अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने कहा है कि नए एच-1बी वीजा पर 1 लाख डॉलर शुल्क अमेरिकी कंपनियों को काम विदेश भेजने के लिए प्रेरित कर सकता है। उनका कहना है कि महंगा शुल्क ग्लोबल टैलेंट आकर्षित करने की अमेरिकी क्षमता और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकता है, खासकर टेक सेक्टर में।
भारतीय-अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने चेतावनी दी है कि नए एच-1बी वीजा पर 1 लाख डॉलर का शुल्क अमेरिकी कंपनियों को कुछ काम विदेश भेजने के लिए प्रेरित कर सकता है। इलिनॉय से डेमोक्रेट सांसद कृष्णमूर्ति ने कहा कि कंपनियों के सामने ऐसी स्थिति बन सकती है जहां वे विदेशी विशेषज्ञों को अमेरिका लाने के बजाय काम को दूसरे देशों में ट्रांसफर करने का फैसला करें।
कृष्णमूर्ति ने यह टिप्पणी कानूनी इमिग्रेशन और एच-1बी प्रोग्राम में मौजूद बाधाओं पर चर्चा के दौरान की। उनके मुताबिक, अमेरिका को दुनिया के बेहतरीन स्किल्ड प्रोफेशनल्स को आकर्षित करने की जरूरत है, चाहे वे भारत, चीन, स्वीडन या किसी दूसरे देश से आते हों।
अमेरिकी प्रशासन ने सितंबर 2025 में नए एच-1बी वर्कर्स के लिए 1 लाख डॉलर के शुल्क की व्यवस्था घोषित की थी। कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस के अनुसार, यह शुल्क मुख्य रूप से उन नए एच-1बी कर्मचारियों से संबंधित है जो अमेरिका के बाहर हैं और जिनके लिए नया एच-1बी पेटिशन दाखिल किया जा रहा है। मौजूदा एच-1बी वीजा, सामान्य रिन्यूअल और अमेरिका के भीतर स्टेटस बदलने वाले कई मामलों पर यह शुल्क लागू नहीं होता।
इस अंतर को समझना जरूरी है। 1 लाख डॉलर का शुल्क हर एच-1बी धारक से सालाना वसूला जाने वाला सामान्य वीजा शुल्क नहीं है। यह नई नियुक्तियों से जुड़ी एक असाधारण लागत है, जिसे नियोक्ता को कुछ परिस्थितियों में वहन करना पड़ता है।
कृष्णमूर्ति के मुताबिक, अमेरिकी कंपनियों के सामने मूल सवाल यह है कि वे प्रतिभा को अमेरिका में लाएं या काम को विदेश भेज दें। उन्होंने तर्क दिया कि कंपनियां अपना काम बंद करके नहीं बैठेंगी। यदि अमेरिका में विशेषज्ञ कर्मचारी लाना ज्यादा महंगा हो जाता है, तो कुछ कंपनियां विदेश में मौजूद टीमों और ऑपरेशंस का इस्तेमाल बढ़ा सकती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी इकोनॉमी की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता दुनिया के बेहतरीन टैलेंट को आकर्षित करने की क्षमता से जुड़ी है। उनके मुताबिक, अत्यधिक शुल्क टेक्निकल और स्पेशलाइज्ड भूमिकाओं में काम करने वाले प्रोफेशनल्स को अमेरिका आने या वहां बने रहने के फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित कर सकता है।
यह सांसद का राजनीतिक और नीतिगत आकलन है। उपलब्ध रिपोर्टिंग से यह साबित नहीं होता कि शुल्क के कारण कितनी अमेरिकी नौकरियां वास्तव में विदेश जाएंगी।
एच-1बी प्रोग्राम भारतीय टेक प्रोफेशनल्स के लिए खास महत्व रखता है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024 में भारतीय नागरिकों को सभी एच-1बी वीजा में लगभग 71 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली थी।
इसलिए अमेरिका की एच-1बी पॉलिसी में बड़ा बदलाव भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, टेक कंपनियों और अमेरिका-भारत आर्थिक रिश्तों के लिए अहम है।
कृष्णमूर्ति ने भी इस पहलू पर जोर दिया। उनका कहना है कि मुद्दा केवल भारतीय नागरिकों का नहीं है। उनके अनुसार, अमेरिका की प्रतिस्पर्धा इस बात पर निर्भर करती है कि वह दुनिया भर से उच्च-कौशल वाले लोगों को कितना आकर्षित कर पाता है।
एच-1बी प्रोग्राम का इस्तेमाल उन स्पेशलिटी ऑक्यूपेशन के लिए होता है जिनमें विशेष ज्ञान और उच्च स्तर की विशेषज्ञता की जरूरत होती है। टेक्नोलॉजी और कंसल्टिंग कंपनियां लंबे समय से इस प्रोग्राम की प्रमुख उपयोगकर्ता रही हैं।
टेक इंडस्ट्री में प्रोजेक्ट आधारित काम, ग्लोबल टीम और रिमोट ऑपरेशंस पहले से व्यापक हैं। ऐसे माहौल में अमेरिका में किसी कर्मचारी को लाने की अतिरिक्त लागत और उसी काम को दूसरे देश से कराने की लागत के बीच अंतर कंपनियों के फैसले को प्रभावित कर सकता है।
यही कृष्णमूर्ति की चिंता का केंद्रीय बिंदु है। उनका तर्क है कि अगर अमेरिकी पॉलिसी विदेशी विशेषज्ञों की नियुक्ति को अत्यधिक महंगा बनाती है, तो कुछ काम अमेरिका के बजाय दूसरे देशों में किया जा सकता है।
एच-1बी शुल्क के समर्थन में ट्रंप प्रशासन का तर्क अलग है। 2025 की राष्ट्रपति घोषणा में प्रशासन ने एच-1बी प्रोग्राम के दुरुपयोग, अमेरिकी कर्मचारियों के संभावित विस्थापन और राष्ट्रीय तथा आर्थिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों का हवाला दिया था।
सरकार की पॉलिसी का एक मकसद यह भी है कि कंपनियां कम लागत वाले विदेशी श्रम पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय उच्च-कौशल और उच्च-वेतन वाली भूमिकाओं के लिए एच-1बी प्रोग्राम का इस्तेमाल करें।
इसलिए मौजूदा बहस में दो अलग नज़रिए सामने हैं। एक पक्ष अमेरिकी कर्मचारियों और वेतन की सुरक्षा पर जोर देता है। दूसरा पक्ष ग्लोबल टैलेंट, इनोवेशन और अमेरिकी कंपनियों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता देता है।
यह सवाल अभी खुला हुआ है। कृष्णमूर्ति ने ऑफशोरिंग का जोखिम बताया है, लेकिन उनके बयान को भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई पुष्ट आंकड़ा नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि 1 लाख डॉलर शुल्क के कारण कितनी अमेरिकी नौकरियां विदेश जाएंगी।
कंपनियों की प्रतिक्रिया सेक्टर, नौकरी की प्रकृति, कर्मचारी की विशेषज्ञता और अमेरिका के बाहर उपलब्ध वैकल्पिक प्रतिभा पर निर्भर करेगी।
जहां किसी भूमिका के लिए अत्यधिक दुर्लभ विशेषज्ञता जरूरी है, वहां कंपनी शुल्क को लागत के रूप में स्वीकार कर सकती है। दूसरी तरफ, जिन कामों को आसानी से दूसरे देशों में ट्रांसफर किया जा सकता है, वहां ऑफशोरिंग का विकल्प अधिक आकर्षक हो सकता है।
कृष्णमूर्ति ने कहा कि अमेरिका को अपनी कानूनी इमिग्रेशन सिस्टम में सुधार करना चाहिए। उनके अनुसार, ऐसी नीतियां नहीं बननी चाहिए जो उच्च-कौशल वाले लोगों को अमेरिका से दूर करें और कंपनियों को काम विदेश भेजने के लिए प्रेरित करें।
कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस ने भी 1 लाख डॉलर शुल्क को लेकर अमेरिकी कंपनियों की चिंताओं का उल्लेख किया है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ कारोबारी और संस्थागत समूहों ने चिंता जताई कि शुल्क कठिन पदों के लिए कर्मचारियों की भर्ती को मुश्किल बना सकता है और अमेरिकी प्रतिस्पर्धा पर असर डाल सकता है।
इससे बहस केवल इमिग्रेशन तक सीमित नहीं रहती। मामला अमेरिकी इंडस्ट्री पॉलिसी, टेक्नोलॉजी स्ट्रैटेजी और ग्लोबल टैलेंट मार्केट से भी जुड़ जाता है।
भारतीय प्रोफेशनल्स एच-1बी प्रोग्राम के सबसे बड़े लाभार्थियों में हैं। इसलिए अमेरिकी शुल्क और इमिग्रेशन नियमों में बदलाव का असर भारतीय आईटी इंडस्ट्री और अमेरिका में काम करने की योजना बना रहे पेशेवरों पर पड़ सकता है।
अगर अमेरिकी कंपनियां कुछ काम भारत जैसे देशों में ट्रांसफर करती हैं, तो भारत के आईटी और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर सेक्टर को नए अवसर मिल सकते हैं। लेकिन यह अभी एक संभावित आर्थिक असर है, स्थापित तथ्य नहीं।
दूसरी तरफ, यदि अमेरिकी कंपनियां महंगे शुल्क के बावजूद अमेरिका में ही हाई-स्किल कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं, तो भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिकी बाजार में प्रवेश की लागत बढ़ सकती है।
अमेरिका में एच-1बी पॉलिसी पहले से व्यापक बदलावों के दौर में है। शुल्क के अलावा चयन प्रक्रिया, वेटिंग, सिक्योरिटी स्क्रीनिंग और अन्य इमिग्रेशन नियमों में भी बदलाव किए गए हैं या प्रस्तावित किए गए हैं। कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस ने इन बदलावों को एच-1बी प्रोग्राम के व्यापक पुनर्गठन के संदर्भ में दर्ज किया है।
आने वाले समय में अमेरिकी कंपनियों की भर्ती रणनीति सबसे अहम संकेत देगी। अगर कंपनियां अमेरिका के बाहर अधिक टेक्निकल और बैक-ऑफिस ऑपरेशंस बढ़ाती हैं, तो कृष्णमूर्ति की आशंका को कुछ हद तक समर्थन मिल सकता है।
अगर कंपनियां इसके बजाय घरेलू अमेरिकी टैलेंट में निवेश बढ़ाती हैं और हाई-स्किल विदेशी कर्मचारियों के लिए शुल्क को स्वीकार करती हैं, तो ट्रंप प्रशासन की पॉलिसी का उद्देश्य मजबूत हो सकता है।
एच-1बी शुल्क पर अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति की चेतावनी ने अमेरिकी इमिग्रेशन पॉलिसी की एक बुनियादी चुनौती सामने रखी है। अमेरिका एक तरफ विदेशी विशेषज्ञों पर निर्भरता घटाकर घरेलू कर्मचारियों को प्राथमिकता देना चाहता है, वहीं उसे ग्लोबल टैलेंट और टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा में अपनी बढ़त भी बनाए रखनी है।
1 लाख डॉलर का शुल्क कंपनियों की लागत बढ़ाता है, लेकिन इससे कितनी नौकरियां विदेश जाएंगी, इसका अभी कोई पुष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। वास्तविक असर कंपनियों के भर्ती फैसलों, अमेरिकी लेबर मार्केट और ग्लोबल टेक सप्लाई चेन के अगले कदमों से सामने आएगा।
भारत के लिए यह बहस खास अहमियत रखती है, क्योंकि भारतीय प्रोफेशनल्स एच-1बी प्रोग्राम में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं। आने वाले महीनों में अमेरिका की इमिग्रेशन पॉलिसी और भारतीय टेक इंडस्ट्री की रणनीति, दोनों पर करीब से नज़र रखना जरूरी होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।