गुलदाउदी की खेती किसानों के लिए तेज़ी से उभरता हुआ लाभकारी विकल्प है। उचित मौसम, वैज्ञानिक खेती और बाज़ार की मांग को ध्यान में रखकर उत्पादन करने पर अच्छी आमदनी संभव है। सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर लागत भी कम की जा सकती है।
📍 भारत
📰 01 अगस्त 2026
✍️ By kp saini
देश में पारंपरिक फसलों के साथ-साथ फूलों की व्यावसायिक खेती का रुझान लगातार बढ़ रहा है। इनमें गुलदाउदी की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प के रूप में सामने आई है। विशेषकर नवरात्रि, दशहरा, दीपावली, विवाह समारोह और धार्मिक आयोजनों के दौरान इसकी मांग तेज़ हो जाती है, जिससे बेहतर बाज़ार मूल्य मिलने की संभावना रहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसान वैज्ञानिक तरीकों से खेती करें और बाज़ार की मांग के अनुसार उत्पादन की योजना बनाएं तो सीमित भूमि से भी अच्छी आय अर्जित की जा सकती है।
गुलदाउदी ठंडे और नम मौसम में अच्छी बढ़वार करती है। लगभग 15 से 25 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके लिए उपयुक्त माना जाता है। खेत में जल निकासी बेहतर होनी चाहिए, क्योंकि पानी का ठहराव पौधों में फफूंद जनित रोगों का जोखिम बढ़ा सकता है।
दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। मिट्टी का पीएच स्तर लगभग 6.5 से 7.5 के बीच रहने पर पौधों की वृद्धि और फूलों की गुणवत्ता बेहतर रहती है।
विशेषज्ञ सितंबर से अक्टूबर के बीच रोपाई की सलाह देते हैं। रोपाई से पहले खेत की दो से तीन बार जुताई कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए।
खेत में प्रति एकड़ लगभग 15 से 20 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। लगभग एक मीटर चौड़ी क्यारियां बनाकर कलम से तैयार पौधों की रोपाई की जाती है। पौधे से पौधे की दूरी लगभग 30 सेंटीमीटर तथा कतारों के बीच 45 से 60 सेंटीमीटर का अंतर रखना बेहतर माना जाता है।
रोपाई के शुरुआती दिनों में तीन से चार दिन के अंतराल पर हल्की सिंचाई आवश्यक होती है। इसके बाद पौधों की आवश्यकता और मौसम के अनुसार सिंचाई की जानी चाहिए।
बेहतर उत्पादन के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग महत्वपूर्ण माना जाता है। स्थानीय कृषि विशेषज्ञ या कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह के अनुसार उर्वरकों की मात्रा तय करना अधिक उपयुक्त रहता है।
गुलदाउदी में सफेद मक्खी और माहू जैसे कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं। शुरुआती अवस्था में इनकी निगरानी करना जरूरी है। जैविक विकल्प के रूप में नीम आधारित उत्पादों का उपयोग कई परिस्थितियों में सहायक माना जाता है।
फफूंद जनित रोगों से बचाव के लिए खेत में जल निकासी बेहतर रखना और संक्रमित पौधों को समय पर हटाना आवश्यक है। आवश्यकता पड़ने पर कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित दवाओं का ही उपयोग करना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार पौधों की नियमित कटिंग और पिंचिंग करने से पौधा झाड़ीदार बनता है। इससे शाखाओं की संख्या बढ़ती है और अधिक फूल विकसित होते हैं।
उचित देखभाल से फूलों का आकार, गुणवत्ता और बाज़ार मूल्य बेहतर होने की संभावना रहती है।
भारत में धार्मिक आयोजनों, विवाह समारोहों और त्योहारों के दौरान गुलदाउदी की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जाती है। इस कारण किसान यदि उत्पादन का समय बाज़ार की मांग के अनुरूप तय करें तो बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकते हैं।
हालांकि आय पूरी तरह उत्पादन, गुणवत्ता, स्थानीय मंडी के भाव, परिवहन लागत और विपणन व्यवस्था पर निर्भर करती है। कई कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अनुकूल परिस्थितियों में एक एकड़ से अच्छी आय संभव है, लेकिन हर क्षेत्र में समान कमाई की गारंटी नहीं दी जा सकती।
केंद्र सरकार की एकीकृत बागवानी विकास मिशन (MIDH) के तहत पात्र किसानों को फूलों की खेती के लिए विभिन्न राज्यों में निर्धारित मानकों के अनुसार वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
उत्तर प्रदेश में उद्यान विभाग विभिन्न योजनाओं के माध्यम से फल, फूल और सब्जियों की उन्नत खेती, पॉलीहाउस, नर्सरी और संरक्षित खेती के लिए अलग-अलग श्रेणियों में अनुदान उपलब्ध कराता है। मुख्यमंत्री राज्य उद्यानिक विकास योजना के अंतर्गत भी पात्र किसानों को निर्धारित नियमों के अनुसार सहायता दी जाती है।
किसानों को आवेदन से पहले अपने जिले के उद्यान विभाग या कृषि अधिकारी से पात्रता, अनुदान की राशि और वर्तमान दिशा-निर्देश की पुष्टि कर लेनी चाहिए।
गुलदाउदी की खेती लाभदायक अवश्य मानी जाती है, लेकिन इसकी सफलता केवल उत्पादन पर निर्भर नहीं करती। बाज़ार तक पहुंच, समय पर बिक्री, गुणवत्ता, मौसम और परिवहन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
यदि किसान बिना बाज़ार की योजना बनाए बड़े स्तर पर खेती शुरू करते हैं तो उन्हें मूल्य में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए खेती शुरू करने से पहले स्थानीय मांग, मंडी व्यवस्था और खरीदारों की उपलब्धता का आकलन करना जरूरी है।
फ्लोरीकल्चर का क्षेत्र देश में लगातार विस्तार कर रहा है। धार्मिक उपयोग, सजावट, होटल उद्योग और इवेंट सेक्टर में फूलों की मांग बढ़ने से व्यावसायिक खेती की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।
सरकारी प्रोत्साहन, आधुनिक तकनीक और बेहतर विपणन व्यवस्था के साथ गुलदाउदी की खेती आने वाले वर्षों में किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
गुलदाउदी की खेती उन किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प हो सकती है जो पारंपरिक खेती के साथ अतिरिक्त आय का स्रोत विकसित करना चाहते हैं। सही किस्म का चयन, वैज्ञानिक खेती, समय पर रोपाई, संतुलित पोषण, बेहतर कीट प्रबंधन और बाज़ार की समझ इस खेती की सफलता की प्रमुख शर्तें हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर लागत कम की जा सकती है, लेकिन निवेश से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञों और उद्यान विभाग से सलाह लेना आवश्यक है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।