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फूलों की खेती से विदेशी बाजार तक: भारत में बढ़ता Flower Export कारोबार
Asif Khan
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2026-09-04 20:21:57
भारत का पुष्प निर्यात कारोबार बढ़ रहा है। गुलाब से लेकर जर्बेरा और कार्नेशन तक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में गुणवत्ता, पैकिंग, प्रमाणन और कोल्ड चेन निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
📍Delhi 🗓️ 4 Sep 2026 ✍️Asif khan
फूलों की खेती से विदेशी बाजार तक पहुंच रहा भारत, निर्यात कारोबार में बढ़ रहे अवसर
भारत में फूलों की खेती धीरे-धीरे पारंपरिक कृषि से आगे बढ़कर संगठित व्यावसायिक गतिविधि का रूप ले रही है। गुलाब, कार्नेशन, गुलदाउदी, जर्बेरा और ग्लैडियोलस जैसे कट फूलों के साथ बल्ब, कंद, जीवित पौधे, कटिंग और सजावटी वनस्पति उत्पाद भी अंतरराष्ट्रीय कारोबार का हिस्सा हैं।
कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानी एपीडा के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 22,184.17 मीट्रिक टन पुष्पकृषि उत्पादों का निर्यात किया और इनकी कीमत करीब 92.55 मिलियन अमेरिकी डॉलर रही। अमेरिका, नीदरलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन और कनाडा भारतीय पुष्पकृषि उत्पादों के प्रमुख आयातकों में शामिल रहे।
पुष्पकृषि अब केवल सजावटी खेती नहीं
भारत के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में फूलों की विभिन्न किस्मों की खेती की जाती है। एपीडा के अनुसार देश में गुलाब, ट्यूबरोज, ग्लैडियोलस, एंथुरियम, कार्नेशन और गेंदा समेत अनेक फूलों का उत्पादन होता है। आधुनिक पुष्पकृषि में खुले खेतों के साथ पॉलीहाउस और ग्रीनहाउस जैसी नियंत्रित परिस्थितियों का भी इस्तेमाल किया जाता है।
2024-25 के उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में पुष्पकृषि का क्षेत्र लगभग 397.89 हजार हेक्टेयर था। इसी अवधि में ढीले फूलों का उत्पादन लगभग 3,226.20 हजार टन और कट फूलों का उत्पादन लगभग 1,039.29 हजार टन दर्ज किया गया।
आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल देश के प्रमुख पुष्प उत्पादन क्षेत्रों में शामिल हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना में भी पुष्पकृषि का विस्तार हुआ है।
निर्यात में कट फूलों की अहम भूमिका
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कट फूलों की गुणवत्ता सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है। गुलाब, कार्नेशन, गुलदाउदी, जर्बेरा और ग्लैडियोलस जैसी किस्मों के लिए डंठल की लंबाई, फूल की अवस्था, रंग, आकार, ताजगी और एकरूपता खरीदार की आवश्यकताओं के अनुसार तय की जाती है।
किसान या उत्पादक के लिए केवल अधिक उत्पादन पर्याप्त नहीं है। निर्यात बाजार में वह उत्पाद अधिक मूल्य प्राप्त करता है जो तय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हो और खेत से खरीदार तक कम से कम गुणवत्ता हानि के साथ पहुंच सके।
इसी वजह से आधुनिक पुष्पकृषि में खेती के साथ ग्रेडिंग, पैकिंग, प्री-कूलिंग, तापमान प्रबंधन और परिवहन व्यवस्था का महत्व बढ़ गया है।
पॉलीहाउस से बेहतर गुणवत्ता का प्रयास
कट फूलों की निर्यात-केंद्रित खेती में नियंत्रित वातावरण वाली संरचनाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं। पॉलीहाउस या ग्रीनहाउस के माध्यम से तापमान, नमी, सिंचाई और अन्य उत्पादन परिस्थितियों को अधिक नियंत्रित करने का अवसर मिलता है।
हालांकि हर किसान के लिए पॉलीहाउस अनिवार्य नहीं माना जा सकता। इसकी उपयोगिता फूल की किस्म, स्थानीय जलवायु, निवेश क्षमता, बाजार और खरीदार की गुणवत्ता आवश्यकताओं पर निर्भर करती है।
एपीडा के अनुसार भारत में ग्रीनहाउस और अन्य नियंत्रित परिस्थितियों में व्यावसायिक पुष्पकृषि का विस्तार हुआ है।
खेत से निर्यात तक सबसे महत्वपूर्ण है गुणवत्ता प्रबंधन
ताजे फूल अत्यधिक नाजुक कृषि उत्पाद हैं। कटाई के बाद समय बीतने के साथ उनकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए कटाई का सही समय, साफ-सफाई, उचित ग्रेडिंग और तेज लॉजिस्टिक व्यवस्था निर्यात कारोबार में महत्वपूर्ण हो जाती है।
फूलों को बाजार या निर्यातक तक पहुंचाने से पहले आकार, डंठल, रंग और फूल की अवस्था के आधार पर अलग-अलग ग्रेड में रखा जा सकता है। पैकिंग में वेंटिलेशन, नमी नियंत्रण और उत्पाद की सुरक्षा पर ध्यान देना आवश्यक होता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी एक तापमान को सभी फूलों के लिए सार्वभौमिक नियम नहीं माना जा सकता। प्री-कूलिंग और भंडारण की वास्तविक परिस्थितियां फूल की प्रजाति, किस्म और खरीदार के तकनीकी मानकों के अनुसार तय की जानी चाहिए।
निर्यात शुरू करने से पहले पंजीकरण और अनुपालन
किसी किसान, उत्पादक संगठन या व्यवसाय के लिए सीधे विदेशी बाजार में प्रवेश करने से पहले निर्यात संबंधी अनुपालन समझना जरूरी है।
निर्यात कारोबार के लिए आयातक-निर्यातक कोड यानी आईईसी की आवश्यकता होती है। विदेश व्यापार महानिदेशालय के दस्तावेजों के अनुसार आईईसी एक 10-अंकीय कोड है और निर्यात-आयात गतिविधियों के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
पुष्पकृषि एपीडा के दायरे में आने वाले उत्पादों में शामिल है। एपीडा के अनुसार निर्यातक आईईसी प्राप्त करने के बाद डीजीएफटी पोर्टल के माध्यम से ई-आरसीएमसी के लिए आवेदन कर सकते हैं।
यानी निर्यातक के लिए केवल फूल उगाना पर्याप्त नहीं है। कारोबारी पंजीकरण, उत्पाद संबंधी नियम, खरीदार देश की आवश्यकताएं और सीमा शुल्क संबंधी दस्तावेजों की जानकारी भी जरूरी है।
फाइटोसैनिटरी प्रमाणपत्र क्यों महत्वपूर्ण है
पौधों और पौध-आधारित उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आयातक देश के पौध स्वास्थ्य संबंधी नियम महत्वपूर्ण होते हैं। कई बाजारों में उत्पाद के साथ फाइटोसैनिटरी आवश्यकताओं का पालन करना पड़ता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भेजे जा रहे पौध उत्पाद संबंधित आयातक देश की निर्धारित पौध स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करें।
इसलिए किसी भी निर्यातक को शिपमेंट से पहले लक्षित देश की वर्तमान आयात आवश्यकताओं की जांच करनी चाहिए। एक ही फूल या पौध उत्पाद के लिए अलग-अलग देशों में नियम अलग हो सकते हैं।
निर्यात के लिए दस्तावेजी तैयारी
एक सामान्य निर्यात शिपमेंट में वाणिज्यिक चालान, पैकिंग सूची, शिपिंग बिल और परिवहन संबंधी दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं। जरूरत के अनुसार मूल प्रमाणपत्र और अन्य नियामकीय प्रमाणपत्र भी शामिल हो सकते हैं।
फूलों की ताजा खेप के मामले में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए खरीददार के साथ पहले से यह तय करना जरूरी है कि उत्पाद किस ग्रेड, किस पैकिंग, किस मात्रा और किस डिलीवरी शर्त के तहत स्वीकार किया जाएगा।
निर्यातक को भुगतान की शर्तों पर भी स्पष्टता रखनी चाहिए। नए खरीदार के मामले में भुगतान जोखिम का मूल्यांकन करना कारोबार की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
भारत के लिए प्रमुख विदेशी बाजार
एपीडा के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में अमेरिका, नीदरलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन और कनाडा भारतीय पुष्पकृषि के प्रमुख आयातक रहे। इटली और मलेशिया भी प्रमुख बाजारों की सूची में शामिल रहे।
इन बाजारों की जरूरतें एक जैसी नहीं होतीं। यूरोपीय बाजार में गुणवत्ता, निरंतर आपूर्ति और अनुपालन का महत्व अधिक हो सकता है, जबकि खाड़ी क्षेत्र में फूलों की मांग खुदरा, आतिथ्य, शादी और आयोजन जैसे क्षेत्रों से जुड़ सकती है।
इसलिए निर्यातक के लिए पहले बाजार चुनना और फिर उसी बाजार की मांग के अनुसार फूल की किस्म, उत्पादन और पैकिंग तय करना अधिक व्यावहारिक रणनीति हो सकती है।
मावल और अन्य उत्पादन क्लस्टर
भारत में कुछ क्षेत्रों ने विशेष रूप से उच्च गुणवत्ता वाले कट फूलों के उत्पादन और निर्यात के लिए पहचान बनाई है। महाराष्ट्र का पुणे-मावल क्षेत्र गुलाब उत्पादन और निर्यात गतिविधियों के संदर्भ में चर्चा में रहा है।
लेकिन निर्यात क्षमता किसी एक राज्य या जिले तक सीमित नहीं है। एपीडा के आंकड़े बताते हैं कि देश के कई राज्यों में व्यावसायिक पुष्पकृषि विकसित हो रही है।
पूर्वोत्तर भारत से भी बढ़ी संभावना
भारत के पुष्प निर्यात में नए भौगोलिक क्षेत्रों की भागीदारी का एक उदाहरण मिजोरम से एंथुरियम का सिंगापुर निर्यात है।
मार्च 2025 में एपीडा और मिजोरम के बागवानी विभाग के सहयोग से आइजोल से सिंगापुर के लिए एंथुरियम फूलों की पहली खेप रवाना की गई थी। यह घटना पूर्वोत्तर क्षेत्र की पुष्पकृषि क्षमता को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी।
इस तरह के उदाहरण बताते हैं कि उपयुक्त उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण और निर्यात लॉजिस्टिक उपलब्ध होने पर नए क्षेत्र भी अंतरराष्ट्रीय पुष्प बाजार से जुड़ सकते हैं।
किसानों के लिए अवसर के साथ जोखिम भी
पुष्पकृषि को उच्च मूल्य वाली कृषि गतिविधि के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसे बिना बाजार अध्ययन के शुरू करना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
फूलों की कीमत मौसम, त्योहार, मांग, परिवहन लागत, निर्यात ऑर्डर और गुणवत्ता के आधार पर बदल सकती है। ताजे फूलों में खराब होने का जोखिम भी अधिक होता है।
इसलिए बड़े निवेश से पहले खरीदार की मांग, स्थानीय मंडी, निर्यातक की खरीद शर्तें, फसल चक्र, पानी की उपलब्धता, श्रम लागत और लॉजिस्टिक खर्च का आकलन जरूरी है।
छोटे किसानों के लिए क्लस्टर मॉडल उपयोगी हो सकता है
छोटे और सीमांत किसान अकेले अंतरराष्ट्रीय बाजार की सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। ऐसे में किसान उत्पादक संगठन, सहकारी व्यवस्था या संगठित निर्यातक के साथ अनुबंध आधारित आपूर्ति मॉडल उपयोगी हो सकता है।
क्लस्टर स्तर पर ग्रेडिंग, पैकिंग, प्री-कूलिंग और परिवहन जैसी सुविधाएं साझा करने से बुनियादी ढांचे की लागत को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने की संभावना बन सकती है।
सूखे फूल भी एक वैकल्पिक बाजार
ताजे फूलों की तुलना में सूखे और सजावटी वनस्पति उत्पादों की लॉजिस्टिक जरूरतें अलग होती हैं। सूखे फूल, बीज-फली, सजावटी घास और अन्य वनस्पति उत्पाद कुछ विशेष अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग बना सकते हैं।
हालांकि इनके लिए भी आयातक देश के पौध स्वास्थ्य, प्रसंस्करण, पैकिंग और सीमा शुल्क नियमों की जांच आवश्यक है।
निर्यात कारोबार की असली चुनौती
भारत के लिए चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप लगातार गुणवत्ता उपलब्ध कराना है।
किसान को यह समझना होगा कि निर्यात का कारोबार खेत से शुरू होकर ग्राहक के बाजार तक चलता है। सही किस्म का चुनाव, समय पर कटाई, गुणवत्ता नियंत्रण, सुरक्षित पैकिंग, प्रमाणन और तेज लॉजिस्टिक—इन सभी कड़ियों में कमजोरी होने पर पूरी खेप प्रभावित हो सकती है।
एपीडा के उपलब्ध आंकड़ों में वित्त वर्ष 2025-26 के पुष्पकृषि निर्यात का मूल्य 92.55 मिलियन अमेरिकी डॉलर दर्ज है। इससे पता चलता है कि भारत पहले से ही वैश्विक पुष्प व्यापार में मौजूद है, लेकिन आगे की वृद्धि के लिए गुणवत्ता और बाजार-केंद्रित उत्पादन महत्वपूर्ण रहेगा।
आगे क्या?
भारत में पुष्पकृषि के लिए घरेलू और विदेशी दोनों बाजार मौजूद हैं। बढ़ते शहरीकरण, आयोजन उद्योग, आतिथ्य क्षेत्र और सजावटी उत्पादों की मांग इसके बाजार को समर्थन दे सकती है।
लेकिन निर्यात-केंद्रित खेती शुरू करने वाले किसान या उद्यमी के लिए पहला कदम केवल पॉलीहाउस बनाना या महंगी किस्म खरीदना नहीं होना चाहिए। बेहतर तरीका यह है कि पहले लक्षित बाजार, खरीदार की गुणवत्ता जरूरत, संभावित कीमत, लॉजिस्टिक लागत और नियामकीय आवश्यकताओं का अध्ययन किया जाए।
इसके बाद उपयुक्त फूल और किस्म का चयन, उत्पादन योजना, पोस्ट-हार्वेस्ट व्यवस्था और निर्यात साझेदार तय किए जाएं।
भारत की पुष्पकृषि में संभावनाएं निश्चित रूप से मौजूद हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिकाऊ सफलता का आधार उत्पादन की मात्रा से ज्यादा गुणवत्ता, विश्वसनीय आपूर्ति, प्रमाणन और समय पर डिलीवरी है।
Asif Khan
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।