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हींग की खेती कैसे और कहां की जाती है? जानिए भारत में इस महंगे मसाले की पूरी कहानी

Neelam Saini 2026-09-04 19:47:10
हींग की खेती कैसे और कहां की जाती है? जानिए भारत में इस महंगे मसाले की पूरी कहानी

हींग की खेती कैसे और कहां की जाती है? जानिए पूरी कहानी

भारतीय रसोई में हींग की मात्रा भले ही चुटकी भर होती है, लेकिन इसकी खुशबू और स्वाद कई व्यंजनों की पहचान बन जाते हैं। दाल के तड़के से लेकर सब्जियों और कई पारंपरिक पकवानों तक इसका इस्तेमाल किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि जिस देश में हींग की खपत बड़े पैमाने पर होती है, वहां इसकी व्यावसायिक खेती लंबे समय तक नहीं होती थी।

हींग वास्तव में किसी पेड़ या सामान्य मसाला पौधे की पत्तियों से नहीं मिलती। इसे फेरुला अस्सा-फोएटिडा नाम के पौधे की मोटी जड़ से निकलने वाली ओलियो-गम रेजिन से तैयार किया जाता है। यह पौधा मूल रूप से ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के कुछ शुष्क इलाकों में पाया जाता है। पौधे को ठंडी और शुष्क जलवायु पसंद है, इसलिए भारतीय हिमालय के कुछ ठंडे रेगिस्तानी इलाके इसके लिए अनुकूल माने गए हैं। 

हींग का पौधा कैसा होता है?

हींग का पौधा वैज्ञानिक रूप से फेरुला अस्सा-फोएटिडा के नाम से जाना जाता है। यह एपिएसी कुल का बहुवर्षीय पौधा है। इसकी सबसे अहम विशेषता इसकी मोटी और मांसल जड़ है, जिसमें पौधा अपनी ऊर्जा और पोषक पदार्थों का बड़ा हिस्सा जमा करता है। इसी जड़ से निकलने वाली दूधिया या गोंद जैसी राल को आगे संसाधित करके बाजार में इस्तेमाल होने वाली हींग तैयार की जाती है। वैज्ञानिक स्रोतों के अनुसार कच्ची हींग मूलतः इसी ओलियो-गम रेजिन का उत्पाद है। 

हींग की खेती के लिए कैसी जलवायु चाहिए?

हींग की खेती सामान्य मैदानी कृषि जैसी नहीं है। इसके लिए ठंडी, शुष्क और कम नमी वाली जलवायु अधिक उपयुक्त मानी जाती है।
सीएसआईआर-हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान के अनुसार, ठंड के साथ पर्याप्त धूप भी इस फसल के लिए जरूरी है। इसी वजह से भारतीय हिमालय के ठंडे रेगिस्तानी इलाके हींग की खेती के लिए संभावित क्षेत्र के तौर पर पहचाने गए। बहुत अधिक नमी और पानी का ठहराव इस पौधे के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। अच्छी जल निकासी वाली भूमि इसकी जड़ों के विकास के लिए महत्वपूर्ण है।

भारत में सबसे पहले कहां शुरू हुई खेती?

भारत में हींग की खेती की कहानी हिमाचल प्रदेश के लाहौल घाटी से शुरू होती है।

सीएसआईआर-आईएचबीटी ने भारतीय परिस्थितियों में हींग की खेती शुरू करने के लिए ईरान से बीज मंगाए। इन बीजों को आईसीएआर-राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो यानी एनबीपीजीआर के माध्यम से नियामकीय प्रक्रिया के बाद भारत लाया गया।संस्थान के अनुसार, २०१८ में ईरान से छह एक्सेशन के बीज भारत लाए गए थे। इसके बाद लाहौल-स्पीति में पौध तैयार करने और अनुकूलन के परीक्षण किए गए। इसके बाद १५ अक्टूबर २०२० को लाहौल घाटी के क्वारिंग गांव में किसान के खेत पर हींग का पहला पौधा लगाया गया, जिसे भारत में इसकी खेती की शुरुआत के महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में दर्ज किया गया। 

बीज से पौधा तैयार करना आसान नहीं

हींग की खेती में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक इसके बीजों का आसानी से अंकुरित न होना है। इसके बीजों में प्राकृतिक सुप्तावस्था यानी डॉरमेंसी पाई जाती है। सीएसआईआर-आईएचबीटी के वैज्ञानिकों ने इस समस्या पर काम करके अंकुरण की तकनीक विकसित की। वैज्ञानिक साहित्य के अनुसार, बीजों की सुप्तावस्था तोड़ने के लिए विशेष ठंड उपचार जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि किसान के लिए सीधे बाजार से कोई सामान्य बीज खरीदकर हींग की व्यावसायिक खेती शुरू कर देना उचित नहीं है। प्रमाणित और उपयुक्त रोपण सामग्री तथा स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह महत्वपूर्ण है।

कब बोए जाते हैं हींग के बीज?

उपलब्ध कृषि तकनीकी जानकारी के अनुसार ठंडे हिमालयी क्षेत्रों में हींग के बीजों की बुवाई सर्दियों से पहले की जा सकती है और अगले वसंत में बर्फ पिघलने के बाद अंकुरण दिखाई दे सकता है। सीएसआईआर से प्रकाशित जानकारी के मुताबिक कुछ भारतीय परिस्थितियों में बीजों की बुवाई अक्टूबर-नवंबर में की जाती है। पौधों के बीच लगभग ०.७५ से १ मीटर और कतारों के बीच करीब १ से १.५ मीटर दूरी रखने की जानकारी भी दी गई है। हालांकि वास्तविक बुवाई का समय, दूरी और बीज उपचार स्थानीय मौसम, क्षेत्र और उपलब्ध कृषि तकनीक के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए किसान को संबंधित कृषि विभाग या अधिकृत तकनीकी संस्थान की अनुशंसा को प्राथमिकता देनी चाहिए।

किस तरह की मिट्टी चाहिए?

हींग के पौधे को ऐसी भूमि चाहिए जहां पानी जमा न हो और जड़ों को पर्याप्त हवा मिल सके। उपलब्ध शोध में अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट या हल्की मिट्टी को उपयुक्त बताया गया है। पौधा अपेक्षाकृत कमजोर भूमि में भी उग सकता है, लेकिन जलभराव वाली जमीन इसकी खेती के लिए चुनौती बन सकती है। यानी खेत का चुनाव करते समय सिर्फ जमीन की उपलब्धता नहीं, बल्कि जल निकासी, धूप, तापमान और स्थानीय जलवायु को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

हींग की फसल में क्यों लगता है लंबा समय?

हींग उन फसलों में शामिल है जिनके लिए किसान को धैर्य रखना पड़ता है। यह कोई ऐसी फसल नहीं है जिसे कुछ महीनों में काटकर बाजार में बेच दिया जाए। सीएसआईआर और भारत सरकार की वैज्ञानिक जानकारी के अनुसार, पौधे की जड़ों में ओलियो-गम रेजिन बनने में लगभग पांच वर्ष लग सकते हैं। यही लंबा इंतजार हींग की खेती को सामान्य मसाला फसलों से अलग बनाता है। पौधे की शुरुआती देखभाल, उचित जल निकासी, ठंडे मौसम और सही कृषि प्रबंधन का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है।

हींग कैसे प्राप्त की जाती है?

हींग की असली कहानी पौधे की जड़ में जमा राल से शुरू होती है। परिपक्व पौधे की मोटी जड़ और उससे जुड़े हिस्से से ओलियो-गम रेजिन प्राप्त किया जाता है।इस राल में गोंद, रेजिन और वाष्पशील तेल जैसे घटक पाए जाते हैं। इसकी तीखी और विशिष्ट गंध के कारण बहुत थोड़ी मात्रा भी भोजन में मजबूत खुशबू पैदा करती है। बाजार में मिलने वाली हींग को विभिन्न तरीकों से संसाधित और मिश्रित करके उपयोग योग्य रूप दिया जा सकता है। इसलिए पैकेट में मिलने वाली हींग और पौधे से सीधे निकलने वाली कच्ची राल एक जैसी अवस्था में नहीं होती।

हिमाचल प्रदेश के अलावा कहां हो सकती है खेती?

हींग के लिए भारत के सभी इलाके उपयुक्त नहीं हैं। वैज्ञानिक संस्थानों ने खास तौर पर हिमालय के ठंडे और शुष्क क्षेत्रों पर ध्यान दिया है।
सीएसआईआर-आईएचबीटी के अनुसार लाहौल-स्पीति और किन्नौर जैसे हिमाचली क्षेत्रों के अलावा लद्दाख तथा उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी उपयुक्त परिस्थितियां तलाशने की योजना और परीक्षण किए गए हैं। हिमाचल प्रदेश कृषि विभाग भी चंबा, लाहौल-स्पीति और किन्नौर के ऊंचाई वाले इलाकों को हींग की खेती के लिए संभावित क्षेत्र के तौर पर चिन्हित करता है। विभाग ने किसानों को प्रशिक्षण और प्रदर्शन प्लॉट के जरिए इस फसल को बढ़ावा देने की जानकारी दी है। 

भारत में हींग की खेती क्यों महत्वपूर्ण है?

हींग की खेती को बढ़ावा देने के पीछे सिर्फ किसानों की आय बढ़ाने का उद्देश्य नहीं है। इसका संबंध भारत की मसाला आपूर्ति और आयात पर निर्भरता से भी है।भारत में लंबे समय से कच्ची हींग का बड़ा हिस्सा अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान जैसे देशों से आयात किया जाता रहा है। सीएसआईआर के अनुसार, घरेलू उत्पादन शुरू करने का उद्देश्य भविष्य में आयात पर निर्भरता कम करना और देश में हींग की उत्पादन श्रृंखला विकसित करना भी है। 

हींग की खेती में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

इस फसल के सामने कई कृषि और व्यावसायिक चुनौतियां हैं। पहली चुनौती है गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री। दूसरी, बीज की प्राकृतिक सुप्तावस्था और कम अंकुरण क्षमता है। तीसरी चुनौती है लंबी अवधि तक खेत में पौधे को संभालना। इसके अलावा ठंडे और ऊंचाई वाले इलाकों में परिवहन तथा बाजार तक पहुंच भी किसानों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे हो सकते हैं। यही कारण है कि भारत में हींग की खेती को अभी भी शोध, परीक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन से जोड़कर देखा जा रहा है।

भारत में हींग की खेती का नया अध्याय

हींग की भारतीय खेती की कहानी अब सिर्फ शुरुआती प्रयोग तक सीमित नहीं है। सीएसआईआर-आईएचबीटी ने २०२५ में भारतीय परिस्थितियों में हींग के पहले फूल आने और बीज बनने को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। संस्थान के अनुसार यह भारतीय हिमालयी परिस्थितियों में पौधे के अनुकूलन और भविष्य में घरेलू बीज उत्पादन श्रृंखला विकसित करने की दिशा में अहम कदम है। इससे संकेत मिलता है कि भारत में हींग की खेती को लेकर वैज्ञानिक प्रयास अब अगले चरण में पहुंच रहे हैं। हालांकि बड़े पैमाने पर स्थायी व्यावसायिक उत्पादन और आयात निर्भरता में उल्लेखनीय बदलाव के लिए अभी निरंतर शोध, गुणवत्तापूर्ण बीज, किसानों का प्रशिक्षण और बाजार व्यवस्था जरूरी होगी।

निष्कर्ष

हींग की खेती आम मसाला फसलों से बिल्कुल अलग है। इसके लिए ठंडी और शुष्क जलवायु, अच्छी जल निकासी वाली जमीन, गुणवत्तापूर्ण बीज या पौध और कई वर्षों का धैर्य चाहिए। भारत में इसकी खेती की शुरुआत हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी से हुई और अब हिमालय के अन्य उपयुक्त इलाकों में भी इसे बढ़ावा दिया जा रहा है। रसोई में चुटकी भर इस्तेमाल होने वाली हींग के पीछे दरअसल कई वर्षों की खेती, वैज्ञानिक शोध और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों की कहानी छिपी है। आने वाले वर्षों में यदि घरेलू उत्पादन तकनीकी और आर्थिक रूप से सफल होता है, तो यह किसानों के लिए एक नई उच्च-मूल्य वाली फसल और भारत के लिए आयात निर्भरता घटाने का जरिया बन सकती है।
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Neelam Saini

Neelam Saini

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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