AQIS की नई चाल, पूर्वोत्तर भारत पर बढ़ी सुरक्षा एजेंसियों की नजर
लो-प्रोफाइल रणनीति से AQIS का नेटवर्क विस्तार, पूर्वोत्तर पर फोकस
AQIS की नई रणनीति पर अलर्ट, भारत के पूर्वोत्तर तक नेटवर्क बढ़ाने की आशंका
अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट यानी AQIS को लेकर सुरक्षा चिंता बढ़ी है। हालिया UNSC आकलन और भारतीय सुरक्षा अधिकारियों के हवाले से सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक संगठन ने प्रत्यक्ष गतिविधियों के बजाय ऑनलाइन प्रोपेगैंडा और प्रॉक्सी नेटवर्क के जरिए अपनी मौजूदगी बनाए रखने की रणनीति अपनाई है। रिपोर्टों में पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश को संभावित विस्तार के अहम क्षेत्र के तौर पर चिन्हित किया गया है।
अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट यानी AQIS को लेकर भारत में सुरक्षा एजेंसियों की चिंता फिर बढ़ी है। ताजा रिपोर्टिंग के मुताबिक संगठन ने लंबे समय तक लो-प्रोफाइल रहते हुए ऑनलाइन प्रोपेगैंडा और स्थानीय प्रॉक्सी नेटवर्क के जरिए अपनी गतिविधियों को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का आकलन है कि AQIS अब पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर सकता है। यह आकलन बांग्लादेश में संगठन से जुड़े नेटवर्क और वहां की अस्थिर परिस्थितियों के संदर्भ में सामने आया है।
यहां एक अहम संपादकीय सावधानी जरूरी है। “पूर्वोत्तर को निशाना बनाने की तैयारी” को स्थापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि सुरक्षा अधिकारियों के आकलन और रिपोर्टेड थ्रेट असेसमेंट के रूप में पेश करना अधिक सटीक होगा।
AQIS का गठन 2014 में हुआ था। शुरुआती दौर में संगठन का घोषित फोकस भारतीय उपमहाद्वीप में अपना आधार मजबूत करना था। लेकिन भारत में उसके बड़े स्तर के ऑपरेशनल विस्तार की कोशिशें अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ीं।
हालिया आकलन में संगठन को पहले की तुलना में ज्यादा संरचित क्षेत्रीय नेटवर्क के रूप में देखा गया है। इसकी रणनीति में ऑनलाइन गतिविधियां और स्थानीय स्तर पर काम करने वाले प्रॉक्सी संगठनों का इस्तेमाल प्रमुख बताया गया है।
सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक, कम दिखाई देना AQIS के लिए एक रणनीतिक फायदा साबित हुआ। जब सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे दूसरे संगठनों पर केंद्रित रहा, तब AQIS ने अपने नेटवर्क और प्रोपेगैंडा गतिविधियों को कम प्रोफाइल में जारी रखा।
रिपोर्टों के अनुसार AQIS ने अपनी ऑनलाइन मौजूदगी को लगातार बनाए रखा। जमीनी स्तर पर बड़े ऑपरेशन सामने नहीं आने के बावजूद संगठन के वैचारिक और प्रचार तंत्र को सक्रिय बताया गया है।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह रणनीति इसलिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि ऑनलाइन नेटवर्क को पारंपरिक संगठनात्मक ढांचे की तुलना में पहचानना और ट्रैक करना ज्यादा कठिन हो सकता है।
AQIS से जुड़े बताए गए कुछ प्रॉक्सी संगठनों में दक्षिण भारत का बेस मूवमेंट, अंसार ग़ज़वत-उल-हिंद और इत्तेहाद-उल-मुजाहिदीन शामिल हैं। रिपोर्टों में इन संगठनों की विचारधारा और AQIS के बीच संबंधों का उल्लेख किया गया है।
सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक AQIS भारत में सीधे अपने नाम से ऑपरेशन करने के बजाय क्षेत्र-विशेष के प्रॉक्सी संगठनों के जरिए प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकता है। ऐसी रणनीति में स्थानीय नेटवर्क अलग नाम और सीमित गतिविधियों के साथ काम करते हैं।
दक्षिण भारत में बेस मूवमेंट और उत्तर भारत में अंसार ग़ज़वत-उल-हिंद का उदाहरण देते हुए अधिकारियों ने संकेत दिया है कि भविष्य में पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के लिए भी क्षेत्र-विशेष नेटवर्क विकसित करने की कोशिश हो सकती है।
हालांकि, किसी संगठन को AQIS का प्रॉक्सी घोषित करने के लिए स्वतंत्र जांच और आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। इसलिए उपलब्ध रिपोर्टिंग में सामने आए संबंधों को आरोप या सुरक्षा आकलन के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है।
AQIS को लेकर मौजूदा चिंता को नवंबर 2025 के दिल्ली रेड फोर्ट इलाके में हुए धमाके की जांच से भी जोड़ा जा रहा है।
हालिया UNSC आकलन के हवाले से ने रिपोर्ट किया कि AQIS को 2025 के रेड फोर्ट धमाके से जोड़ा गया है। इंडिया टुडे ने भी UNSC रिपोर्ट के हवाले से AQIS की अफगानिस्तान में मौजूदगी और बांग्लादेश की तरफ उसके विस्तार को सुरक्षा चिंता बताया है।
इस घटनाक्रम ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सामने AQIS की गतिविधियों को नए सिरे से देखने की जरूरत बढ़ाई है।
फिर भी किसी आतंकी हमले की जिम्मेदारी और किसी संगठन के व्यापक नेटवर्क के बीच संबंध स्थापित करने के लिए आधिकारिक जांच और खुफिया मूल्यांकन महत्वपूर्ण होते हैं।
AQIS की संभावित पूर्वोत्तर रणनीति में बांग्लादेश को अहम भौगोलिक कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक AQIS के बांग्लादेश में संबद्ध संगठनों के नेटवर्क मौजूद हैं। इनमें अंसारुल्लाह बांग्ला टीम और हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी बांग्लादेश का उल्लेख किया गया है।
UNSC आकलन में बांग्लादेश की अस्थिर परिस्थितियों का फायदा उठाकर AQIS द्वारा वहां ऑपरेशनल सेल स्थापित करने की चिंता का उल्लेख किया गया है।
भारत के लिए इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि पूर्वोत्तर क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति बांग्लादेश के साथ सीधे जुड़ी है।
भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील है। यह क्षेत्र बांग्लादेश, भूटान, चीन, म्यांमार और नेपाल से अंतरराष्ट्रीय सीमाएं साझा करता है। पूर्वोत्तर भारत की मुख्य भूमि से संपर्क भी संकीर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर के जरिए होता है।
ऐसी भौगोलिक स्थिति में किसी भी सीमा-पार नेटवर्क की गतिविधि सुरक्षा एजेंसियों के लिए अतिरिक्त चुनौती पैदा कर सकती है।
हालांकि, केवल भौगोलिक निकटता को किसी आतंकी नेटवर्क की सक्रिय मौजूदगी का प्रमाण नहीं माना जा सकता। पूर्वोत्तर में AQIS की वास्तविक ऑपरेशनल क्षमता के बारे में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी सीमित है।
AQIS की कथित लो-प्रोफाइल रणनीति का सबसे बड़ा पहलू यही है कि संगठन का नाम हर गतिविधि में सीधे सामने नहीं आता।
अगर स्थानीय प्रॉक्सी या वैचारिक नेटवर्क अलग-अलग नामों से सक्रिय हों, तो जांच एजेंसियों को उनके बीच संबंध स्थापित करने के लिए डिजिटल सबूत, वित्तीय लेनदेन, संपर्क नेटवर्क और फॉरेंसिक जानकारी का सहारा लेना पड़ता है।
यही वजह है कि ऑनलाइन रेडिकलाइजेशन और डिजिटल प्रोपेगैंडा पर निगरानी अब आतंकवाद विरोधी रणनीति का अहम हिस्सा बन चुकी है।
AQIS की गतिविधियों को समझने में अफगानिस्तान भी अहम है। हालिया अंतरराष्ट्रीय आकलनों में AQIS की क्षेत्रीय गतिविधियों और अफगानिस्तान में उसके नेटवर्क को लेकर चिंता जताई गई है। UNSC रिपोर्ट के हवाले से AQIS की अफगानिस्तान में मौजूदगी और बांग्लादेश की ओर विस्तार को रेखांकित किया है।
रिपोर्टिंग के मुताबिक अफगानिस्तान में तालिबान, टीटीपी और ISKP से जुड़े व्यापक सुरक्षा समीकरणों के बीच AQIS ने कम दिखाई देने वाली रणनीति अपनाई।
इसका मतलब यह नहीं है कि AQIS के पास भारत में बड़े पैमाने पर हमले करने की क्षमता स्थापित हो चुकी है। खतरे का आकलन नेटवर्क की क्षमता, संपर्क और इरादे के आधार पर अलग-अलग स्तर पर किया जाना चाहिए।
मौजूदा सार्वजनिक रिपोर्टों से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि AQIS निकट भविष्य में भारत में बड़ा हमला करने की स्थिति में है।
रिपोर्टों का मुख्य संकेत नेटवर्क विस्तार, ऑनलाइन प्रोपेगैंडा और प्रॉक्सी ढांचे से जुड़ा है। सुरक्षा एजेंसियों की चिंता इसी संभावित क्षमता को समय रहते पहचानने और रोकने पर केंद्रित है।
यानी फिलहाल खबर का मुख्य एंगल किसी घोषित हमले की सूचना नहीं, बल्कि संभावित नेटवर्क विस्तार को लेकर सुरक्षा आकलन है।
भारत में आतंकवाद विरोधी एजेंसियों के लिए AQIS की चुनौती नई नहीं है। लेकिन संगठन की कथित रणनीति में बदलाव इसे फिर से सुरक्षा एजेंडे में ला रहा है।
अगर कोई नेटवर्क अपने नाम से सामने आए बिना अलग-अलग क्षेत्रीय समूहों और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए ज्यादा गहरे इंटेलिजेंस कोऑर्डिनेशन की जरूरत पड़ती है।
पूर्वोत्तर में यह चुनौती सीमा प्रबंधन, डिजिटल निगरानी और पड़ोसी देशों के साथ सुरक्षा सहयोग से भी जुड़ती है।
AQIS के संभावित नेटवर्क को देखते हुए भारत और बांग्लादेश के बीच आतंकवाद विरोधी सहयोग का महत्व बढ़ता है।
सीमा पार सक्रिय संगठनों, फंडिंग चैनल, डिजिटल प्रोपेगैंडा और संदिग्ध नेटवर्क की जानकारी साझा करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए अहम रहेगा।
लेकिन किसी भी कार्रवाई में स्थानीय समुदायों को सामूहिक रूप से संदिग्ध मानने से बचना भी जरूरी है। आतंकवाद विरोधी नीति का आधार विशिष्ट खुफिया जानकारी और कानूनी प्रक्रिया होना चाहिए।
आने वाले समय में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की प्राथमिकता AQIS के संभावित प्रॉक्सी नेटवर्क, ऑनलाइन गतिविधियों और सीमा-पार संपर्कों की निगरानी पर रह सकती है।
पूर्वोत्तर में किसी नए मॉड्यूल की पुष्टि होती है या नहीं, यह आने वाली जांचों पर निर्भर करेगा। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टिंग खतरे की आशंका और सुरक्षा आकलन की बात करती है, किसी नए पूर्वोत्तर आतंकी मॉड्यूल की सार्वजनिक पुष्टि की नहीं।
यही फर्क इस खबर की रिपोर्टिंग में बनाए रखना जरूरी है।
AQIS को लेकर ताजा सुरक्षा अलर्ट भारत में आतंकवाद के बदलते तौर-तरीकों की तरफ इशारा करता है। संगठन पर लो-प्रोफाइल रहते हुए ऑनलाइन प्रोपेगैंडा और प्रॉक्सी नेटवर्क के जरिए अपनी मौजूदगी बनाए रखने का आरोप है।
पूर्वोत्तर भारत को लेकर चिंता का आधार मुख्य रूप से बांग्लादेश में AQIS से जुड़े नेटवर्क और क्षेत्रीय भौगोलिक परिस्थितियां हैं। फिलहाल इसे संभावित खतरे के रूप में देखना अधिक सटीक है, न कि पूर्वोत्तर में AQIS की व्यापक सक्रियता की स्थापित पुष्टि के रूप में।
भारत के लिए चुनौती साफ है। नेटवर्क के नाम से ज्यादा जरूरी उसके संपर्क, फंडिंग, डिजिटल प्रोपेगैंडा और स्थानीय प्रॉक्सी ढांचे को समय रहते पहचानना है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।