य प्रशासनिक उद्देश्य है।
एनपीआर और एनआरसी को लेकर आशंका
पूर्व जनगणना अधिकारियों की चिंता का एक दूसरा पहलू जनगणना और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के बीच संभावित संबंध को लेकर है। कुछ पूर्व अधिकारियों ने कहा है कि नई प्रश्नावली के कुछ हिस्से पहले राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर की प्रक्रिया में इस्तेमाल किए गए सवालों से मिलते-जुलते हैं।
इसी वजह से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से जुड़े पुराने विवाद भी फिर चर्चा में आ गए हैं। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टिंग में इस समय ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है कि जनगणना 2027 के आंकड़ों को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करने के लिए इस्तेमाल करने का सरकार ने फैसला किया है।
इसलिए जनगणना, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को एक ही प्रक्रिया मानना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। तीनों के कानूनी और प्रशासनिक ढांचे अलग हैं।
सरकार की तैयारी क्या है?
केंद्र सरकार के अनुसार जनगणना 2027 की तैयारी डिजिटल बुनियादी ढांचे के साथ की जा रही है। गृह मंत्रालय ने अगस्त 2026 में बताया था कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मकान सूचीकरण और आवास संबंधी पहला चरण पूरा हो चुका था, जबकि शेष क्षेत्रों में इसे सितंबर 2026 तक पूरा करने का कार्यक्रम था।
बर्फीले और गैर-समकालिक क्षेत्रों के लिए जनसंख्या गणना का कार्यक्रम पहले रखा गया है। लद्दाख तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले इलाकों में सितंबर 2026 से अलग चरण शुरू किया गया है।
सरकार का कहना है कि डिजिटल माध्यम से डेटा संग्रह और निगरानी से प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाया जाएगा।
कांग्रेस के आरोप और तथ्य की कसौटी
कांग्रेस का मूल आरोप दो स्तरों पर है। पहला, चुनाव वाले राज्यों में गणना पहले कराने का फैसला प्रशासनिक रूप से संदिग्ध है। दूसरा, जाति संबंधी सवालों की संरचना से जातिगत आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
इन आरोपों को अभी अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। जनगणना की गुणवत्ता का वास्तविक परीक्षण डेटा संग्रह, सत्यापन, वर्गीकरण और अंतिम प्रकाशन के बाद ही होगा।
दूसरी तरफ पूर्व अधिकारियों की आपत्तियां गंभीर हैं क्योंकि उनका संबंध जनगणना संचालन के प्रशासनिक अनुभव से रहा है। उनके सवालों का जवाब पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट दिशा-निर्देश और डेटा सुरक्षा के ठोस प्रावधानों से दिया जाना महत्वपूर्ण होगा।
आगे क्या होगा?
चार राज्यों में जनसंख्या गणना 1 दिसंबर 2026 से शुरू होगी। देश के अधिकांश हिस्सों में यह प्रक्रिया फरवरी 2027 में होगी। सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना होगी कि अलग-अलग समय पर गणना होने के बावजूद आंकड़ों में निरंतरता और तुलनीयता बनी रहे।
जाति संबंधी आंकड़ों के मामले में भी प्रश्नावली की स्पष्टता महत्वपूर्ण होगी। अलग-अलग नामों और वर्तनी से पैदा होने वाली संभावित विसंगतियों को किस तरह वर्गीकृत किया जाएगा, यह प्रक्रिया की विश्वसनीयता तय करने वाले प्रमुख पहलुओं में शामिल रहेगा।
जनगणना देश की आबादी का सामान्य आंकड़ा भर नहीं होती। इसके आंकड़े सरकारी योजनाओं, संसाधन आवंटन, सामाजिक नीति और विकास की प्राथमिकताओं के लिए आधार तैयार करते हैं। इसलिए इस पूरी प्रक्रिया में राजनीतिक आरोपों से अधिक महत्व डेटा की शुद्धता, पारदर्शिता और सार्वजनिक भरोसे का है।
जनगणना 2027 को लेकर कांग्रेस के आरोपों ने एक महत्वपूर्ण संस्थागत बहस को सामने ला दिया है। चार राज्यों में समय से पहले गणना, जाति संबंधी सवालों का प्रारूप और डेटा गोपनीयता जैसे मुद्दों पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना होगा।
फिलहाल उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि जनगणना की प्रक्रिया विकृत हो चुकी है या इसके पीछे कोई संदिग्ध राजनीतिक उद्देश्य सिद्ध हो गया है। लेकिन पूर्व अधिकारियों की चिंताओं और विपक्ष के सवालों को नजरअंदाज करने के बजाय सरकार के लिए बेहतर रास्ता यही होगा कि प्रक्रिया, पद्धति और डेटा सुरक्षा से जुड़े सभी पहलुओं पर सार्वजनिक रूप से पर्याप्त स्पष्टीकरण दिया जाए।
Wasi Siddiqui
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।