📍 मुंबई, महाराष्ट्र
🗓️ 19 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved
दस साल का इंतज़ार खत्म
भारत के सबसे बड़े शेयर बाजार नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई का आईपीओ आखिरकार निवेशकों के सामने आ गया है। 2016 में लिस्टिंग की प्रक्रिया शुरू करने के बाद कंपनी को नियामकीय जांच और लंबे कानूनी विवादों का सामना करना पड़ा। अब इन पुराने मामलों के निपटारे के बाद एनएसई सार्वजनिक बाजार में प्रवेश की दिशा में आगे बढ़ चुका है।
आईपीओ 17 सितंबर 2026 को खुला और 21 सितंबर तक आवेदन किया जा सकता है। 18 सितंबर तक यह इश्यू पूरी तरह सब्सक्राइब हो चुका था। प्रस्तावित लिस्टिंग 24 सितंबर के आसपास होने की जानकारी दी गई है।
एनएसई का आईपीओ इतना लंबा क्यों खिंचा?
एनएसई ने पहली बार 2016 में आईपीओ के लिए ड्राफ्ट दस्तावेज दाखिल किए थे। उस समय मौजूदा शेयरधारकों की हिस्सेदारी बेचने के जरिये करीब 10,000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना थी।
लेकिन इसी दौर में एनएसई की ट्रेडिंग व्यवस्था से जुड़े को-लोकेशन मामले ने पूरी प्रक्रिया को रोक दिया। जांच में यह सवाल उठा कि क्या कुछ ब्रोकरों को एक्सचेंज के ट्रेडिंग सिस्टम तक दूसरों की तुलना में बेहतर या तेज पहुंच मिली थी।
इसके साथ डार्क फाइबर से जुड़ा मामला भी सामने आया। इन मामलों में नियामकीय कार्रवाई, अपील और अदालतों में चलती कार्यवाही ने आईपीओ की प्रक्रिया को लंबा कर दिया।
को-लोकेशन विवाद क्या था?
को-लोकेशन का मतलब ऐसी व्यवस्था से है जिसमें ब्रोकरों के सर्वर एक्सचेंज के डेटा सेंटर के बेहद करीब रखे जाते हैं। इससे ऑर्डर एक्सचेंज के सिस्टम तक तेजी से पहुंच सकते हैं।
एनएसई के मामले में आरोप यह था कि कुछ ब्रोकरों को ट्रेडिंग सिस्टम तक ऐसी पहुंच मिली जिससे उन्हें दूसरे बाजार प्रतिभागियों की तुलना में फायदा हो सकता था। यह मामला इसलिए भी अहम था क्योंकि एनएसई खुद बाजार के बुनियादी ढांचे और ट्रेडिंग व्यवस्था का संचालन करने वाली संस्था है।
सेबी ने इस मामले में कार्रवाई की और मामला अलग-अलग न्यायिक और अपीलीय मंचों तक पहुंचा। इसी वजह से एनएसई की प्रस्तावित लिस्टिंग लंबे समय तक नियामकीय जांच के दायरे में रही।
डार्क फाइबर विवाद ने भी बढ़ाई मुश्किल
को-लोकेशन के साथ डार्क फाइबर कनेक्टिविटी से जुड़ा मामला भी एनएसई के लिए बड़ी नियामकीय चुनौती बना। इसमें कुछ बाजार प्रतिभागियों को तेज नेटवर्क कनेक्टिविटी दिए जाने को लेकर सवाल उठे।
इन मामलों के चलते केवल आर्थिक दंड का सवाल नहीं था। एक्सचेंज के गवर्नेंस, तकनीकी व्यवस्था, निगरानी और बाजार में निष्पक्ष पहुंच जैसे मुद्दे भी सामने आए।
इसी वजह से एनएसई की लिस्टिंग को सामान्य कॉरपोरेट आईपीओ की तरह आगे बढ़ाना आसान नहीं था।
2019 में सेबी की कार्रवाई
2019 में सेबी ने को-लोकेशन मामले में एनएसई को 624.89 करोड़ रुपये की राशि वापस जमा करने का निर्देश दिया था। इसके साथ ब्याज और बाजार से जुड़ी पाबंदियों का मामला भी सामने आया।
बाद में एनएसई ने इन आदेशों को चुनौती दी। मामला प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण और आगे अदालतों तक गया। इस कानूनी प्रक्रिया ने आईपीओ की राह को और लंबा किया।
2026 में बदला पूरा परिदृश्य
2026 में एनएसई के आईपीओ की तस्वीर तेजी से बदली। सेबी ने जनवरी में लिस्टिंग की दिशा में एनओसी दी। इसके बाद एनएसई ने आईपीओ प्रक्रिया को दोबारा आगे बढ़ाया।
जून 2026 में एनएसई ने नए ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस के साथ प्रक्रिया को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया। जुलाई में को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामलों के निपटारे के लिए कुल 1,491.21 करोड़ रुपये की राशि तय हुई।
एनएसई ने जुलाई के अंत तक 714.74 करोड़ रुपये की बाकी राशि सेबी को भुगतान कर दी। इससे पुराने नियामकीय विवादों के निपटारे की दिशा में बड़ा कदम पूरा हुआ।
सुप्रीम कोर्ट से भी मिली अहम राहत
सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एनएसई और सेबी के बीच संबंधित मामलों के निपटारे से जुड़े मामलों को आगे बढ़ने का रास्ता दिया। इससे एनएसई की लिस्टिंग के सामने मौजूद प्रमुख पुराने कानूनी अवरोध हटे।
हालांकि पूर्व अधिकारियों से जुड़े कुछ अलग मामलों की कानूनी स्थिति अलग रही। इसलिए सभी पुराने विवादों को एक ही प्रक्रिया का हिस्सा मानना सही नहीं होगा।
आईपीओ की सबसे अहम बात
एनएसई का मौजूदा आईपीओ पूरी तरह ऑफर फॉर सेल यानी ओएफएस है। इसका मतलब है कि एनएसई खुद नए शेयर जारी करके पैसा नहीं जुटा रहा।
इस इश्यू में मौजूदा शेयरधारक अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेच रहे हैं। आईपीओ से मिलने वाली रकम मुख्य रूप से इन्हीं बेचने वाले शेयरधारकों को जाएगी, एनएसई के कारोबार में नई पूंजी के रूप में नहीं आएगी।
आईपीओ का मूल्य और आकार
मौजूदा इश्यू का प्राइस बैंड 1,700 रुपये से 1,785 रुपये प्रति शेयर रखा गया है। कुल इश्यू करीब 22,500 करोड़ रुपये का है।
17 सितंबर से शुरू हुई बोली प्रक्रिया 21 सितंबर तक चलेगी। 18 सितंबर को इश्यू करीब 1.16 गुना सब्सक्राइब हो चुका था। संस्थागत और गैर-संस्थागत निवेशकों की मांग मजबूत रही, जबकि खुदरा श्रेणी में मांग तुलनात्मक रूप से कम रही।
एनएसई खुद अपने शेयरों की ट्रेडिंग क्यों नहीं करेगा?
एनएसई के आईपीओ की सबसे दिलचस्प बात इसकी लिस्टिंग है। आम तौर पर निवेशक एनएसई और बीएसई दोनों पर सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में कारोबार देखते हैं। लेकिन एनएसई अपने शेयरों को अपने ही ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर सूचीबद्ध नहीं करेगा।
एनएसई के शेयर बीएसई पर सूचीबद्ध होंगे और वहीं इनकी ट्रेडिंग होगी। एनएसई के प्रबंधन ने अपने शेयरों को अपने ही प्लेटफॉर्म पर ट्रेड कराने के लिए सेबी से अनुमति मांगने की बात नहीं कही है।
ऐसा क्यों है?
इसके पीछे बाजार नियमन और हितों के टकराव का सवाल है। अगर कोई एक्सचेंज अपनी ही कंपनी के शेयरों की ट्रेडिंग कराए, तो बाजार संचालन, निगरानी और उसी कंपनी के शेयरों से जुड़े कारोबारी हित एक ही व्यवस्था में आ जाते हैं।
एनएसई के शेयर बीएसई पर सूचीबद्ध होने से उसकी कीमत की खोज और ट्रेडिंग दूसरे मान्यता प्राप्त एक्सचेंज के प्लेटफॉर्म पर होगी। यह व्यवस्था बाजार निगरानी और पारदर्शिता के लिहाज से अहम है।
आईपीओ के बाद एनएसई का कारोबार कैसे चलेगा?
आईपीओ के बाद एनएसई का मूल कारोबार बदलने वाला नहीं है। एक्सचेंज पहले की तरह शेयर, डेरिवेटिव्स, करेंसी, डेट और दूसरे वित्तीय उत्पादों के लिए ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म चलाएगा।
बदलाव मुख्य रूप से कंपनी के स्वामित्व और सार्वजनिक जवाबदेही में आएगा। शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने के बाद एनएसई के वित्तीय प्रदर्शन, कॉरपोरेट गवर्नेंस और शेयरधारकों से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक बाजार के नियमों के तहत अधिक नियमित रूप से सामने आएगी।
एनएसई की तकनीकी भूमिका
एनएसई ने भारत में इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग को बड़े पैमाने पर अपनाने में अहम भूमिका निभाई। इसका इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क देश के अलग-अलग हिस्सों के बाजार प्रतिभागियों को एक साझा ट्रेडिंग व्यवस्था से जोड़ता है।
आज एनएसई का कारोबार इक्विटी से आगे बढ़कर डेरिवेटिव्स, करेंसी, डेट और दूसरे वित्तीय उत्पादों तक फैला है। एक्सचेंज की तकनीकी क्षमता उसके कारोबार का एक प्रमुख हिस्सा बनी हुई है।
एनएसई और बीएसई में बड़ा फर्क
एनएसई और बीएसई दोनों भारतीय पूंजी बाजार के प्रमुख एक्सचेंज हैं, लेकिन इनके कारोबार का ढांचा एक जैसा नहीं है।
एनएसई का डेरिवेटिव्स कारोबार लंबे समय से उसके राजस्व का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। दूसरी ओर, बीएसई का कारोबार भी पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ा है।
एनएसई के आईपीओ के बाद दोनों एक्सचेंजों के शेयर सार्वजनिक बाजार में निवेशकों के लिए उपलब्ध होंगे। इससे निवेशकों को दोनों कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन, कारोबारी मॉडल और बाजार हिस्सेदारी का अलग-अलग आकलन करने का अवसर मिलेगा।
आईपीओ से एनएसई को नई पूंजी क्यों नहीं मिलेगी?
यह सवाल भी अहम है। ओएफएस में कंपनी नए शेयर जारी नहीं करती। मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर बेचते हैं।
इसलिए इस आईपीओ से एनएसई की बैलेंस शीट में नई इक्विटी पूंजी सीधे नहीं आएगी। कंपनी की सार्वजनिक लिस्टिंग का मुख्य असर स्वामित्व के व्यापक वितरण और शेयरों के लिए सार्वजनिक बाजार बनने के रूप में होगा।
निवेशकों के लिए क्या बदलेगा?
एनएसई के शेयर सूचीबद्ध होने के बाद निवेशक रोजाना बाजार कीमत के आधार पर कंपनी का मूल्यांकन देख सकेंगे। कंपनी के वित्तीय नतीजे, कॉरपोरेट घोषणाएं और महत्वपूर्ण कारोबारी घटनाएं सार्वजनिक बाजार के नियमों के तहत सामने आएंगी।
लेकिन शेयर की बाजार कीमत कंपनी के कारोबार के साथ-साथ व्यापक बाजार धारणा, नियामकीय बदलाव और डेरिवेटिव्स कारोबार की स्थिति से भी प्रभावित होगी। रॉयटर्स के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में एनएसई का राजस्व और मुनाफा पिछले साल की तुलना में कमजोर हुआ था, जबकि डेरिवेटिव्स कारोबार से जुड़ी नियामकीय और बाजार स्थितियां भी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई हैं।
दस साल की कहानी का असल सबक
एनएसई का आईपीओ केवल एक बड़ी कंपनी की लिस्टिंग नहीं है। यह भारत के वित्तीय बाजारों में नियमन, तकनीकी बुनियादी ढांचे और कॉरपोरेट गवर्नेंस के महत्व को भी सामने लाता है।
2016 में शुरू हुई प्रक्रिया को को-लोकेशन, डार्क फाइबर, नियामकीय जांच और अदालतों में चली कार्यवाही ने लंबा खींचा। 2026 में समझौते और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद लिस्टिंग की राह खुली।
अब अगला चरण बाजार का होगा। एनएसई को सार्वजनिक कंपनी के रूप में निवेशकों, नियामकों और शेयरधारकों के सामने अपने कारोबारी प्रदर्शन और गवर्नेंस की कसौटी पर काम करना होगा।
सबसे अहम बात यह है कि एनएसई खुद शेयर बाजार का संचालन करता रहेगा, लेकिन उसके अपने शेयरों की सार्वजनिक ट्रेडिंग बीएसई पर होगी। यही व्यवस्था इस आईपीओ को भारतीय पूंजी बाजार की दूसरी बड़ी लिस्टिंग से अलग बनाती है।