वेस्ट बैंक के क़ुसरा में फ़िलिस्तीनी परिवारों को उनके घरों में घेरने वाले बस्तीकारों की अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने कड़ी निंदा की। उन्होंने उन्हें ‘इज़राइली आतंकवादी’ कहा। इज़राइली सेना ने घेराबंदी हटाने की कोशिश की, लेकिन बस्तीकारों को पूरी तरह नहीं हटा सकी। घटना ने अमेरिकी-इज़राइल रिश्तों में नया सवाल खड़ा किया।
कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक के क़ुसरा गांव में फ़िलिस्तीनी परिवारों के घरों के बाहर इज़राइली बस्तीकारों की घेराबंदी पर अमेरिका ने असामान्य रूप से सख़्त रुख अपनाया है। इज़राइल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने घेराबंदी करने वाले समूह को “इज़राइली आतंकवादी” कहा। यह बयान ऐसे समय आया है जब इज़राइली सेना खुद बस्तीकारों को हटाने की कोशिश कर रही है, लेकिन मौके पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकी है।
क़ुसरा में यूसुफ हसन के परिवार समेत फ़िलिस्तीनी परिवार कई दिनों से अपने घरों में फंसे हुए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, घर के बाहर बस्तीकारों ने एक अस्थायी ढांचा खड़ा कर दिया और आवाजाही पर दबाव बनाया। बिजली और पानी की आपूर्ति भी प्रभावित हुई। एक बीमार बच्ची को इलाज के लिए बाहर निकालने में भी परेशानी सामने आई।
माइक हकाबी लंबे समय से इज़राइल और वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के समर्थक रहे हैं। ऐसे राजदूत का बस्तीकारों की हिंसक गतिविधियों के संदर्भ में “इज़राइली आतंकवादी” शब्द इस्तेमाल करना इस घटना को अलग सियासी महत्व देता है।
हकाबी ने इससे पहले भी हिंसक गतिविधियों में शामिल लोगों को “अनसेटलर्स” यानी ऐसे लोगों के तौर पर अलग करने की कोशिश की थी जो शांतिपूर्ण बस्तीकारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। मार्च 2026 में उन्होंने कहा था कि जो लोग चोरी, तोड़फोड़ और दूसरों को घायल करते हैं, वे आतंकवादी हैं।
इसलिए क़ुसरा पर उनका ताज़ा बयान उनके पुराने रुख की ही पेशरफ़्त के तौर पर देखा जा सकता है। फर्क यह है कि इस बार बयान सीधे उस घेराबंदी से जुड़ा है जिसमें फ़िलिस्तीनी परिवार अपने घरों से बाहर निकलने में असमर्थ बताए गए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, क़ुसरा में बस्तीकारों ने फ़िलिस्तीनी घरों के ठीक सामने एक नया आउटपोस्ट स्थापित किया। इज़राइली सेना ने इसे अवैध और स्थानीय निवासियों के लिए नुकसानदेह गतिविधि बताया। सेना ने इसे हटाने की कोशिश की, लेकिन बस्तीकारों के प्रतिरोध के बाद टकराव हुआ और सैनिकों को पीछे हटना पड़ा।
द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, यूसुफ हसन का परिवार कई दिनों तक घर के भीतर फंसा रहा। परिवार में उनकी पत्नी और दो छोटी बेटियां भी शामिल थीं। घर के बाहर बस्तीकारों की मौजूदगी, पानी और बिजली की कटौती तथा बाहर निकलने में रुकावट ने हालात को और गंभीर बनाया।
हसन के मुताबिक, रात में पत्थरबाजी, गालियां और लगातार शोर के कारण परिवार भय के माहौल में रहा। जब उनकी दो वर्षीय बेटी बीमार हुई, तब एक एंबुलेंस को घर तक पहुंचने में भी रुकावट का सामना करना पड़ा। बाद में बच्ची और उसकी मां को बाहर निकाला गया।
इज़राइली सेना ने क़ुसरा की घटना पर चिंता जताई है। रिपोर्टों के अनुसार, क्षेत्रीय कमांडर मेजर जनरल अवी ब्लुत ने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और घेराबंदी खत्म करने का आश्वासन दिया।
सेना ने कुछ बस्तीकारों की मौजूदगी हटाने की कोशिश भी की। एक अस्थायी टेंट हटाया गया, लेकिन बस्तीकार पूरी तरह वहां से नहीं हटे। इसके बाद सैनिकों और बस्तीकारों के बीच टकराव हुआ और सेना पीछे हट गई।
इज़राइली सैन्य अधिकारियों ने कहा है कि सैनिकों द्वारा बस्तीकारों की मदद किए जाने की शिकायतों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। सेना और पुलिस जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जांच कर रहे हैं।
इज़राइली सेना के लिए यह स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि किसी स्थानीय फ़िलिस्तीनी आबादी को सुरक्षा देने के बजाय उसके सामने स्थापित एक आउटपोस्ट को हटाने में सेना को प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
क़ुसरा की घटना को अलग-थलग मामला मानना आसान नहीं है। पास के जलूद गांव में भी एक फ़िलिस्तीनी परिवार के घर के आसपास लंबे समय तक दबाव और घेराबंदी की रिपोर्ट सामने आई थी। परिवार जुलाई में घर छोड़ने को मजबूर हुआ और उसके बाद बस्तीकारों ने संपत्ति पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश की।
यही पैटर्न अब क़ुसरा में भी दिखाई दे रहा है। पहले घर के बाहर मौजूदगी, फिर आवाजाही पर रोक, इसके बाद पानी या बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं में बाधा और अंततः परिवार को वहां से हटाने का दबाव।
इस दावे की हर कड़ी को अलग-अलग मामलों में स्वतंत्र रूप से परखा जाना जरूरी है। लेकिन हालिया रिपोर्टिंग में जलूद और क़ुसरा के मामलों के बीच समानताएं दर्ज की गई हैं।
क़ुसरा पहले भी बस्तीकार हिंसा का केंद्र रहा है। जुलाई 2026 में गांव की एक मस्जिद को आग लगाने की घटना सामने आई थी। इज़राइली सेना ने उस घटना की निंदा की और जांच की बात कही थी। उसी दौर में उत्तरी वेस्ट बैंक के एक अन्य गांव में भी मस्जिद को निशाना बनाए जाने की रिपोर्ट आई थी।
एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, 2026 में वेस्ट बैंक में हिंसा का स्तर काफी बढ़ा है और बस्तीकारों से जुड़े हमलों को लेकर इज़राइल पर कार्रवाई का दबाव बढ़ रहा है।
इस पृष्ठभूमि में क़ुसरा की घेराबंदी केवल स्थानीय कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह जाती। यह उस बड़े विवाद का हिस्सा बनती है जिसमें वेस्ट बैंक की भूमि, इज़राइली बस्तियों के विस्तार, फ़िलिस्तीनी नागरिकों की सुरक्षा और संभावित विस्थापन जैसे सवाल शामिल हैं।
अमेरिकी विदेश नीति में इज़राइल को लंबे समय से महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी माना जाता है। लेकिन हकाबी की व्यक्तिगत राजनीतिक पृष्ठभूमि भी इस बयान को अहम बनाती है। वे इज़राइली बस्तियों के प्रबल समर्थक रहे हैं और फ़िलिस्तीनी राज्य की स्थापना को लेकर पारंपरिक अमेरिकी नीति से अलग विचार व्यक्त करते रहे हैं।
इसी वजह से उनका बस्तीकारों के एक समूह को “आतंकवादी” कहना एक महत्वपूर्ण डिप्लोमैटिक संकेत है। हालांकि इसे अमेरिकी नीति में व्यापक बदलाव का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हकाबी का बयान अमेरिकी सरकार की व्यापक वेस्ट बैंक नीति का पूरा प्रतिनिधित्व करता है, ऐसा स्वतः नहीं माना जा सकता। किसी राजदूत का बयान और औपचारिक सरकारी पॉलिसी अलग स्तर की चीजें हैं।
क़ुसरा की घटना इज़राइली सरकार और सेना के सामने दोहरी चुनौती रखती है। एक तरफ उसे फ़िलिस्तीनी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है। दूसरी तरफ उसे उन इज़राइली बस्तीकार समूहों से निपटना है जो सैन्य आदेशों को चुनौती देते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इज़राइली सेना ने क़ुसरा के नए आउटपोस्ट को “अवैध, निंदनीय और अस्वीकार्य” गतिविधि बताया। यह भाषा इसलिए अहम है क्योंकि सेना ने केवल फ़िलिस्तीनी शिकायतों पर प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि बस्तीकारों की कार्रवाई को भी सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के लिए समस्या माना।
लेकिन बयान और जमीनी कार्रवाई के बीच अंतर भी सामने आया। सेना घेराबंदी हटाने में तत्काल पूरी तरह सफल नहीं हुई।
वेस्ट बैंक की स्थिति अंतरराष्ट्रीय कानून के लंबे विवाद से जुड़ी है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2334 में इज़राइली बस्ती गतिविधियों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध बताया गया था और कब्ज़े वाले क्षेत्र की जनसांख्यिकीय संरचना बदलने वाली गतिविधियों पर चिंता जताई गई थी।
इस व्यापक कानूनी और सियासी संदर्भ में फ़िलिस्तीनी परिवारों को उनके घरों से बाहर करने का कोई भी प्रयास अंतरराष्ट्रीय निगरानी के दायरे में आता है।
हालांकि क़ुसरा की मौजूदा घटना के हर कानूनी पहलू पर अंतिम निष्कर्ष देने के लिए स्वतंत्र जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड जरूरी हैं। उपलब्ध रिपोर्टों में सेना की जांच और पुलिस कार्रवाई का जिक्र है।
अब मुख्य सवाल यह है कि क्या इज़राइली सुरक्षा बल क़ुसरा में घेराबंदी पूरी तरह समाप्त करा पाएंगे और क्या जिम्मेदार लोगों के खिलाफ वास्तविक कार्रवाई होगी।
अमेरिकी दबाव भी अहम रहेगा। हकाबी का बयान वॉशिंगटन की तरफ से एक कड़ा संदेश है, लेकिन इसका वास्तविक असर इस बात से तय होगा कि अमेरिकी प्रशासन आगे इज़राइली सरकार के साथ किस स्तर पर यह मुद्दा उठाता है।
दूसरी तरफ, अगर क़ुसरा जैसे मामलों में फ़िलिस्तीनी परिवारों को अपने घर छोड़ने पड़ते हैं, तो वेस्ट बैंक में विस्थापन और भूमि नियंत्रण को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता और बढ़ सकती है।
क़ुसरा की घटना का सबसे अहम पहलू राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि घरों में फंसे नागरिकों की स्थिति है। परिवारों की सुरक्षा, पानी, बिजली, चिकित्सा सहायता और घर से बाहर निकलने की आज़ादी किसी भी संघर्ष क्षेत्र में बुनियादी मानवीय सवाल हैं।
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इज़राइली सेना ने समस्या को स्वीकार किया है और कार्रवाई का आश्वासन दिया है। लेकिन जब तक घेराबंदी पूरी तरह खत्म नहीं होती और प्रभावित परिवार सुरक्षित रूप से अपने घरों में सामान्य जीवन नहीं जी पाते, तब तक मामला समाप्त नहीं माना जा सकता।
क़ुसरा में फ़िलिस्तीनी परिवारों की घेराबंदी ने वेस्ट बैंक में बढ़ते बस्तीकार तनाव को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया है। अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी का उन्हें “इज़राइली आतंकवादी” कहना इस घटना की सियासी गंभीरता बढ़ाता है।
लेकिन असली कसौटी बयान नहीं, कार्रवाई होगी। यदि इज़राइली सेना घेराबंदी समाप्त कराती है, जिम्मेदार लोगों की तहक़ीक़ात होती है और प्रभावित परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है, तो यह एक स्पष्ट संस्थागत प्रतिक्रिया होगी। अगर ऐसा नहीं होता, तो क़ुसरा की घटना वेस्ट बैंक में कानून-व्यवस्था, नागरिक सुरक्षा और भूमि नियंत्रण पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव का एक और उदाहरण बन सकती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।