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रूस से जुड़े हैकरों का AI कनेक्शन, साइबर जासूसी ने बढ़ाई सुरक्षा एजेंसियों की चिंता

Harish Qureshi 2026-09-12 11:41:33
रूस से जुड़े हैकरों का AI कनेक्शन, साइबर जासूसी ने बढ़ाई सुरक्षा एजेंसियों की चिंता

रूस से जुड़े साइबर अभियानों में AI के बढ़ते इस्तेमाल ने डिजिटल सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है। नई रिपोर्टें फिशिंग, जासूसी और ऑटोमेशन की बदलती तस्वीर सामने रखती हैं।


मॉस्को | 12 सितंबर 2026

By Mohd Haris


रूस से जुड़े साइबर अभियानों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर अंतरराष्ट्रीय साइबर सुरक्षा समुदाय में चिंता बढ़ रही है। माइक्रोसॉफ्ट और एंथ्रोपिक की हालिया रिपोर्टों में ऐसे अभियानों का उल्लेख है, जिनमें AI का इस्तेमाल फिशिंग, मैलवेयर से जुड़ी गतिविधियों और साइबर जासूसी को अधिक प्रभावी बनाने के लिए किया गया।


नई स्थिति की अहमियत इस बात में है कि AI अब केवल सामग्री तैयार करने वाला उपकरण नहीं रह गया है। साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं के मुताबिक हमलावर AI को हमले की योजना, कोड में बदलाव, लक्ष्य तलाशने और कई चरणों वाली गतिविधियों में शामिल कर रहे हैं।


रूस से जुड़े साइबर अभियानों पर निगरानी


माइक्रोसॉफ्ट की जुलाई 2026 की थ्रेट इंटेलिजेंस रिपोर्ट में स्टॉर्म-2945 नाम के एक समूह की गतिविधियों का उल्लेख किया गया है। माइक्रोसॉफ्ट ने इसे मिडनाइट ब्लिज़ार्ड से जुड़ा उप-समूह बताया है। मिडनाइट ब्लिज़ार्ड को अमेरिकी और ब्रिटिश सरकारें रूस की विदेशी खुफिया सेवा से संबद्ध मानती हैं।


रिपोर्ट के मुताबिक स्टॉर्म-2945 ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में होटल और अन्य कैप्टिव-पोर्टल नेटवर्क से जुड़ी ट्रैफिक मैनिपुलेशन गतिविधियां कीं। कुछ अभियानों में माइक्रोसॉफ्ट ने AI के इस्तेमाल के संकेत भी दर्ज किए।


इन गतिविधियों में फिशिंग, डिवाइस कोड आधारित प्रमाणीकरण का दुरुपयोग और क्लाउड सेवाओं से जानकारी हासिल करने की कोशिशें शामिल थीं। ऐसे हमलों का मकसद अक्सर संवेदनशील अकाउंट तक पहुंच बनाना और उसके बाद संगठन के भीतर आगे बढ़ना होता है।


AI ने साइबर हमलों की रणनीति बदली


गूगल थ्रेट इंटेलिजेंस ग्रुप की सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक साइबर हमलों में AI का इस्तेमाल साधारण प्रॉम्प्टिंग से आगे बढ़कर एजेंटिक वर्कफ्लो की तरफ जा रहा है। इसका मतलब है कि AI आधारित सिस्टम हमले के कई चरणों को कम मानवीय हस्तक्षेप के साथ संचालित करने में मदद कर रहे हैं।


गूगल के मुताबिक 2026 की दूसरी तिमाही में उसने एक ऐसा मामला देखा, जिसमें हमलावरों ने क्लाउड संसाधन से समझौता करने के बाद AI आधारित बड़े पैमाने की क्रेडेंशियल चोरी की मुहिम को छह घंटे से कम समय में तैयार और संचालित किया।


यह आंकड़ा इस बदलाव की रफ्तार को समझने में मदद करता है। पहले किसी बड़े साइबर अभियान की तैयारी में अधिक समय और विशेषज्ञता की जरूरत होती थी। AI आधारित ऑटोमेशन इस प्रक्रिया के कई हिस्सों को तेज कर रहा है।


रूस से जुड़ी साइबर जासूसी


एंथ्रोपिक की सितंबर 2026 की थ्रेट इंटेलिजेंस रिपोर्ट में रूस से जुड़े एक अभियान का भी उल्लेख है। कंपनी के मुताबिक रूस आधारित संदिग्ध गतिविधियों में उसके AI मॉडल का इस्तेमाल साइबर जासूसी के लिए किया गया।


रिपोर्ट के अनुसार यूक्रेनी अधिकारियों को निशाना बनाने वाली गतिविधियों में फिशिंग और मैलवेयर से जुड़ी तकनीकों के लिए AI का इस्तेमाल किया गया। एंथ्रोपिक ने ऐसे अकाउंट और गतिविधियों पर कार्रवाई करने की जानकारी दी है।


यहां एक महत्वपूर्ण संपादकीय अंतर समझना जरूरी है। रिपोर्ट में AI के इस्तेमाल और रूस से जुड़े संदिग्ध ऑपरेटरों के बीच संबंध बताए गए हैं, लेकिन हर साइबर घटना को सीधे रूसी सरकार की कार्रवाई के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।


फिशिंग बनी अहम चुनौती


AI आधारित साइबर अभियानों में फिशिंग अब भी एक प्रमुख प्रवेश मार्ग है। माइक्रोसॉफ्ट ने बताया है कि AI हमलावरों को अधिक लक्षित और विश्वसनीय संदेश तैयार करने में मदद कर रहा है।


AI की मदद से हमलावर किसी व्यक्ति की भूमिका, संस्था और भाषा के मुताबिक संदेश तैयार कर सकते हैं। इससे पारंपरिक सुरक्षा प्रशिक्षण और सामान्य स्पैम फिल्टर के सामने नई चुनौती पैदा होती है।


माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार AI आधारित फिशिंग अभियानों में क्लिक-थ्रू दर कुछ मामलों में पारंपरिक अभियानों की तुलना में काफी अधिक देखी गई। कंपनी ने एक विश्लेषण में AI-सहायता प्राप्त अभियानों के लिए 54 प्रतिशत और पारंपरिक अभियानों के लिए लगभग 12 प्रतिशत क्लिक-थ्रू दर बताई। यह आंकड़ा माइक्रोसॉफ्ट के अपने अवलोकन पर आधारित है और इसे सभी साइबर अभियानों पर लागू सामान्य दर नहीं माना जाना चाहिए।


खतरा केवल रूस तक सीमित नहीं


AI आधारित साइबर खतरे को केवल रूस से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं होगी। गूगल और माइक्रोसॉफ्ट दोनों की रिपोर्टें बताती हैं कि अलग-अलग देशों से जुड़े सरकारी और गैर-सरकारी समूह AI का इस्तेमाल साइबर अभियानों में कर रहे हैं।


एंथ्रोपिक की हालिया रिपोर्ट में रूस, चीन और अन्य क्षेत्रों से जुड़े AI दुरुपयोग के मामलों का उल्लेख है। इनमें साइबर ऑपरेशन के अलावा निगरानी, हथियार प्रणाली और अन्य संवेदनशील गतिविधियों से संबंधित दुरुपयोग भी शामिल हैं।


इसलिए मौजूदा चुनौती को किसी एक देश की रणनीति के बजाय व्यापक AI सुरक्षा संकट के रूप में देखना अधिक सटीक है।


यूरोप के लिए बढ़ती चुनौती


रूस से जुड़े साइबर अभियानों को लेकर यूरोप में पहले से सुरक्षा चिंताएं मौजूद हैं। जुलाई 2026 में यूरोपीय संघ ने रूस से जुड़े दुर्भावनापूर्ण साइबर नेटवर्क और गतिविधियों के खिलाफ अपना बड़ा साइबर प्रतिबंध पैकेज घोषित किया था। यूरोपीय संघ ने आरोप लगाया कि इन गतिविधियों में सार्वजनिक सेवाओं और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया।


AI के इस्तेमाल से ऐसी गतिविधियों की पहचान और जिम्मेदारी तय करना और कठिन हो सकता है। हमलावर अलग-अलग डिजिटल बुनियादी ढांचे, क्लाउड सेवाओं और स्वचालित उपकरणों का इस्तेमाल करके अपनी पहचान छिपाने की कोशिश कर सकते हैं।


साइबर सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौती


AI आधारित अभियानों की सबसे बड़ी चुनौती केवल हमले की क्षमता नहीं है। असली चिंता उनकी रफ्तार, अनुकूलन क्षमता और विस्तार को लेकर है।

गूगल के मुताबिक हमलावर अब AI को अलग-अलग चरणों में इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमें कमजोरियों की पहचान, शुरुआती पहुंच हासिल करना और आगे की गतिविधियों को स्वचालित करना शामिल है।


इस बदलाव के बाद साइबर सुरक्षा का पारंपरिक मॉडल भी बदलना होगा। संस्थानों को केवल नेटवर्क सुरक्षा और पासवर्ड सुरक्षा पर निर्भर रहने के बजाय AI सिस्टम, एजेंट और क्लाउड संसाधनों की लगातार निगरानी करनी होगी।


इंसानी नियंत्रण अभी भी अहम


AI आधारित साइबर अभियानों को लेकर चर्चा में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अधिकांश मामलों में पूरी तरह स्वायत्त हमले की पुष्टि नहीं हुई है।

माइक्रोसॉफ्ट ने अप्रैल 2026 में कहा था कि साइबर हमलों में AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन कई अभियानों में अब भी इंसानी ऑपरेटर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यानी मौजूदा खतरा पूरी तरह स्वतंत्र AI से ज्यादा इंसान और AI के संयुक्त इस्तेमाल से जुड़ा है।


इस अंतर को समझना जरूरी है। पूरी तरह स्वायत्त साइबर युद्ध की तस्वीर और AI की मदद से अधिक तेज और सटीक साइबर ऑपरेशन, दोनों अलग परिस्थितियां हैं।


आगे क्या होगा


साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ AI का इस्तेमाल हमलों को रोकने और संदिग्ध गतिविधियों की पहचान के लिए हो रहा है। दूसरी तरफ वही तकनीक हमलावरों की क्षमता बढ़ा रही है।


गूगल ने AI आधारित साइबर अभियानों में प्रॉम्प्टिंग से एजेंटिक ऑटोमेशन की ओर बदलाव दर्ज किया है। माइक्रोसॉफ्ट ने भी AI को साइबर हमलों की गति और सटीकता बढ़ाने वाला कारक बताया है।


आने वाले समय में सरकारों और निजी कंपनियों के लिए AI मॉडल की निगरानी, पहचान सत्यापन, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन, क्लाउड सुरक्षा और थ्रेट इंटेलिजेंस साझा करना अहम होगा।


निष्कर्ष


रूस से जुड़े AI आधारित साइबर अभियानों को लेकर उठ रही चिंता व्यापक डिजिटल सुरक्षा बदलाव का हिस्सा है। उपलब्ध रिपोर्टें बताती हैं कि AI साइबर हमलों को तेज, लक्षित और अधिक संगठित बनाने में मदद कर रहा है।


फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि AI साइबर युद्ध में आएगा या नहीं। वह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। असली चुनौती यह है कि सुरक्षा संस्थान AI आधारित हमलों की रफ्तार से पहले उनकी पहचान, रोकथाम और जवाबी कार्रवाई की क्षमता कितनी तेजी से विकसित करते हैं।

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Harish Qureshi

Harish Qureshi

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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