मुंबई की विशेष अदालत से आजीवन कारावास की सजा पाए 44 सोमाली समुद्री लुटेरों ने भारत और सोमालिया सरकार से अनुरोध किया है कि उन्हें शेष सजा अपने देश में पूरी करने की अनुमति दी जाए। यदि दोनों देशों की सहमति मिलती है, तो 2017 के द्विपक्षीय समझौते के तहत यह पहला कैदी स्थानांतरण मामला बन सकता है।
📍 स्थान: मुंबई, महाराष्ट्र
📰 दिनांक: 28 जुलाई 2026
✍️ Byline: Apurva Choudhary
मुंबई कोर्ट से उम्रकैद पाए 44 सोमाली लुटेरों ने स्वदेश भेजने की लगाई गुहार
कानूनी सूत्रों के अनुसार, दोषी ठहराए गए सभी 44 सोमाली नागरिकों ने सजा सुनाए जाने के अगले ही दिन भारत के केंद्रीय गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, भारत में सोमालिया के दूतावास और सोमालिया के संबंधित सरकारी अधिकारियों को आवेदन भेजे हैं। इन आवेदनों में उन्होंने अनुरोध किया है कि उन्हें भारत से सोमालिया स्थानांतरित किया जाए ताकि वे अपनी शेष सजा अपने देश की जेल में पूरी कर सकें।
विशेष अदालत ने सुनाई थी आजीवन कारावास की सजा
यह मामला समुद्री डकैती और समुद्री सुरक्षा से जुड़ा है, जिसमें मुंबई की विशेष अदालत ने विस्तृत सुनवाई के बाद 44 सोमाली नागरिकों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर फैसला सुनाया।
सजा के बाद सभी दोषियों को तलोजा केंद्रीय कारागार में रखा गया है, जहां से उन्होंने अपने वकीलों के माध्यम से स्थानांतरण की प्रक्रिया शुरू की है।
2017 के समझौते का लिया गया सहारा
दोषियों ने अपने आवेदन में भारत और सोमालिया के बीच वर्ष 2017 में हुए "Transfer of Sentenced Persons Agreement" का हवाला दिया है। इस समझौते के तहत दोनों देशों के नागरिक, यदि दोनों सरकारें सहमत हों और निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी हों, तो अपनी शेष सजा अपने देश में पूरी कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समझौते का उद्देश्य मानवीय आधार पर कैदियों को उनके परिवार और सामाजिक परिवेश के निकट सजा पूरी करने का अवसर देना होता है। इससे कैदियों के पुनर्वास की संभावना भी बेहतर मानी जाती है।
कानूनी सहायता के जरिए दायर की गई अर्जी
सूत्रों के अनुसार, यह आवेदन मुंबई लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम (LADCS) के प्रमुख अधिवक्ता सम्यक गिमेकर और अधिवक्ता सुमित कोकाटे के माध्यम से संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाए गए हैं।
अधिवक्ताओं ने आवेदन में अनुरोध किया है कि दोनों देशों के बीच मौजूद द्विपक्षीय संधि के प्रावधानों के अनुसार इस मामले पर विचार किया जाए और कैदियों को सोमालिया स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
दोनों सरकारों की मंजूरी होगी जरूरी
हालांकि केवल आवेदन देने से स्थानांतरण स्वतः संभव नहीं हो जाता। इसके लिए भारत और सोमालिया—दोनों सरकारों की सहमति आवश्यक होगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि संबंधित संधि की सभी कानूनी और प्रशासनिक शर्तों का पालन हो।
यदि किसी भी पक्ष की ओर से आपत्ति होती है या आवश्यक शर्तें पूरी नहीं होती हैं, तो स्थानांतरण का अनुरोध अस्वीकार भी किया जा सकता है।
पहली बार लागू हो सकता है समझौता
कानूनी जानकारों के अनुसार, यदि यह अनुरोध स्वीकार कर लिया जाता है तो यह भारत-सोमालिया कैदी स्थानांतरण समझौते के तहत पहला वास्तविक मामला होगा। इससे भविष्य में दोनों देशों के बीच इसी प्रकार के मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी स्थापित हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देश ऐसे समझौतों के माध्यम से विदेशी नागरिकों को उनके गृह देश में सजा पूरी करने की अनुमति देते हैं। इससे जेल प्रशासन, कूटनीतिक संबंधों और मानवीय पहलुओं के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलती है।
सरकारों के निर्णय पर टिकी निगाहें
फिलहाल संबंधित मंत्रालयों और अधिकारियों ने इन आवेदनों की जांच शुरू कर दी है। हालांकि अभी तक भारत सरकार या सोमालिया सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक निर्णय या सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया गया है।
जब तक दोनों देशों की औपचारिक सहमति नहीं मिलती, तब तक सभी दोषी भारत की जेल में ही अपनी सजा काटते रहेंगे।
आगे क्या?
अब इस पूरे मामले पर कानूनी और कूटनीतिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। संबंधित मंत्रालय संधि के प्रावधानों, सुरक्षा पहलुओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की समीक्षा करेंगे। यदि सभी आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं और दोनों सरकारें सहमत होती हैं, तो 44 सोमाली कैदियों को उनकी शेष सजा पूरी करने के लिए सोमालिया भेजा जा सकता है।
यह मामला केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत और सोमालिया के बीच द्विपक्षीय सहयोग तथा अंतरराष्ट्रीय कैदी स्थानांतरण व्यवस्था की प्रभावशीलता की भी महत्वपूर्ण परीक्षा माना जा रहा है।