नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी भोटेकोशी बाढ़ के बाद राहत और बचाव अभियान जारी है। इस बीच नेपाल सरकार ने भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश समेत कई देशों की ओर से भेजी गई खोज और बचाव टीमों की पेशकश फिलहाल स्वीकार नहीं करने का फैसला किया है। काठमांडू का कहना है कि नेपाली सेना, पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियां अभियान को संभालने की क्षमता रखती हैं।
काठमांडू, नेपाल | 28 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर क्षेत्री ने कहा कि विदेशी मदद की पेशकश स्वाभाविक है, लेकिन फिलहाल नेपाली सुरक्षा एजेंसियां खोज और बचाव अभियान चला रही हैं और देश को ऐसी विदेशी टीमों की जरूरत नहीं है। यह फैसला ऐसे वक्त आया है जब बाढ़ से बड़ी जनहानि हुई है और सैकड़ों नेपाली तथा विदेशी नागरिकों के लापता होने की खबर है।
नेपाल के सामने कई देशों ने विशेषज्ञ खोज और बचाव दल भेजने की पेशकश रखी थी। इनमें भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश शामिल हैं। इन देशों की दिलचस्पी का एक बड़ा कारण यह भी है कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में उनके नागरिक लापता हैं।
दक्षिण कोरिया के 9 नागरिक एक हाइड्रोपावर परियोजना से जुड़े हुए लापता बताए गए हैं, जबकि 10 अन्य लोगों के फंसे होने की जानकारी सामने आई है। दक्षिण कोरिया ने नेपाल को मानवीय सहायता देने की पेशकश भी की है।
नेपाल सरकार का आधिकारिक रुख स्पष्ट है। उसका कहना है कि नेपाली सेना, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां मौजूदा रेस्क्यू ऑपरेशन को संभाल रही हैं। नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार सरकार अपने पास उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल कर रही है और फिलहाल विदेशी खोज एवं बचाव टीमों की जरूरत महसूस नहीं की गई है। काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने विदेशी देशों से विशेषज्ञ रेस्क्यू टीमों के बजाय आर्थिक मदद को एक केंद्रीकृत व्यवस्था के जरिए भेजने का अनुरोध किया है। इसके लिए प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष के माध्यम से सहायता जुटाने की व्यवस्था की गई है।
यानी नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय सहायता को पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया है। फर्क यह है कि काठमांडू विदेशी कर्मियों को सीधे खोज और बचाव अभियान में शामिल नहीं करना चाहता।
नेपाल के मौजूदा फैसले के पीछे 2015 के विनाशकारी भूकंप का अनुभव भी चर्चा में है। उस आपदा के बाद बड़ी संख्या में विदेशी बचाव दल नेपाल पहुंचे थे। मौजूदा रिपोर्टों के मुताबिक, विदेशी टीमों की बड़ी संख्या से समन्वय, लॉजिस्टिक्स और राहत अभियानों को व्यवस्थित करने में कठिनाइयां सामने आई थीं। इसी अनुभव के आधार पर नेपाल इस बार एक केंद्रीकृत कमांड व्यवस्था बनाए रखना चाहता है। हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि 2015 का अनुभव ही मौजूदा फैसले का एकमात्र कारण है। नेपाल सरकार ने आधिकारिक तौर पर अपनी सुरक्षा एजेंसियों की क्षमता को फैसले का मुख्य आधार बताया है।
बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में रसुवा जिला भी शामिल है, जिसकी सीमा चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से लगती है। कुछ पूर्व नेपाली राजनयिकों ने अनुमान लगाया है कि इस संवेदनशील सीमा क्षेत्र में विदेशी रेस्क्यू टीमों की मौजूदगी को लेकर रणनीतिक और कूटनीतिक चिंताएं भी फैसला लेने में भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन नेपाल के विदेश मंत्रालय ने इस व्याख्या को खारिज किया है। प्रवक्ता लोक बहादुर क्षेत्री ने कहा कि विदेशी टीमों को अनुमति नहीं देने का फैसला चीन की संवेदनशीलता से जुड़ा नहीं है। उनके मुताबिक नेपाली एजेंसियां खुद अभियान संभाल रही हैं। इसलिए सीमा की संवेदनशीलता को अभी केवल एक विश्लेषणात्मक संभावना के तौर पर देखा जाना चाहिए, सरकारी तौर पर घोषित कारण के रूप में नहीं।
रेस्क्यू टीमों को मना करने का मतलब यह नहीं है कि नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय मदद का दरवाजा बंद कर दिया है। नेपाल सरकार ने विदेशी सहायता और वित्तीय योगदान के लिए आधिकारिक चैनल उपलब्ध कराया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि जमीन पर जरूरत के आकलन के बाद सरकार विशेष सहायता की मांग स्थापित आधिकारिक माध्यमों से करेगी। भारत ने नेपाल को मानवीय सहायता की खेप भेजी है। अमेरिकी सरकार ने भी आर्थिक सहायता की घोषणा की है। श्रीलंका ने 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर की मदद देने की घोषणा की है। इससे स्पष्ट है कि काठमांडू विदेशी आर्थिक और मानवीय सहायता स्वीकार कर रहा है, लेकिन खोज और बचाव के संचालन की कमान अपने हाथ में रखना चाहता है।
भारत ने नेपाल की मदद के लिए मानवीय सहायता भेजी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से बात करके हर संभव मानवीय सहायता देने की पेशकश की थी। भारत की ओर से राहत सामग्री नेपाल पहुंचाई गई है। साथ ही भारतीय नागरिकों की स्थिति पर भी लगातार नजर रखी जा रही है। नेपाल के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में कई भारतीय नागरिकों के लापता होने की रिपोर्ट के कारण भारत की दिलचस्पी केवल मानवीय सहायता तक सीमित नहीं है। भारतीय अधिकारी नेपाल के साथ मिलकर लापता नागरिकों की जानकारी जुटा रहे हैं।
नेपाल सरकार के 27 अगस्त के आधिकारिक अपडेट के अनुसार भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ के बाद 359 शव बरामद किए जा चुके थे और 33 देशों के 596 लोग लापता बताए गए थे। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि आंकड़े बचाव अभियान जारी रहने के कारण बदल सकते हैं। बाढ़ ने घरों, सड़कों, पुलों, हाइड्रोपावर परियोजनाओं और दूसरी महत्वपूर्ण बुनियादी सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है। नेपाल की सुरक्षा और आपदा प्रबंधन एजेंसियां लगातार खोज, रेस्क्यू, निकासी और मेडिकल सहायता अभियान चला रही हैं।
मौजूदा संकट को और गंभीर बना रहा है दूसरी बाढ़ का खतरा। बाढ़ के मलबे से भोटेकोशी नदी के कुछ हिस्सों में पानी का रास्ता बाधित हुआ है और एक अवरोधक झील बनने की स्थिति सामने आई है। नेपाल सरकार लगातार नदी तंत्र और निचले इलाकों में बाढ़ के जोखिम की निगरानी कर रही है।
सीमा के दूसरी तरफ चीन भी मलबे से बनी झीलों में बढ़ते जलस्तर को लेकर सतर्क है। इससे नेपाल के लिए बचाव अभियान और जटिल हो गया है।
यह सवाल अभी खुला है।
एक तरफ नेपाल का तर्क है कि घरेलू सुरक्षा बलों के पास अभियान संभालने की क्षमता है और विदेशी टीमों की बड़ी संख्या से कमांड तथा समन्वय मुश्किल हो सकता है। दूसरी तरफ आपदा का पैमाना बड़ा है। कई विदेशी नागरिक लापता हैं और कुछ इलाकों में बुनियादी ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त है। ऐसे में अत्याधुनिक खोज उपकरण, विशेष रेस्क्यू विशेषज्ञता और अतिरिक्त हेलीकॉप्टर क्षमता उपयोगी साबित हो सकती है। लेकिन अंतिम फैसला नेपाल सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। फिलहाल काठमांडू ने विदेशी रेस्क्यू टीमों के बजाय वित्तीय और मानवीय सहायता को प्राथमिकता दी है।
नेपाल आने वाले दिनों में जमीन पर जरूरतों का आकलन जारी रखेगा। अगर किसी विशेष क्षेत्र में अतिरिक्त विशेषज्ञता या संसाधन की जरूरत महसूस होती है, तो सरकार स्थापित राजनयिक चैनलों के जरिए सहायता मांग सकती है। दक्षिण कोरिया ने भी कहा है कि वह नेपाल के साथ इस मुद्दे पर बातचीत जारी रखेगा। उसने 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर की मानवीय सहायता देने की घोषणा की है। इस बीच नेपाल की अपनी सेना और पुलिस पर सबसे बड़ा दबाव बना रहेगा। उन्हें लापता लोगों की तलाश, शवों की बरामदगी, प्रभावित आबादी की निकासी और संभावित दूसरी बाढ़ से निपटने का काम एक साथ करना है।
नेपाल ने विदेशी सहायता को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। उसने फिलहाल विदेशी खोज और बचाव टीमों को अपने अभियान में शामिल करने से इनकार किया है और कहा है कि नेपाली सुरक्षा एजेंसियां मौजूदा ऑपरेशन संभाल रही हैं। भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश समेत कई देशों ने सहायता की पेशकश की थी। काठमांडू अब विदेशी मदद को मुख्य रूप से वित्तीय और मानवीय सहायता के रूप में लेने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। फिलहाल नेपाल की सबसे बड़ी प्राथमिकता लापता लोगों की तलाश, प्रभावित नागरिकों की सुरक्षा और दूसरी बाढ़ के खतरे को नियंत्रित करना है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि घरेलू संसाधनों के भरोसे चल रहा यह अभियान आपदा के मौजूदा पैमाने से कितनी प्रभावी तरह निपट पाता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।